पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूतिपाद-३
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**सम्बन्ध—**संयमकी सिद्धिका फल बतलाते हैं—
तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥
'उसको जीत लेनेसे बुद्धिका प्रकाश होता है।'
**व्याख्या—**साधन करते-करते जब योगी संयमपर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् चित्तमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि जिस विषयमें वह संयम करना चाहे, उसीमें तत्काल संयम हो जाता है, उस समय योगीको बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धिमें अलौकिक ज्ञानशक्ति आ जाती है, इसीको प्रथम पादमें अध्यात्मप्रसादके नामसे कहा है (योग० १ । ४७-४८) ॥५॥
**सम्बन्ध—**संयमके प्रयोगकी विधिका वर्णन करते हैं—
तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥
'उस (संयम) का (क्रमसे) भूमियोंमें विनियोग करना चाहिये।'
**व्याख्या—**पहले स्थूल विषयमें संयम करना चाहिये। वह स्थिर हो जानेपर सूक्ष्म विषयोंमें क्रमसे संयम करना चाहिये। इसी प्रकार जिस-जिस स्थलमें संयम स्थिर होता जाय, उस-उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये ॥६॥
**सम्बन्ध—**उक्त तीनों साधनोंकी विशेषता बतलाते हैं—
त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥
'पहले कहे हुओंकी अपेक्षा ये तीनों (साधन) अन्तरङ्ग हैं।'
**व्याख्या—**इसके पहले अर्थात् दूसरे पादमें जो योगके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार—ये पाँच अङ्ग बताये गये हैं,