पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ | पातञ्जलयोगदर्शन
व्याख्या—जिस ध्येय वस्तुमें चित्तको लगाया जाय, उसीमें चित्तका एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी वृत्तिका प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी वृत्तिका न उठना 'ध्यान' है ॥२॥
सम्बन्ध—समाधिका स्वरूप बतलाते हैं—
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥३॥
'जब ( ध्यानमें ) केवल ध्येयमात्रकी ही प्रतीति होती है और चित्तका निज स्वरूप शून्य-सा हो जाता है, तब वही ( ध्यान ही ) 'समाधि' हो जाता है।'
व्याख्या—ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकारमें परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका अभाव-सा हो जाता है, उसकी ध्येयसे भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यानका ही नाम 'समाधि' हो जाता है। यही लक्षण निर्वितर्क समापत्तिके नामसे पहले पादमें किया गया है ( योग० १ । ४३ ) ॥३॥
सम्बन्ध—उक्त तीनों साधनोंका साङ्केतिक नाम बतलाते हैं—
त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥
'किसी एक ध्येय विषयमें तीनोंका होना 'संयम' है।'
व्याख्या—किसी एक ध्येय पदार्थमें तीनों होनेसे 'संयम' कहलाता है। अतः इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ किसी विषयमें संयम करनेको कहा जाय या संयमका फल बतलाया जाय तो संयमके नामसे किसी एक ध्येयमें तीनोंका होना समझ लेना चाहिये ॥४॥