पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ७१ अस्तङ्गते यदा सूर्ये चाण्डालं पतितं स्त्रियम् । सूतिकां स्पृशतश्चैव कथं शुद्धिविधीयते¹ ? ॥११॥ सूर्य के अस्त हो जाने पर यदि पतित पुरुष, चाण्डाल अथवा सूतिका स्त्री का स्पर्श हो जावे तो उन द्विजातियों की शुद्धि किस प्रकार होगी ? ॥११॥ जातवेदं सुवर्णं च सोममार्गं विलोक्य च । ब्राह्मणाऽनुमतश्चैव स्नानं कृत्वा विशुद्ध्यति ॥१२॥ जातवेद ( अग्नि ), सुवर्ण तथा चन्द्रमा ( चन्द्रमा के अभाव में चन्द्र-पथ ) को देखकर द्विजाति, ब्राह्मणों की आज्ञा से स-चैल ( वस्त्र- सहित ) स्नान करे तब उनकी शुद्धि होती है ॥१२॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी ब्राह्मणीं तथा । तावत्तिष्ठेन्निराहारा त्रिरात्रेणैव शुद्ध्यति ॥१३॥ यदि रजस्वला ब्राह्मणी किसी दूसरी रजस्वला ब्राह्मणी से छू जावे तो उन दोनों रजस्वलाओं को तीन दिनों तक उपवास करना चाहिए । फिर स्नान कर शुद्ध हो जाती हैं ॥१३॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी क्षत्रियां तथा । अर्द्धकृच्छ्रं चरेत् पूर्वा पादमेकं त्वनन्तरा ॥१४॥ यदि ब्राह्मणी रजस्वला तथा क्षत्राणी रजस्वला परस्पर एक दूसरे को उस अवस्था में छू लें, तो ब्राह्मणी रजस्वला अर्द्धकृच्छ्र तथा क्षत्राणी रजस्वला पादकृच्छ्र व्रत करे तब उनकी शुद्धि होती है ॥१४॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी वैश्यां तथा । पादहीनं चरेत् पूर्वा पादमेकमनन्तरा ॥१५॥ १. 'विशिष्यते' इति क्वचित्पुस्तके ।