भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 170 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

६६ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो- कुत्ता अथवा चाण्डाल के देखते भोजन नहीं करे। जो अन्न नहीं खाना चाहिए और जिस भाँति अन्न की शुद्धि होती है ॥६७॥ यथा पराशरेणोक्तं तथैवाऽहं वदामि वः। शृतं द्रोणाढकस्याऽन्नं काक-श्वानोपघातितम्॥६८॥ पराशर ने इस विषय में जैसा कहा है, वह सब मैं आप लोगों से कहता हूँ। यदि द्रोण अथवा आढक में भरे हुए अन्न को कुत्ता अथवा कौआ जूठा कर दे, तो ॥६८॥ 'केनेदं शुद्ध्यते ? चे'ति ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्। काक-श्वानावलीढं तु द्रोणान्नं न परित्यजेत् ॥६९॥ 'उसकी शुद्धि किस प्रकार होगी?' इसपर पराशर का मत है कि कुत्ता अथवा कौआ यदि द्रोण परिमाण अन्न को दूषित कर दे तो उसका त्याग नहीं करना चाहिए ॥६९॥ वेद-वेदाङ्गविद्-विप्रैर्धर्मशास्त्रानुपालकैः। प्रस्था द्वात्रिंशतिर्द्रोणः १स्मृतो द्विप्रस्थ आढकः ॥७०॥ वेद, वेदाङ्ग को जाननेवाले तथा धर्मशास्त्रों का पालन करने वाले ब्राह्मणों ने ३२ प्रस्थ का द्रोण कहा है और दो प्रस्थ को आढक कहा है ॥७०॥ ततो द्रोणाऽऽढकस्यान्नं श्रुति-स्मृतिविदो विदुः। काक-श्वानावलीढं तु गवाघ्रातं खरेण वा ॥७१॥ इसलिए श्रुति तथा स्मृति को जाननेवाले ब्राह्मणों ने कहा है कि यदि द्रोण वा आढक परिमाणवाले अन्न को कौआ या कुत्ता जूठा १. 'प्रस्थाश्चत्वार आढकाः' इति।