पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६७ कर दे अथवा गौ और गधे ने उसे सूँघ लिया हो, तो भी उसका त्याग नहीं करना चाहिए ॥७१॥ स्वल्पमन्नं त्यजेद् विप्रः शुद्धिद्रोणाऽऽढके भवेत् । अन्नस्योद्धृत्य तन्मात्रं यच्च लालाहतं भवेत् ॥७२॥ परिमाण में यदि अन्न थोड़ा हो तो उसे ही कौआ, कुत्ता के द्वारा जूठा करने पर गौ अथवा गधे से सूँघे जाने पर, त्याग करे। किन्तु द्रोण अथवा आढक परिमाणवाले अन्न को जितने में लार लगी हो उसे निकालकर फेंक दे, शेष की शुद्धि इस प्रकार करे ॥७२॥ सुवर्णोदकमभ्युक्ष्य हुताशेनेव तापयेत् । हुताशनेन संस्पृष्टं सुवर्णसलिलेन च ॥७३॥ निकालने से शेष अन्न को सोने के जल से धोकर आग में तपा देवे, तब वह शुद्ध हो जाता है। क्योंकि सोने के जल से धोकर आग में तपा देने से, ॥७३॥ विप्राणां १वेदघोषेण भोज्यं भवति तत्क्षणात् । स्नेहो वा गोरसो वाऽपि तत्र शुद्धिः कथं भवेत् ? ॥७४॥ तदनन्तर ब्राह्मणों के वेद-घोष से अन्न भोजन के योग्य हो जाता है। यदि कोई स्नेह (घी, तेल) अथवा गोरस (दूध, दही) आदि कुत्ते, कौवे ने जूठा कर दिया हो, अथवा गौ, गधे ने उसको सूँघ लिया हो तो उसकी शुद्धि किस प्रकार करनी चाहिए ? ॥७४॥ १. 'ब्रह्मघोषेण' इति ।