पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें८० पराशरस्मृतिः [अष्टमो- ¹ते हि पापे कृते वैद्या हन्तारश्चैव पाप्मनाम् । व्याधितस्य यथा वैद्या बुद्धिमन्तो रुजापहाः ॥ ७ ॥ क्योंकि धर्मशास्त्रवेत्ता ब्राह्मण पाप के वैद्य हैं ! वे पापों को नष्ट करने में उसी प्रकार समर्थ हैं जिस प्रकार बुद्धिमान् वैद्य रोगी के रोग को दूर कर उसे स्वस्थ बना देता है ॥७॥ प्रायश्चित्त समुत्पन्ने ह्रीमान् सत्यपरायणः । मृदुरार्जवसम्पन्नः शुद्धिं गच्छेत् मानवः ॥ ८ ॥ प्रायश्चित्त लगने पर पुरुष को सत्यपरायण, सरलता एवं दयायुक्त हो जाने पर ही उसकी शुद्धि की जा सकती है ॥८॥ सचैलं वाग्यतः स्नात्वा क्लिन्नवासाः समाहितः । क्षत्रियो वाऽथ वैश्या वा ततः पर्षदमाव्रजेत् ॥ ९ ॥ पाप का निश्चय हो जाने पर क्षत्रिय अथवा वैश्य पुरुष मौन होकर वस्त्र समेत स्नान करे । फिर गीला वस्त्र पहनकर विद्वानों की परिषद् में पाप का प्रायश्चित्त करने के लिए जाये ॥९॥ उपस्थाय ततः शीघ्रमारर्तिमान् धरणिं व्रजेत् । गात्रैश्च शिरसा चैव न च किञ्चिदुदाहरेत् । १० ॥ फिर शीघ्रता से दुःखी होकर ब्राह्मणों की परिषदों को पृथ्वी पर सारे शरीर और शिर को लम्बा कर दण्डवत् करे और कुछ भी न बोले ॥१०॥ सावित्र्याश्चाऽपि गायत्र्याः सन्ध्योपास्त्यग्निकार्ययोः । अज्ञानात् कृषिकर्तारो ब्राह्मणा नामधारकाः ॥ ११ ॥ १. 'तेऽपि पापकृतां' इत्यपि पाठः ।