पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६९ यज्ञकर्म में यज्ञीय पात्रों की शुद्धि हाथ से पोछ देने पर होती है । किन्तु चमस एवं ग्रह नामक यज्ञीय पात्र जल से धोने पर शुद्ध हो जाते हैं ॥२॥ चरूणां च स्रुवाणां च शुद्धिरुष्णेन वारिणा । भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुद्ध्यते ॥ ३ ॥ चरु पात्र तथा स्रुव की शुद्धि गरम जल में डाल देने से होती है। काँस का बरतन भस्म (राख) से तथा ताँवे का बरतन खटाई से शुद्ध होता है ॥३॥ रजसा शुद्ध्यते नारी विकलं या न गच्छति । नदी वेगेन शुद्ध्येत लेपो यदि न दृश्यते ॥ ४ ॥ स्त्री यदि नीचादि सम्पर्क से दूषित न हो तो रजस्वला हो जाने पर शुद्ध हो जाती है । (केवल मानस-व्यभिचार करने पर) । (अथवा पीतल का बरतन मिट्टी से रगड़ने पर शुद्ध होता है) । यदि नदी में कोई लेप (विकृत पदार्थ) न दीख पड़े, तो वह वेग से शुद्ध हो जाती है ॥४॥ वापी-कूप-तडागेषु दूषितेषु कथञ्चन । उद्धृत्य वै कुम्भशतं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥ ५ ॥ यदि वापी, कूप और तड़ाग (तालाब) किसी कारण से दूषित हो गये हों तो उनमें से सौ घड़ा जल निकालकर पंचगव्य डालने से शुद्ध हो जाते हैं ॥५॥ अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा तु रोहिणी । दशवर्षा भवेत् कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला ॥ ६ ॥ १. चरति होमादिकमस्मादसौ चरुः ।