भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 170 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 77

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६५ ब्राह्मण सर्वदेवमय है, उसका कहा गया कोई भी वचन व्यर्थ नहीं होता । जो ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर उपवास, व्रत, स्नान तथा तीर्थ करते हैं ॥६३॥ ¹विप्रसम्पादितं यस्य सम्पूर्णं तस्य तत्फलम् । अन्नाद्ये कीटसंयुक्ते मक्षिका-केशदूषिते ॥६४॥ उन्हीं को उस स्नान, व्रतादि का सम्पूर्ण फल होता है । अन्न आदि किसी वस्तु में यदि कीड़ा पड़ जावे अथवा मक्खी या केश पड़ जावे, तो ॥६४॥ तदन्तरा स्पृशेच्चापस्तदन्नं भस्मना स्पृशेत् । भुञ्जानश्चैव यो विप्रः पादं हस्तेन संस्पृशेत् ॥६५॥ उसमें जल छोड़ देवे पश्चात् भस्म छिड़क देवे तो उस अन्न की शुद्धि हो जाती है । जो ब्राह्मण भोजन के समय अपने हाथ से पैरों को छू लेवे ॥६५॥ स्वमुच्छिष्टमसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते भुक्तभाजने । पादुकास्थो न भुञ्जीत पर्यङ्के² संस्थितोऽपि वा ॥६६॥ उसे उच्छिष्ट भोजन का पाप लगता है, अथवा उच्छिष्ट पात्र में भोजन करने से जो पाप लगता है वह उसे भी लगता है । खड़ाऊँ पर बैठकर भोजन न करे अथवा पर्यंक ( खटिया ) आदि पर बैठकर भी भोजन नहीं करे ॥६६॥ श्वान-चाण्डालदृष्टौ³ च भोजनं परिवर्जयेत् । यदन्नं प्रतिषिद्धं स्याद्भक्ष्याशुद्धिस्तथैव च ॥६७॥ १. 'विप्रैः' इति । २. 'पर्यङ्कस्थ-स्थितोऽपि' इति क्वचित्पुस्तके पाठः । ३. 'दृक् चैव' इति । ५