पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूतिपाद-३ ८७
व्याख्या— निरोधसमाधिमें चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अभाव हो जानेपर भी उनके संस्कारोंका नाश नहीं होता। उस कालमें केवल संस्कार ही शेष रहते हैं, यह बात पहले पादमें कही है (योग० १।१८)। अतः निरोधकालमें चित्त व्युत्थान और निरोध-दोनों ही प्रकारके संस्कारोंमें व्याप्त रहता है; क्योंकि चित्त धर्मी है और संस्कार उसके धर्म हैं, धर्मी अपने धर्ममें सदैव व्याप्त रहता है, यह नियम है (योग० ३।१४)। उस निरोधकालमें जो व्युत्थानके संस्कारोंका दब जाना और निरोध-संस्कारोंका प्रकट हो जाना है, यह संस्कारोंमें व्याप्त चित्तका व्युत्थानधर्मसे निरोधधर्ममें परिणत होनारूप निरोध-परिणाम है।* निरोध-समाधिकी अपेक्षा संप्रज्ञात समाधि भी व्युत्थान-अवस्था ही है (योग० ३।८)। अतः उसके संस्कारोंको यहाँ व्युत्थान-संस्कारोंके ही अन्तर्गत समझना चाहिये ॥९॥
सम्बन्ध— इसके बाद क्या होता है, सो बतलाते हैं—
* यहाँ समाधि-परिणाम और एकाग्रता-परिणामके लक्षण पहले न करके पहले निरोध-परिणामका स्वरूप बतलाया है। इसका यह कारण मालूम होता है कि आठवें सूत्रमें निरोध-समाधिका वर्णन आ गया। इसलिये पहले निरोध-परिणामका लक्षण बतलाना आवश्यक हो गया; क्योंकि पहले (योग० १।५१ में) निरोध-समाधिका लक्षण करते हुए सब वृत्तियोंके निरोधसे निर्बीज समाधिका होना बतलाया है। अतः उसमें परिणाम न होनेकी धारणा स्वाभाविक हो जाती है; परंतु जबतक चित्तकी गुणोंसे भिन्न सत्ता रहती है, वह अपने कारणमें विलीन नहीं हो जाता; तबतक उसमें परिणाम होना अनिवार्य है। इसलिये निरोध-परिणाम किस प्रकार होता है, यह जाननेकी इच्छा स्वाभाविक हो जाती है।