भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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ॐ श्रीपरमात्मने नमः

विभूतिपाद-३

सम्बन्ध— दूसरे पादमें योगाङ्गोंके वर्णनका आरम्भ करके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार—इन पाँच बहिरङ्ग साधनोंका फलसहित वर्णन किया गया; शेष धारणा, ध्यान और समाधि—इन तीन अन्तरङ्ग साधनोंका वर्णन इस पादमें किया जाता है; क्योंकि ये तीनों जब किसी एक ध्येयमें पूर्णतया किये जाते हैं, तब इनका नाम संयम हो जाता है। योगकी विभूतियाँ प्राप्त करनेके लिये संयमकी आवश्यकता है, अतः इन अन्तरङ्ग साधनोंका वर्णन साधनपादमें न करके इस विभूतिपादमें करते हुए पहले धारणाका स्वरूप बतलाते हैं—

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥

'( बाहर या शरीरके भीतर कहीं भी ) किसी एक देशमें चित्तको ठहराना 'धारणा' है।'

व्याख्या— नाभिचक्र, हृदय-कमल आदि शरीरके भीतरी देश हैं, और आकाश या सूर्य-चन्द्रमा आदि देवता या कोई भी मूर्ति तथा कोई भी पदार्थ बाहरके देश हैं, उनमेंसे किसी एक देशमें चित्तकी वृत्तिको लगानेका नाम 'धारणा' है ॥१॥

सम्बन्ध— ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं--

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥

'( जहाँ चित्तको लगाया जाय, ) उसीमें वृत्तिका एकतार चलना 'ध्यान' है।'