पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है, यह 'स्तम्भवृत्ति' प्राणायाम है; इसे 'कुम्भक' प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है। कोई-कोई टीकाकार इसे केवल कुम्भक कहते हैं और कोई-कोई चौथे प्राणायामको केवल कुम्भक कहते हैं। इस तीसरे और अगले सूत्रमें बतलाये हुए चौथे प्राणायामके भेदका निर्णय करनेमें बहुत मतभेद है।
साधक किसी भी प्राणायामका अभ्यास करें, उसके साथ मन्त्र अवश्य रहना चाहिये ॥५०॥
सम्बन्ध—चौथे प्राणायामका वर्णन करते हैं—
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥
'बाहर और भीतरके विषयोंका त्याग कर देनेसे अपने-आप होनेवाला चौथा प्राणायाम है।'
व्याख्या—बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे अर्थात् इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको इष्टचिन्तनमें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके ज्ञानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस किसी देशमें रुक जाती है, वह चौथा प्राणायाम है। यह पहले बतलाये हुए तीन प्रकारके प्राणायामोंसे सर्वथा भिन्न है, यह बात दिखलानेके लिये सूत्रमें 'चतुर्थः' पदका प्रयोग किया गया है।
यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है। इसमें मनकी चञ्चलता शान्त होनेके कारण अपने-आप प्राणोंकी गति रुकती है और पहले बतलाये हुए प्राणायामोंमें प्रयत्नद्वारा प्राणोंकी