पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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गतिको रोकनेका अभ्यास करते-करते प्राणोंकी गतिका निरोध होता है, यही इसकी विशेषता है ॥५१॥
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥
‘उस ( प्राणायामके अभ्यास ) से प्रकाश ( ज्ञान ) का आवरण क्षीण हो जाता है।’
व्याख्या—जैसे-जैसे मनुष्य प्राणायामका अभ्यास करता है, वैसे-ही-वैसे उसके सञ्चित कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश दुर्बल होते चले जाते हैं। ये कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश ही ज्ञानका आवरण ( परदा ) है। इस परदेके कारण ही मनुष्यका ज्ञान ढका रहता है, अतः वह मोहित हुआ रहता है। जब यह परदा दुर्बल होते-होते सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब साधकका ज्ञान सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो जाता है। इसलिये साधकको प्राणायामका अभ्यास अवश्य करना चाहिये। ५२।
सम्बन्ध—प्राणायामका दूसरा फल बतलाते हैं—
धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥
‘तथा धारणाओंमें मनकी योग्यता भी हो जाती है।’
व्याख्या—प्राणायामके अभ्याससे मनमें धारणाकी योग्यता आ जाती है यानी उसे चाहे जिस जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है ॥५३॥
सम्बन्ध—अब प्रत्याहारके लक्षण बतलाते हैं—
स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥
‘अपने विषयोंके सम्बन्धसे रहित होनेपर जो इन्द्रियोंका चित्तके स्वरूपमें तदाकार हो जाना है, वह ‘प्रत्याहार’ है।’
पा० यो० द० ६—