पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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उनकी अपेक्षा उपर्युक्त धारणा, ध्यान और समाधि—ये तीनों साधन अन्तरङ्ग हैं; क्योंकि इन तीनोंका योग-सिद्धिके साथ निकटतम सम्बन्ध है ॥७॥
सम्बन्ध—निर्बीज समाधिकी विशेषताका वर्णन करते हैं—
तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥८॥
‘वे (ऊपर कहे हुए धारणा आदि तीनों) भी निर्बीज समाधिके बहिरङ्ग साधन ही हैं।’
व्याख्या—पर-वैराग्यकी दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके संस्कारोंका भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि सिद्ध होती है (योग० १।५१)। अतः धारणा, ध्यान और समाधि भी उसके अन्तरङ्ग साधन नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंका अभाव किया जाता है (योग० १।१८), किसी भी ध्येयमें चित्तको स्थिर करनेका अभ्यास नहीं किया जाता ॥८॥
सम्बन्ध—गुणोंका स्वभाव चञ्चल है, उनमें प्रतिक्षण परिणाम होता रहता है; चित्त गुणोंका ही कार्य है, अतः वह भी कभी एक अवस्थामें नहीं रह सकता। अतः निरोध-समाधिके समय उसका कैसा परिणाम होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं—
व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षण-चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥
‘व्युत्थान-अवस्थाके संस्कारोंका दब जाना और निरोध-अवस्थाके संस्कारोंका प्रकट हो जाना—यह निरोधकालमें संस्कारानुगत चित्तका निरोध-परिणाम है।’