भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

७० पाराशरस्मृतिः [ सप्तमो- आठ वर्ष की कन्या 'गौरी' नव वर्ष की 'रोहिणी', तथा दश वर्ष की 'कन्या' कही जाती है। इससे अधिक अवस्था होने पर वह कन्या 'रजस्वला' कही जाती है ॥६॥ प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति । मासि मासि रजस्तस्याः पिबन्ति पितरः स्वयम् ॥ ७ ॥ बारह वर्ष की अवस्था हो जाने पर जो लोग कन्यादान नहीं करते उनके पितर उस कन्या का रज प्रति मास पीते रहते हैं। अतः दश वर्ष की अवस्था में कन्यादान कर देना चाहिये ॥७॥ माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्या रजस्वलाम् ॥ ८ ॥ यदि कन्या विवाह के पहले ही रजस्वला हो गयी हो, तो रजस्वला कन्या को देखकर उसके माता, पिता तथा जेठे भाई नरक में जाते हैं ॥८॥ यस्तां समुद्वहेत् कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः । असम्भाष्यो ह्यपाङ्क्तेयः स विप्रो वृषलीपतिः ॥ ९ ॥ उस रजस्वला कन्या से जो ब्राह्मण मद से मोहित होकर विवाह कर लेता है, उसे 'वृषलीपति' कहते हैं। द्विजातियों को उससे सम्भाषण नहीं करना चाहिए और उसको पंक्ति से बाहर कर देना चाहिए ॥९॥ यः करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः । स भैक्षभुग् जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्विशुद्ध्यति ॥१०॥ जो ब्राह्मण एक रात भी (वृषली) रजस्वला कन्या का सेवन करता है वह तीन वर्ष तक भिक्षान्न का भोजन करता हुआ गायत्री का जप करे, तब उसकी शुद्धि होती है ॥१०॥