पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६१ गृहस्याभ्यन्तरं गच्छेच्चाण्डालो यदि कस्यचित् । तमागाराद् विनिर्वास्य¹ मृद्भाण्डं तु विसर्जयेत् ॥४६॥ यदि किसी के घर में चाण्डाल चला जाय तो उस चाण्डाल को घर से बाहर निकालकर घर के मिट्टी के बर्तनों को फेंक देना चाहिए ॥४६॥ रसपूर्णं तु मृद्भाण्डं न त्यजेत्तु कदाचन । गोमयेन तु सम्मिश्रैर्जलैः प्रोक्षेद् गृहं तथा ॥४७॥ जिन मिट्टी के बर्तनों में रस, तेल, घी आदि भरा हो उसका त्याग नहीं करना चाहिए, गोबर से घर को लीप देना चाहिए ॥४७॥ ब्राह्मणस्य व्रणद्वारे पूय-शोणितसम्भवे । कृमिरुत्पद्यते यस्य प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥४८॥ यदि ब्राह्मण को व्रण (फोड़ा-घाव) होकर उसमें से खून अथवा पीब बहने लगे अथवा यदि उसमें कीड़े पड़ गये हों तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार करना चाहिए ? ॥४८॥ गवां मूत्र पुरीषेण ²दध्ना क्षीरेण सर्पिषा । त्र्यहं स्नात्वा च पीत्वा च कृमिदुष्टः शुचिर्भवेत् ॥४९॥ उस पुरुष को जिसके व्रण में कृमि पड़ गयी हों, तीन दिन तक पञ्चगव्य से स्नान करना चाहिए तथा पञ्चगव्य ही खाना चाहिए तो कृमिदोष से शुद्ध हो जाता है ॥४९॥ क्षत्रियोऽपि सुवर्णस्य पञ्च माषान् ³प्रदाय तु । गोदक्षिणां तु वैश्यस्याऽप्युपवासं विनिर्दिशेत् ॥५०॥ १. ‘विनिःसार्य’ इति । २. ‘दधि-क्षीरेण’ इति । ३. ‘प्रदापयेत्’ इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal