भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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६४ पाराशरस्मृतिः षष्ठो- इस प्रकार उपदेश करनेवाले लोग उस पुरुष के कार्य में विघ्न उत्पन्न करते हैं और अनुचित नरक में गिरते हैं। तथा जो ब्राह्मण के उपदेश के बिना ही स्वयं व्रत, नियम आदि का आचरण करते हैं ॥५९॥ वृथा तस्योपवासः स्यान्न स पुण्येन युज्यते । स एव नियमो ग्राह्यो यमेकोऽपि वदेद् द्विजः ॥६०॥ ब्राह्मण के अपमान को करनेवाले उपपुरुष ( जिसने ब्राह्मण के उपदेश के बिना ही व्रत तथा उपवास का अनुष्ठान किया है) का किया हुआ समस्त व्रत एवं उपवास व्यर्थ है, उसे कोई फल नहीं प्राप्त होता । इसलिए व्रत अथवा उपवास वेदज्ञ ब्राह्मण के उपदेश करने पर ही फलप्रद होता है ॥६०॥ कुर्याद् वाक्यं द्विजाना च त्वन्यथा भ्रूणहा भवेत् । ब्राह्मणा जङ्गमं तीर्थं तीर्थभूता हि साधवः ॥६१॥ ब्राह्मणों की आज्ञा माननी चाहिए। न मानने पर भ्रूणहत्या-जैसा महापाप लगता है। ब्राह्मण चलने-फिरनेवाले तीर्थ ही हैं। इसी प्रकार साधुजनों को भी तीर्थ-स्वरूप ही समझना चाहिए ॥६१॥ तेषां वाक्योदकेनैव शुद्ध्यन्ति मलिना जनाः । ब्राह्मणा यानि भाषन्ते मन्यन्ते तानि देवताः ॥६२॥ ब्राह्मणों के वाक्यरूप जल से मलिन पुरुष भी शुद्ध हो जाते हैं। ब्राह्मण जिस बात को कहते हैं, देवता लोग भी उस बात को मान लेते हैं ॥६२॥ सर्वदेवमयो विप्रो न तद्-वचनमन्यथा । उपवासो व्रतं चैव स्नानं तीर्थं जपस्तपः ॥६३॥