पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ पातञ्जलयोगदर्शन
**व्याख्या—**उक्त प्रकारसे प्राणायामका अभ्यास करते-करते मन और इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाते हैं, उसके बाद इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको सब ओरसे समेटकर मनमें विलीन करनेके अभ्यासका नाम 'प्रत्याहार' है। जब साधनकालमें साधक इन्द्रियोंके विषयोंका त्याग करके चित्तको अपने ध्येयमें लगाता है, उस समय जो इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर न जाकर चित्तमें विलीन-सा हो जाना है, यह प्रत्याहार सिद्ध होनेकी पहचान है। यदि उस समय भी इन्द्रियाँ पहलेके अभ्याससे इसके सामने बाह्य विषयोंका चित्र उपस्थित करती रहें तो समझना चाहिये कि प्रत्याहार नहीं हुआ। उपनिषदोंमें भी 'वाक्' शब्दसे उपलक्षित इन्द्रियोंको मनमें निरुद्ध करनेकी बात कहकर यही भाव दिखलाया है* ॥५४॥
**सम्बन्ध—**अब प्रत्याहारका फल बतलाकर इस द्वितीय पादकी समाप्ति करते हैं—
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥५५॥
'उससे (प्रत्याहारसे) इन्द्रियोंकी परम वश्यता हो जाती है।'
**व्याख्या—**प्रत्याहार सिद्ध हो जानेपर योगीकी इन्द्रियाँ उसके सर्वथा वशमें हो जाती हैं, उनकी स्वतन्त्रताका सर्वथा अभाव हो जाता है। प्रत्याहारकी सिद्धि हो जानेके बाद इन्द्रियविजयके लिये अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती ॥५५॥
* यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः । (कठ० १।३।१३)
'बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह वाक् आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो—मनमें विषयोंकी स्फुरणा न रहे।'