पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ पराशरस्मृतिः [ सप्तमो- अल्पं व¹रित्यजेदन्नं स्नेहस्योत्पवनेन च। अनलज्वालया शुद्धिर्गोरसस्य विधीयते ॥७५॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे प्राणहत्यादि-निष्कृतिर्नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ यदि स्वल्प थोड़ा अन्न काकादि से उपहत हो, तो उसे फेंक देना चाहिये। परन्तु यदि चिकना घृत या तेल हो तो उसे कुशों के द्वारा ऊपर उछालना चाहिए और यदि गोरस (दूध, दही आदि) हो तो आग पर रख देने से शुद्ध हो जाता है ॥ ७५ ॥ इस प्रकार आचार्य पण्डित शिवदत्तमिश्र शास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र का छठा अध्याय समाप्त ॥६॥ * ७. सप्तमोऽध्यायः अथाऽतो द्रव्यसंशुद्धिः पराशरवचो यथा। दारवाणां तु पात्राणां तत्तक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥ १ ॥ इसके अनन्तर पराशर मुनि के मतानुसार द्रव्यों की शुद्धि कहता हूँ। काठ के बने हुए पात्र यदि अमेध्य वस्तु के सम्पर्क से दूषित हो जायें तो उन्हें किञ्चित् छील देने से शुद्धि हो जाती है ॥१॥ मार्जनाद् यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि। चमसानां ³ग्रहाणां च शुद्धिः प्रक्षालनेन तु ॥ २ ॥ १. 'तत्र' इति। २. चमत्यस्मिन्नसौ चमसः। पलाशदिकाष्ठनिर्मितो यज्ञियपात्रविशेषः। ३. गृह्यतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या सोमाधारभूतं ग्रहशब्देनाभिधीयते।