पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो- यदि किसी क्षत्रिय के व्रण में कृमि पड़ गयी हों तो उसे पांच मासे सोने का दान करना चाहिए। यदि वैश्य हो तो उसे एक दिन उपवास कर गो-दान करना चाहिए। इस प्रकार करने से क्षत्रिय तथा वैश्य की शुद्धि होती है ॥५०॥ शूद्राणां नोपवासः स्यात् शूद्रो दानेन शुद्ध्यति । अच्छिद्रमिति यद्-वाक्यं वदन्ति क्षितिदेवताः ॥५१॥ यदि शूद्र के व्रण में कृमि पड़ गयी हों तो उसे उपवास करने की आवश्यकता नहीं है । वह केवल दान मात्र से ही शुद्ध हो जाता है । ब्राह्मण दान के अनन्तर यदि 'अच्छिद्रमस्तु' कह दें, तो ॥५१॥ प्रणम्य शिरसा ग्राह्यमग्निष्टोमफलं हि तत् । जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि ॥५२॥ उन्हें प्रणाम कर, उनके दिये हुए अक्षत को माथे पर चढ़ाने से अग्निष्टोम के तुल्य फल होता है। जप, तप तथा यज्ञादि में कोई छिद्र (दोष-त्रुटि) हो जाय तो ॥५२॥ सर्वं भवति निश्चिद्रं ब्राह्मणैरुपपादितम् । व्याधि-व्यसनि-निश्रान्ते दुर्भिक्षे डामरे तथा ॥५३॥ ब्राह्मणों के द्वारा कहे गये 'अच्छिद्रमस्तु' इस वाक्य मात्र से ही यजमान के समस्त जप, तप तथा यज्ञादि कर्म पूर्ण हो जाते हैं। व्याधि में, व्यसन में, थकी हुई अवस्था में, दुर्भिक्ष तथा राज-विप्लव होने पर, ॥५३॥ उपवासो व्रतं होमो द्विजसम्पादितानि वै । अथवा ब्राह्मणास्तुष्टाः सर्वे कुर्वन्त्यनुग्रहम् ॥५४॥ ब्राह्मणों के द्वारा जप, होम तथा व्रत करावे, यदि इस प्रकार ब्राह्मण सन्तुष्ट होकर अनुग्रह करें तो ॥५४॥