पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८१ ग्रन्थकार परिषद् का लक्षण कहते हैं—जो ब्राह्मण अज्ञान से गायत्री और सावित्री नहीं जानते, न संध्योपासन एवं अग्निहोत्र ही करते हैं, केवल खेती से जीविका करते हैं वे नाममात्र के ब्राह्मण हैं। ऐसे ब्राह्मणों की परिषद् नहीं होती ॥११॥ अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषदत्वं न विद्यते ॥१२॥ ब्रह्मचर्यादि व्रतों एवं वेदमन्त्रादि से हीन केवल जातिमात्र से जीविका करनेवाले हजारों ब्राह्मणों के इकट्ठे होने पर भी वह परिषद् नहीं होती ॥१२॥ यद् वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममतद्विदः । तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄनधिगच्छति ॥१३॥ धर्म को न जाननेवाले तमोगुणी मूर्ख लोग जो भी कहते हैं वह पाप सौ गुना होकर उन मूर्खों को ही लगता है ॥१३॥ अज्ञात्वा धर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्तं ददाति यः । प्रायश्चित्ती भवेत् पूतः किल्विषं पर्षदि व्रजेत् ॥१४॥ जो धर्मशास्त्रों को जाने बिना ही प्रायश्चित्त की व्यवस्था देता है उससे प्रायश्चित्त करनेवाला पापी तो शुद्ध हो जाता है, परन्तु वह प्रायश्चित्त बतलानेवाले पुरुष एवं परिषद् को लग जाता है ॥१४॥ चत्वारो वा त्रयो वाऽपि यं ब्रूयुर्वेदपारगाः । स धर्म इति विज्ञेयो नेतरैस्तु सहस्रशः ॥१५॥ वेदज्ञ धर्मात्मा पुरुष यदि केवल तीन अथवा चार ही हों तो उनके द्वारा दी गयी व्यवस्था ही धर्मतः मान्य है । इतर हजारों के कहने से भी व्यवस्था धर्मतः मान्य नहीं होती ॥१५॥ प्रमाणमार्ग मार्गन्तो ये धर्मं प्रवदन्ति वै । तेषामुद्विजते पापं सद्भूतगुणवादिनाम् ॥१६॥ ६