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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

७० पाराशरस्मृतिः [ सप्तमो- आठ वर्ष की कन्या 'गौरी' नव वर्ष की 'रोहिणी', तथा दश वर्ष की 'कन्या' कही जाती है। इससे अधिक अवस्था होने पर वह कन्या 'रजस्वला' कही जाती है ॥६॥ प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति । मासि मासि रजस्तस्याः पिबन्ति पितरः स्वयम् ॥ ७ ॥ बारह वर्ष की अवस्था हो जाने पर जो लोग कन्यादान नहीं करते उनके पितर उस कन्या का रज प्रति मास पीते रहते हैं। अतः दश वर्ष की अवस्था में कन्यादान कर देना चाहिये ॥७॥ माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्या रजस्वलाम् ॥ ८ ॥ यदि कन्या विवाह के पहले ही रजस्वला हो गयी हो, तो रजस्वला कन्या को देखकर उसके माता, पिता तथा जेठे भाई नरक में जाते हैं ॥८॥ यस्तां समुद्वहेत् कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः । असम्भाष्यो ह्यपाङ्क्तेयः स विप्रो वृषलीपतिः ॥ ९ ॥ उस रजस्वला कन्या से जो ब्राह्मण मद से मोहित होकर विवाह कर लेता है, उसे 'वृषलीपति' कहते हैं। द्विजातियों को उससे सम्भाषण नहीं करना चाहिए और उसको पंक्ति से बाहर कर देना चाहिए ॥९॥ यः करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः । स भैक्षभुग् जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्विशुद्ध्यति ॥१०॥ जो ब्राह्मण एक रात भी (वृषली) रजस्वला कन्या का सेवन करता है वह तीन वर्ष तक भिक्षान्न का भोजन करता हुआ गायत्री का जप करे, तब उसकी शुद्धि होती है ॥१०॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ७१ अस्तङ्गते यदा सूर्ये चाण्डालं पतितं स्त्रियम् । सूतिकां स्पृशतश्चैव कथं शुद्धिविधीयते¹ ? ॥११॥ सूर्य के अस्त हो जाने पर यदि पतित पुरुष, चाण्डाल अथवा सूतिका स्त्री का स्पर्श हो जावे तो उन द्विजातियों की शुद्धि किस प्रकार होगी ? ॥११॥ जातवेदं सुवर्णं च सोममार्गं विलोक्य च । ब्राह्मणाऽनुमतश्चैव स्नानं कृत्वा विशुद्ध्यति ॥१२॥ जातवेद ( अग्नि ), सुवर्ण तथा चन्द्रमा ( चन्द्रमा के अभाव में चन्द्र-पथ ) को देखकर द्विजाति, ब्राह्मणों की आज्ञा से स-चैल ( वस्त्र- सहित ) स्नान करे तब उनकी शुद्धि होती है ॥१२॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी ब्राह्मणीं तथा । तावत्तिष्ठेन्निराहारा त्रिरात्रेणैव शुद्ध्यति ॥१३॥ यदि रजस्वला ब्राह्मणी किसी दूसरी रजस्वला ब्राह्मणी से छू जावे तो उन दोनों रजस्वलाओं को तीन दिनों तक उपवास करना चाहिए । फिर स्नान कर शुद्ध हो जाती हैं ॥१३॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी क्षत्रियां तथा । अर्द्धकृच्छ्रं चरेत् पूर्वा पादमेकं त्वनन्तरा ॥१४॥ यदि ब्राह्मणी रजस्वला तथा क्षत्राणी रजस्वला परस्पर एक दूसरे को उस अवस्था में छू लें, तो ब्राह्मणी रजस्वला अर्द्धकृच्छ्र तथा क्षत्राणी रजस्वला पादकृच्छ्र व्रत करे तब उनकी शुद्धि होती है ॥१४॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी वैश्यां तथा । पादहीनं चरेत् पूर्वा पादमेकमनन्तरा ॥१५॥ १. 'विशिष्यते' इति क्वचित्पुस्तके ।

७२ पाराशरस्मृतिः [ सप्तमो- यदि ब्राह्मणी रजस्वला किसी वैश्य रजस्वला स्त्री से छू जाय तो ब्राह्मणी रजस्वला त्रिपादकृच्छ्र तथा वैश्य की रजस्वला स्त्री पादकृच्छ्र व्रत करे। इस प्रकार दोनों की शुद्धि होती है ॥१५॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी शूद्रजां तथा । कृच्छ्रेण शुद्धयते पूर्वा शूद्रा दानेन शुद्धयति ॥१६॥ यदि ब्राह्मणी रजस्वला किसी शूद्र जातीय रजस्वला स्त्री से स्पृष्ट हो जाय तो ब्राह्मणी सम्पूर्ण कृच्छ्र व्रत करे तथा शूद्रा स्त्री केवल दान से शुद्ध होती है ॥१६॥ स्नाता रजस्वला या तु चतुर्थेऽहनि शुद्धयति । कुर्याद् रजोनिवृत्तौ तु दैव-पित्र्यादि कर्म च ॥१७॥ रजस्वला स्त्री चौथे दिन स्नान करने के उपरान्त शुद्ध हो जाती हैं। परन्तु जब तक रज से उसकी पूर्ण निवृत्ति नहीं हो जाती, तब तक वह देवता तथा पितृकार्य करने की अधिकारिणी नहीं होती ॥१७॥ रोगेण यद्रजः स्त्रीणामन्वहं तु प्रवर्त्तते । नाऽशुचिः सा ततस्तेन तत् स्याद् १वैकालिकं मलम् ॥१८॥ यदि स्त्री को नित्य-प्रति रोग के कारण रज निकलता हो तो वह उस रज से अपवित्र नहीं होती। क्योंकि वह अकालिक धातुगत मल है ॥१८॥ साध्वाचारा न तावत् स्याद् रजो यावत् प्रवर्त्तते । रजोनिवृत्तौ गम्या स्त्री गृहकर्मणि चैव हि ॥१९॥ जब तक स्त्री को रज निकलता रहे तब तक वह देव तथा पितृकर्म की अधिकारिणी नहीं रहती। रजोनिवृत्ति के उपरान्त ही वह संभोग के योग्य तथा गृह-कर्म के योग्य होती है ॥१९॥ १. 'वैकारिकं मल' इति ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहित। ७३ प्रथमेऽहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी। तृतीये रजकी प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुद्ध्यति ॥२०॥ स्त्री रजोधर्म के प्रथम दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन रजकी ( धोबिन ) के तुल्य होती है । फिर चौथे दिन स्नान के उपरान्त शुद्ध होती है ॥२०॥ आतुरे स्नान उत्पन्ने दशकृत्वो ह्यनातुरः । स्नात्वा स्नात्वा स्पृशेदेनं ततः शुद्ध्येत् स आतुरः ॥२१॥ यदि किसी आतुर को स्नान करना आवश्यक हो, तो अनातुर ( स्वस्थ पुरुष ) दश बार स्नान कर प्रत्येक स्नान के अनन्तर उसका स्पर्श करने से वह आतुर पुरुष शुद्ध हो जाता है ॥२१॥ उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः शुना शूद्रेण वा द्विजः । उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥२२॥ यदि कोई जूठे मुँहवाला ब्राह्मण किसी दूसरे जूठे मुँहवाले पुरुष अथवा कुत्ता या शूद्र का स्पर्श कर ले, तो वह ब्राह्मण एक रात उपवास कर पंचगव्य ( गौ का दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र ) का प्राशन करे तब उसकी शुद्धि होती है ॥२२॥ अनुच्छिष्टेन शूद्रेण स्पर्शे स्नानं विधीयते । तेनोच्छिष्टेन संस्पृष्टः प्राजापत्यं समाचरेत् ॥२३॥ यदि जूठा मुँहवाला ब्राह्मण किसी अनुच्छिष्ट शूद्र से छू जाय तो स्नान करे और यदि शूद्र जूठे मुँहवाला हो, उससे ब्राह्मण छू जाय तो प्राजापत्य व्रत करे ॥२३॥

७४ पराशरस्मृतिः [सप्तमो- भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं सुरया यन्न लिप्यते । सुरामात्रेण संस्पृष्टं शुद्ध्यतेऽग्न्युपलेखनैः१ ॥२४॥ जो काँस पात्र में मद्य का स्पर्श न हुआ हो, तो वह भस्म से मलने पर शुद्ध हो जाता है । किन्तु मद्य के स्पर्श हो जानेपर अग्नि में तपाकर माँजने से उसकी शुद्धि होती है ॥२४॥ गावाघ्रातानि कांस्यानि श्व-काकोपहतानि च । शुद्ध्यन्ति दशभिः क्षारैः शूद्रोच्छिष्टानि यानि च ॥२५॥ जिस काँस के पात्र को गौ ने सूंघ लिया हो, कुत्ता अथवा कौवे ने उसे दूषित कर दिया हो अथवा शूद्र के द्वारा वह उच्छिष्ट कर दिया गया हो वह दश बार क्षार ( खट्टे ) पदार्थ के द्वारा मलने से शुद्ध होता है ॥२५॥ गण्डूषं पादशौचं च कृत्वा वै कांस्यभाजने । षण्मासान् भुवि निक्षिप्य उद्धृत्य पुनराहरेत् ॥२६॥ काँस के बरतन में कुल्ला कर देने पर अथवा पैर धो लेने पर छः महीने तक उसे पृथ्वी में गाड़े । तदनन्तर उसका व्यवहार करे ॥२६॥ आयसेष्वायसानां च सीसस्याग्नौ विशोधनम् । दन्तमस्थि तथा शृङ्गं रौप्यं सौवर्णभाजनम् ॥२७॥ लोहे के पात्र के अशुद्ध हो जाने पर उसे लोहे से रगड़े । शीशे के पात्र क अशुद्ध हो जाने पर उसे अग्नि में तपावे । दाँत, हड्डी, सींग, चाँदी एवं सोने के बने हुए पात्र, ॥२७॥ मणिपात्राणि शङ्खश्चेत्येतान् प्रक्षालयेज्जलैः । पाषाणे तु पुनर्धर्षः शुद्धिरैवमुदाहृता ॥२८॥ १. ‘-ऽग्न्युपलेपनैः’ इति पुस्तकान्तरे ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ७५ मणि के पात्र तथा शंख ये जल के प्रक्षालन मात्र से ही शुद्ध हो जाते हैं। परन्तु पत्थर का बना हुआ पात्र पत्थर से रगड़ने से ही शुद्ध होता है ॥२८॥ मृण्मये दहनाच्छुद्धिर्धान्यानां मार्जनादपि । वेणु-वल्कल-चीराणां क्षौम-कार्पास-वाससाम् ॥२९॥ मिट्टी के बरतन आग पर तपाने से शुद्ध होते हैं, तथा धान्य की शुद्धि जल के छींटे दे देने से होती है। इसी प्रकार बाँस के पात्र, वल्कल, चीर ( फटे वस्त्र ), रेशमी एवं सूती वस्त्र ॥२९॥ और्ण-नेत्रपटानां च प्रोक्षणाच्छुद्धिरिष्यते । मुञ्जोपस्कर-शूर्पाणां शणस्य फल-चर्मणाम् ॥३०॥ तथा ऊनी वस्त्र और सन से निर्मित वस्त्रों की शुद्धि जल के छींटे देने से हो जाती है। मूँज, उपस्कर ( घर को शुद्ध करनेवाले झाडू ), सूप, सन, फल, चाम ॥३०॥ तृणकाष्ठस्य रज्जूनामुदकाभ्युक्षणं मतम् । तूलिकाद्युपधानानि रक्तवस्त्रादिकानि च ॥३१॥ तथा तृण, काष्ठ और रस्सी की शुद्धि केवल जल के प्रोक्षण ( छींटा देने ) मात्र से हो जाती है। तकिया, लाल रंग में रँगे हुए वस्त्र ॥३१॥ शोषयित्वार्कतापेन¹ प्रोक्षणाच्छुद्धितामियुः । मार्जार-मक्षिका-कीट-पतङ्ग-कृमि-दर्दुराः ॥ ३२ ॥ धूप में सुखाकर जल के छींटा दे देने से शुद्ध हो जाते हैं। बिल्ली, मक्खी, कीट, पतंग तथा मेढक ॥३२। १. '-ऽऽतपेनैव' इति । २. 'मनुरब्रवीत्' इति ।

७६ पाराशरस्मृतिः [ सप्तमो- मेध्याऽमेध्यं स्पृशन्तोऽपि नोच्छिष्टं मनुरब्रवीत् । महीं स्पृष्ट्वाऽऽगतं तोयं याश्चाप्यस्याऽऽस्यविप्रुषः ॥३३॥ ये पवित्र अथवा अपवित्र वस्तु को छूते रहते हैं। इसलिए इनके स्पर्श से कोई वस्तु उच्छिष्ट नहीं होती, ऐसा मनु का वचन है। धरती में गिरकर आनेवाला जल अथवा बोलने में मुख के द्वारा गिरा हुआ थूक का छींटा, ॥३३॥ भुक्तोच्छिष्टं तथा स्नेहं नोच्छिष्टं मनुरब्रवीत् । ताम्बूलेक्षु-फले चैव भुक्तस्नेहानुलेपने ॥३४॥ खाने में बार-बार ग्रास (कौर) ग्रहण करने में तथा शरीर पर लगाने से अवशिष्ट रहनेवाला तेल आदि पदार्थ झूठे नहीं कहे जाते। ताम्बूल, फल, ऊख, भोजनकाल में लगा हुआ चिकना घी आदि पदार्थ, ॥३४॥ मधुपर्के च सोमे च नोच्छिष्टं धर्मतो विदुः । रथ्याकर्दम-तोयानि नावः पन्थास्तृणानि च ॥३५॥ मधुपर्क, सोमलता रस ये सभी पदार्थ धर्मतः झूठे नहीं होते। गली, कीचड़ का जल, नौका, सड़क तथा तृण, पके हुए ईंटों का भट्ठा ॥३५॥ मारुतार्केण शुद्ध्यन्ति पक्वेष्टकचितानि च । अदुष्टाः सन्तता धारा वातोद्धताश्च रेणवः ॥ ३६ ॥ ये सभी पदार्थ वायु तथा सूर्य की किरणों के संयोग से सदैव शुद्ध रहते हैं। सदैव बहती हुई धारा तथा वायु के झोंके से उड़ी हुई धूल भी अशुद्ध नहीं होती ॥३६॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ७७, स्त्रियो वृद्धास्तथा बालाः न दुष्यन्ति कदाचन । क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तोच्छिष्टे तथाऽनृते ॥३७॥ इसी प्रकार स्त्री, बालक तथा वृद्ध ये भी कभी दूषित नहीं होते । छींकने पर, थूकने पर, दाँत में जूठा रह जाने पर तथा अकस्मात् झूठ बोल देने पर, ॥३७॥ पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् । अग्निरपश्च वेदाश्च सोम-सूर्या-ऽनिलास्तथा ॥३८॥ पतितों से संभाषण करने पर ब्राह्मण सदैव अपने दाहिने कान का स्पर्श करे । क्योंकि अग्नि, जल, वेद, चन्द्रमा, सूर्य, वायु आदि देवता, । ८॥ एते सर्वेऽपि विप्राणां श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे । प्रभासादीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा ॥३९॥ प्रभास आदि श्रेष्ठ तीर्थ तथा गङ्गादि उत्तम-उत्तम नदियाँ ॥३९॥ विप्रस्य दक्षिणे कर्णे सान्निध्यं मनुरब्रवीत् । देशभङ्गे प्रवासे वा व्याधिषु व्यसनेष्वपि ॥४०॥ ब्राह्मण के दक्षिण कर्ण में निवास करती हैं, ऐसा मनु का कथन है । देश में विप्लव होने पर, विदेश में, व्याधि और व्यसन में, ॥४०॥ रक्षेदेव स्वदेहादि पश्चाद्धर्म समाचरेत् । येन केन च धर्मेण मृदुना दारुणेन वा ॥४१॥ सर्वप्रथम अपने शरीर की रक्षा करे । पश्चात् धर्म करे । पुरुष को जिस किसी भी कोमल या कठोर उपाय से विपत्ति में पड़े हुए ॥४१॥

७४ पराशरस्मृतिः [ अष्टमो- उद्धरेद् दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् । आपत्काले तु निस्तीर्णे १शौचाऽऽ चारंविचिन्तयेत् । शुद्धिं समुद्धरेत् पश्चात् स्वस्थो२ धर्मं समाचरेत् ॥४२॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे द्रव्यशुद्धिर्नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ अपने दीन आत्मा का उद्धार करना चाहिए । विपत्ति को पार कर लेने पर, शौचाचार की चिन्ता करनी चाहिए । आपत्काल के अनन्तर ही अपनी शुद्धि करे । फिर स्वस्थ होने पर धर्माचरण करे ॥४॥ इस प्रकार आचार्य पण्डित शिवदत्तमिश्र शास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में सप्तम अध्याय समाप्त । ७॥ * ८. अष्टमोऽध्यायः गवां बन्धनयोक्त्रेषु भवेन्मृत्युरकामतः । अकामकृत पापस्य प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥ १ ॥ यदि गौ अथवा बैल की मृत्यु अनजान में खूँटे में बांधने अथवा जूआ आदि में जीतने से हो जाये तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार करना चाहिए ? ॥१॥ वेद-वेदाङ्गविदुषां धर्मशास्त्रं विजानताम् । स्वकर्मरतविप्राणां स्वकं पापं निवेदयेत् ॥ २ ॥ ऐसे पुरुष को उचित है कि वह वेद, वेदांग तथा धर्मशास्त्र के जानने वाले एवं स्वकर्म धर्मानुष्ठान में निरत तपस्वी ब्राह्मणों के पास जाकर अपना पाप बतलावे ॥२॥ १. शौचाचारं न चिन्तयेत्' इति क्वचित्पुस्तके । २. 'समर्थो धर्ममाचरेत्' इति ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८९ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि उपस्थानस्य लक्षणम् । उपस्थितो हि न्यायेन १व्रतादेशनमर्हति ॥ ३ ॥ इसके अनन्तर उस मनुष्य को किस प्रकार उन ब्राह्मणों के पास जाना चाहिए, यह मैं कहता हूँ । पुरुष को उचित प्रकार से विनय एवं न्यायपूर्वक विद्वानों के पास जाना चाहिए । तभी वह व्रतादेश का अधिकारी होता है ॥३॥ सद्यो निःसंशये पापे न भुञ्जीताऽनुपस्थितः । भुञ्जानो वर्धयेत् पापं पर्षद्यत्र न विद्यते ॥ ४ ॥ यदि यह निश्चय हो जाय कि मैंने पाप कर दिया है तो उसे विद्वत्-परिषद् में बिना निवेदन किये हुए भोजन नहीं करना चाहिए । क्योंकि पाप के अनन्तर परिषद् में बिना निवेदन किये भोजन कर लेने पर पाप बढ़ जाता है ॥४॥ संशये तु न भोक्तव्यं यावत्कार्यविनिश्चयः । प्रमादश्च न कर्तव्यो यथैवासंशयस्तथा ॥ ५ ॥ यदि पाप में कोई सन्देह हो गया हो तो भी जब तक उसका निश्चय न हो जाय तब तक भोजन नहीं करना चाहिए । इस विषय में सर्वप्रथम यही कर्तव्य है कि जिससे सन्देह दूर हो ॥५॥ कृत्वा पापं न गूहेत गुह्यमानं विवर्द्धते । स्वल्पं वाऽथ प्रभूतं वा धर्मविद्भ्यो निवेदयेत् ॥ ६ ॥ पुरुष को उचित है कि वह पाप करने पर उसे न छिपावे । क्योंकि छिपाया हुआ पाप बढ़ता है । पाप चाहे थोड़ा हो अथवा अधिक हो सर्वप्रथम धर्मवेत्ता से उसको निवेदन कर देना उचित है ॥६॥ १, 'व्रतादेशं समर्हति' इति पाठान्तरम् ।

८० पराशरस्मृतिः [अष्टमो- ¹ते हि पापे कृते वैद्या हन्तारश्चैव पाप्मनाम् । व्याधितस्य यथा वैद्या बुद्धिमन्तो रुजापहाः ॥ ७ ॥ क्योंकि धर्मशास्त्रवेत्ता ब्राह्मण पाप के वैद्य हैं ! वे पापों को नष्ट करने में उसी प्रकार समर्थ हैं जिस प्रकार बुद्धिमान् वैद्य रोगी के रोग को दूर कर उसे स्वस्थ बना देता है ॥७॥ प्रायश्चित्त समुत्पन्ने ह्रीमान् सत्यपरायणः । मृदुरार्जवसम्पन्नः शुद्धिं गच्छेत् मानवः ॥ ८ ॥ प्रायश्चित्त लगने पर पुरुष को सत्यपरायण, सरलता एवं दयायुक्त हो जाने पर ही उसकी शुद्धि की जा सकती है ॥८॥ सचैलं वाग्यतः स्नात्वा क्लिन्नवासाः समाहितः । क्षत्रियो वाऽथ वैश्या वा ततः पर्षदमाव्रजेत् ॥ ९ ॥ पाप का निश्चय हो जाने पर क्षत्रिय अथवा वैश्य पुरुष मौन होकर वस्त्र समेत स्नान करे । फिर गीला वस्त्र पहनकर विद्वानों की परिषद् में पाप का प्रायश्चित्त करने के लिए जाये ॥९॥ उपस्थाय ततः शीघ्रमारर्तिमान् धरणिं व्रजेत् । गात्रैश्च शिरसा चैव न च किञ्चिदुदाहरेत् । १० ॥ फिर शीघ्रता से दुःखी होकर ब्राह्मणों की परिषदों को पृथ्वी पर सारे शरीर और शिर को लम्बा कर दण्डवत् करे और कुछ भी न बोले ॥१०॥ सावित्र्याश्चाऽपि गायत्र्याः सन्ध्योपास्त्यग्निकार्ययोः । अज्ञानात् कृषिकर्तारो ब्राह्मणा नामधारकाः ॥ ११ ॥ १. 'तेऽपि पापकृतां' इत्यपि पाठः ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८१ ग्रन्थकार परिषद् का लक्षण कहते हैं—जो ब्राह्मण अज्ञान से गायत्री और सावित्री नहीं जानते, न संध्योपासन एवं अग्निहोत्र ही करते हैं, केवल खेती से जीविका करते हैं वे नाममात्र के ब्राह्मण हैं। ऐसे ब्राह्मणों की परिषद् नहीं होती ॥११॥ अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषदत्वं न विद्यते ॥१२॥ ब्रह्मचर्यादि व्रतों एवं वेदमन्त्रादि से हीन केवल जातिमात्र से जीविका करनेवाले हजारों ब्राह्मणों के इकट्ठे होने पर भी वह परिषद् नहीं होती ॥१२॥ यद् वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममतद्विदः । तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄनधिगच्छति ॥१३॥ धर्म को न जाननेवाले तमोगुणी मूर्ख लोग जो भी कहते हैं वह पाप सौ गुना होकर उन मूर्खों को ही लगता है ॥१३॥ अज्ञात्वा धर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्तं ददाति यः । प्रायश्चित्ती भवेत् पूतः किल्विषं पर्षदि व्रजेत् ॥१४॥ जो धर्मशास्त्रों को जाने बिना ही प्रायश्चित्त की व्यवस्था देता है उससे प्रायश्चित्त करनेवाला पापी तो शुद्ध हो जाता है, परन्तु वह प्रायश्चित्त बतलानेवाले पुरुष एवं परिषद् को लग जाता है ॥१४॥ चत्वारो वा त्रयो वाऽपि यं ब्रूयुर्वेदपारगाः । स धर्म इति विज्ञेयो नेतरैस्तु सहस्रशः ॥१५॥ वेदज्ञ धर्मात्मा पुरुष यदि केवल तीन अथवा चार ही हों तो उनके द्वारा दी गयी व्यवस्था ही धर्मतः मान्य है । इतर हजारों के कहने से भी व्यवस्था धर्मतः मान्य नहीं होती ॥१५॥ प्रमाणमार्ग मार्गन्तो ये धर्मं प्रवदन्ति वै । तेषामुद्विजते पापं सद्भूतगुणवादिनाम् ॥१६॥ ६

४२ पाराशरस्मृतिः [ अष्टमो- शास्त्रीय प्रमाणों को अनुसंधान कर धर्मज्ञ लोग जो व्यवस्था देते हैं वही व्यवस्था माननीय है। क्योंकि ऐसे ही प्रमाणज्ञ धर्मवेत्ताओं से पाप डरता है ॥१६॥ यथाऽश्मनि स्थितं तोयं मारुतार्केण शुद्धयति । एवं परिषदादेशान् नाशयेत्तस्य दुष्कृतम् ॥१७॥ जिस प्रकार पत्थर का जल हवा तथा सूर्यरश्मि से विनष्ट हो जाता है उसी प्रकार वेदज्ञ तीन अथवा चार ब्राह्मणों की परिषद् के आदेश से भी पाप का नाश हो जाता है ॥१७॥ नैव गच्छति कर्तारं नैव गच्छति पर्षदम् । मारुतार्कादि-संयोगात् पापं नश्यति तोयवत् ॥१८॥ धर्मात्माओं के आदेश से प्रायश्चित्त करनेवाले पुरुष का पाप न तो व्यवस्था देनेवाली परिषद को लगता है और न तो प्रायश्चित्त करने- वालों को ही। किन्तु जिस प्रकार सूर्य और हवा के संयोग से जल का विनाश हो जाता है उसी प्रकार वह पाप भी विनष्ट हो जाता है ॥ १८ ॥ चत्वारो वा त्रयो वाऽपि वेदवन्तोऽग्निहोत्रिणः । ब्राह्मणानां समर्था ये परिषत् साऽभिधीयते ॥१९॥ ब्राह्मणों में विद्या आदि सद्गुणों से समर्थ, वेदज्ञ तीन अथवा चार अग्निहोत्री ब्राह्मणों को ही परिषद् कहते हैं ॥१९॥ अनाहिताग्नयो येऽन्ये वेद-वेदाङ्गपारगाः । पञ्च त्रयो वा धर्मज्ञाः परिषत् सा प्रकीर्तिता ॥२०॥ वेद, वेदाङ्ग में पारंगत धर्मशास्त्रों को जाननेवाले पाँच या तीन ब्राह्मण यदि अग्निहोत्र न भी करते हों तो उसे भी 'परिषद्' कहते हैं ॥ २० ॥ १. 'तत्र' इति । २. 'विधीयते' इति ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४३ मुनीनामात्मविद्यानां द्विजानां यज्ञयाजिनाम् । वेदव्रतेषु स्नातानामेकाऽपि परिषद् भवेत् ॥२१॥ आत्मविद्या के जाननेवाले मुनि, यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण तथा वेदज्ञ स्नातक इनमें से किसी एक को भी 'परिषद्' कहते हैं ॥२१॥ पञ्च पूर्वं मया प्रोक्तास्तेषां चाऽसम्भवे त्रयः । स्ववृत्तिपरितुष्टा ये परिषत् सा प्रकीर्तिता ॥२२॥ मैंने पाँच प्रकार की परिषद् कही : १. उन्नीसवें श्लोक में, २. बीसवें श्लोक में तथा तीन प्रकार की इक्कीसवें श्लोक में। यदि पाँचों प्रकार की परिषद् असम्भव हो तो अपनी वृत्ति (सदाचार) से सन्तुष्ट रहने- वाले ब्राह्मणों को भी 'परिषद्' कहते हैं ॥२२॥ अत ऊर्ध्वं तु ये विप्राः केवलं नामधारकाः । परिषत्त्वं न १तेष्वस्ति सहस्रगुणितेष्वपि ॥२३॥ इसके अनन्तर जो श्रुत तथा तप से विहीन योनिमात्र से केवल नाममात्र के ब्राह्मण हैं उनके हजारगुना की संख्या से भी परिषद् नहीं होती ॥२३॥ यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥२४॥ जिस प्रकार काठ का हाथी एवं चमड़े का मृग नाम मात्र से हाथी और मृग है, उनमें हाथी और मृग के गुण तथा क्रिया नहीं होती उसी प्रकार अध्ययन से शून्य भी ब्राह्मण नाम मात्र का ब्राह्मण है ॥२४॥ ग्रामस्थानं यथा शून्यं यथा कूपस्तु निर्जलः । यथा हुतमनग्नौ च अमन्त्रो ब्राह्मणस्तथा ॥२५॥ ——————————————————————————————————————————— १. 'तेषां वै' इति । २. 'दन्ती' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

८४ पाराशरस्मृतिः [ अष्टमो- जिस प्रकार निर्जन (सूना) ग्राम, जलरहित कूप तथा अग्नि के बिना होम व्यर्थ है उसी प्रकार मन्त्ररहित ब्राह्मण भी व्यर्थ ही है ॥२५॥ यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौरूषराऽफला । यथा चाऽज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥२६॥ जिस प्रकार स्त्रियों के लिए नपुंसक निष्फल है, बीज के लिए ऊसर भूमि निष्फल है तथा मूर्ख में दान निष्फल है, उसी प्रकार वेदरहित ब्राह्मण भी निष्फल है ॥२६॥ चित्रकर्म यथाऽनेकैरङ्गैरुन्मील्यते शनैः । ब्राह्मण्यमपि तद्वद्धि संस्कारैर्मन्त्रपूर्वकैः ॥२७॥ जिस प्रकार अनेक रंगों से निर्मित चित्रकर्म ( चित्रकारी ) उद्दीप्त होता है उसी प्रकार अनेक संस्कारों से ब्राह्मणत्व ( ब्राह्मणोचित गुण, कर्म तथा स्वभाव ) भी प्रस्फुटित होता है ॥२७॥ प्रायश्चित्तं प्रयच्छन्ति ये द्विजा नामधारकाः । ते द्विजाः पापकर्मणः समेता नरकं ययुः ॥२८॥ नाममात्र ( विद्या और तप से विहीन केवल योनिमात्र ) के ब्राह्मण जो भी प्रायश्चित्त की व्यवस्था देते हैं वे पापी कहे जाते हैं ! ऐसे सभी लोग नरक में गिरते हैं ॥२८॥ ये पठन्ति द्विजा वेदं पञ्चयज्ञरताश्च ये । त्रैलोक्यं तारयन्त्येते पञ्चेन्द्रियरता अपि ॥२९॥ जो ब्राह्मण वेदों का स्वाध्याय करते हैं और पञ्चयज्ञ करते हैं वे ज्ञानकर्मा पञ्चेन्द्रियों में रत होने पर भी तीनों लोकों को तारने में समर्थ होते हैं। २९॥ सम्प्रणीतः श्मशानेषु दीप्तोऽग्निः सर्वभक्षकः । तथा च वेदविद्विप्रः सर्वभक्षोऽपि दैवतम् ॥३०॥ १ 'तद्विद्धि' इति ।

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जिस प्रकार श्मशान में भी जलती हुई अग्नि समस्त वस्तुओं को जला देने में समर्थ होती है तथा उसके देवत्व का नाश नहीं होता उसी प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मण सर्वभक्षी होते हुए भी देवता ही है ॥३०॥ अमेध्यानि तु सर्वाणि प्रक्षिप्यन्ते यथोदके । तथैव किल्बिषं सर्वं प्रक्षिपेच्च द्विजानले ॥३१॥ जिस प्रकार अपवित्र वस्तु जल में डालने से पवित्र हो जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मणरूपी अग्नि में भी शुद्धि के लिए अपना पाप प्रकट कर देना चाहिए ॥३१॥ गायत्रीरहितो विप्रः शूद्रादप्यशुचिर्भवेत् । गायत्रीब्रह्मतत्त्वज्ञाः सम्पूज्यन्ते जनैर्द्विजाः ॥३२॥ जो ब्राह्मण गायत्री को नहीं जानता वह शूद्र से भी अपवित्र होता है । परन्तु जो गायत्री और ब्रह्म तत्त्व को जाननेवाला है वह संसार में लोगों से पूजित होता है ॥३२॥ दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यो न तु शूद्रो जितेन्द्रियः। कः परित्यज्य गां दुष्टां दुहेच्छीलवतीं खरीम् ? ॥३३॥ शीलरहित भी ब्राह्मण पूजा के योग्य होता है । पर शूद्र कितना भी जितेन्द्रिय हो, तो वह पूजा के योग्य नहीं होता । जिस प्रकार लोग शीलरहित गौ को दुहते हैं, पर सीधी गदही को कोई नहीं दुहता ॥३३। धर्मशास्त्ररथाऽऽरूढा वेदखड्गधरा द्विजाः । क्रीडार्थमपि यद् ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः ॥३४॥ धर्मशास्त्ररूपी रथ पर बैठे हुए वेदरूपी तलवार को धारण किये हुए ब्राह्मण विनोद के लिए भी जो कुछ कहते हैं, वह भी उत्कृष्ट धर्म समझना चाहिए ॥३४॥ चातुर्विद्याऽविकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकाः । त्रयश्चाश्रमिणो मुख्याः पर्षदेषा दशावरा ॥३५॥

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चारों वेदों को जाननेवाले अविकल्पी अर्थात् शास्त्र में सन्देह न करनेवाले, वेदांग एवं धर्मशास्त्र के पढ़ने-पढ़ानेवाले, इनके एक की भी परिषद् कही जाती है। मुख्य रूप से क्रमशः तीनों आश्रमों में निवास करनेवाले दश अथवा उससे अधिक संख्या की भी परिषद् हो सकती है ॥३५॥ राज्ञश्चाऽनुमते स्थित्वा प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् । स्वयमेव न कर्तव्यं कर्तव्या स्वल्पनिष्कृतिः ॥३६॥ ब्राह्मण राजा के आज्ञानुसार ही प्रायश्चित्त की व्यवस्था दे। स्वयं इच्छानुसार कुछ भी न बतलावे। यदि छोटा प्रायश्चित्त हो तो उसे स्वयं इच्छानुसार भी बता सकता है ॥३६॥ ब्राह्मणांस्तानतिक्रम्य राजा कर्तुं १यदिच्छति । तत्पापं शतधा भूत्वा राजानमनुगच्छति ॥३७॥ यदि राजा धर्मशास्त्रज्ञ ब्राह्मणों का अपमान कर स्वयं प्रायश्चित्त कराना चाहता है, तो पापी पुरुष का पाप सौगुना होकर स्वयं राजा को लगता है। ३७॥ प्रायश्चित्तं सदा दद्याद् देवतायतनाग्रतः । आत्मकृच्छ्रं ततः कृत्वा जपेद् वै वेदमातरम् ॥३८॥ ब्राह्मण किसी वेद-मन्दिर के सामने प्रायश्चित्त की व्यवस्था दे। तदनन्तर प्रायश्चित्त देने के कारण आत्मकृच्छ्र कर वेदमाता गायत्री का यथाशक्ति जप करे ॥३८॥ स-शिखं वपनं कृत्वा त्रिसन्ध्यमवगाहनम् । गवां मध्ये वसेद् रात्रौ दिवा गाश्चाऽप्यनुव्रजेत् ॥३९॥ गोहत्यारों को क्या करना चाहिए ? इसको कहते हैं—हत्यारा शिखा सहित शिर को मुण्डन करावे, तीनों काल स्नान करे। रात्रि में


१. 'यदीच्छति' इति पा० ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८७ गौशाला में शयन करे, फिर दिन में गौओं के पीछे-पीछे चले ॥३९॥ उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् । न कुर्वीताऽऽत्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥४०॥ गरमी, वर्षा, शीत अथवा वेग से वायु के बहने पर भी शक्ति के अनुसार जब तक गौओं की रक्षा का प्रबन्ध न कर ले तब तक स्वयं भी अपनी रक्षा के लिए कोई उपाय न करे ॥४०॥ आत्मनो यदि वाऽन्येषाम् गृहे क्षेत्रे खलेऽथवा । भक्षयन्तीं न कथयेत् पिबन्तं चैव वत्सकम् ॥४१॥ गौ यदि अपने घर, खेत अथवा खलिहान में अन्नादि खा रही हो अथवा किसी दूसरे के घर, खेत-खलिहान में खा रही हो। या अपने बछड़े को दूध पिलाती हो, फिर भी किसी से न कहे ॥४१॥ पिबन्तीषु पिबेत्तोयं संविशन्तीषु संविशेत् । पतितां पङ्कमग्नां वा सर्वप्राणैः समुद्धरेत् ॥४२॥ जब गाय जल पीये तो स्वयं भी जल पीये। गाय यदि सोवे तो स्वयं भी सोवे या बैठे। यदि गाय कहीं गिर पड़ी हो अथवा कीचड़ में फँस गयी हो, तो प्राणों की बाजी लगाकर उसका उद्धार करे ॥४२॥ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा यस्तु प्राणान् परित्यजेत् । मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता ²गोब्राह्मणस्य च । ४३॥ ब्राह्मण अथवा गौ की रक्षा के लिए जो अपने प्राणों का त्याग करता है वह ब्रह्महत्या के भी पाप से छूट जाता है तथा गौ और ब्राह्मण की रक्षा कर जो जीवित भी रहता है वह भी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है ॥४३॥ १ 'पङ्कलग्ना' इति पा० । २. 'गोब्राह्मणस्य' इत्यपि पाठः ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ८८ पराशरस्मृतिः [ अष्टमो- गोवधस्याऽनुरूपेण प्राजापत्यं विनिर्दिशेत् । प्राजापत्यं ततः कृच्छ्रं १विभजेत् तच्चतुर्विधम् ॥४४॥ गोवध के अनुरूप ही प्राजापत्य व्रत की व्यवस्था देनी चाहिए। इस प्रकार प्राजापत्य तथा कृच्छ्र का चार भाग करना चाहिए ॥४४॥ एकाहमेकभक्ताशी एकाहं नक्तभोजनः । अयाचितस्यैकमहरेकाहं मारुताशनः ॥४५॥ एक दिन एक समय केवल दिन में, दूसरे दिन केवल रात्रि में भोजन करे। तीसरे दिन अयाचित ( बिना मांगे हुए, जो स्वयं अपने पास आ जाये ) अन्न एक बार खाये, पुनः चौथे दिन केवल वायु पीकर रहे। यह प्राजापत्य कृच्छ्र का प्रथम पाद कहा जाता है ॥४५॥ दिनद्वयं चैकभक्तो द्विदिनं नक्तभोजनः । दिनद्वयमयाची स्याद् द्विदिनं मारुताशनः ॥४६॥ दो दिन तक केवल दिन में एक बार, फिर दो दिन तक केवल रात्रि में एक बार, फिर दो दिन तक अयाचित अर्थात् एक बार भोजन करे। तदनन्तर दो दिन तक केवल वायु के सहारे रहे। यह प्राजापत्य का दो पाद कहा जाता है ॥४६॥ त्रिदिनं चैकभक्ताशी त्रिदिनं नक्तभोजनः । दिनत्रयमयाची स्यात् त्रिदिनं मारुताशनः ॥४७॥ तीन दिन तक केवल दिन में एक बार, फिर तीन दिन तक केवल रात्रि में एक बार, फिर तीन दिन तक अयाचित अन्न केवल एक बार भोजन करे, फिर तीन दिन तक केवल वायु के सहारे रहे। यह प्राजा- पत्य कृच्छ्र का तीन पाद कहा जाता है ॥४७॥ चतुरहं त्वेकभक्ताशी चतुरहं नक्तभोजनः । चतुर्दिनमयाची स्याच्चतुरहं मारुताशनः ॥४८॥ १. 'विभजेत चतुर्विधम्' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

कृच्छ्र का चारों पाद (सम्पूर्ण रूप) कहा जाता है ॥४८॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८९ चार दिन केवल दिन में एक बार, फिर चार दिन तक रात्रि में केवल एक बार, फिर चार दिन तक अयाचित अन्न केवल एक बार भोजन करे। फिर चार दिन तक वायु के सहारे रहे। यह प्राजापत्य कृच्छ्र का चारों पाद (सम्पूर्ण रूप) कहा जाता है ॥४८॥ प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् । विप्राणां दक्षिणां दद्यात् पवित्राणि जपेद् द्विजः ॥४९॥ प्रायश्चित्त कर लेने पर, ब्राह्मणों को भोजन करावे। उन्हें दक्षिणा देवे, फिर पवित्र मन्त्रों एवं पवमान सूक्तों का जप करे ॥४९॥ ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु गोघ्नः १शुद्धो न संशयः ॥५०॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रेऽष्टमोऽध्यायः ॥८॥ ब्राह्मणों को भोजन कराने मात्र से ही गोहत्या करनेवाला व्यक्ति शुद्ध हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥५०॥ इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीकासहित पाराशरीय धर्मशास्त्र में अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥ * ९. नवमोऽध्यायः गवां संरक्षणार्थाय न दुष्येद् रोध-बन्धयोः । तद्वधं तु न तं विद्यात् कामाऽकामकृतं तथा ॥ १ ॥ यदि गायों की रक्षा के उद्देश्य से कोई व्यक्ति उसे किसी घेरे या अहाते में रोककर बांध ले और इस कारण गाय की मृत्यु हो जाय तो वह मनुष्य गोवध का भागी नहीं होता। इसके अतिरिक्त कामाकामकृत अर्थात् भूलवश या धोखे से होनेवाली हत्या को वध कहते हैं ॥१॥ १. 'शुद्ध्येन्न' इति ।