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पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

८४ | पातञ्जलयोगदर्शन

व्याख्या—जिस ध्येय वस्तुमें चित्तको लगाया जाय, उसीमें चित्तका एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी वृत्तिका प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी वृत्तिका न उठना 'ध्यान' है ॥२॥

सम्बन्ध—समाधिका स्वरूप बतलाते हैं—

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥३॥

'जब ( ध्यानमें ) केवल ध्येयमात्रकी ही प्रतीति होती है और चित्तका निज स्वरूप शून्य-सा हो जाता है, तब वही ( ध्यान ही ) 'समाधि' हो जाता है।'

व्याख्या—ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकारमें परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका अभाव-सा हो जाता है, उसकी ध्येयसे भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यानका ही नाम 'समाधि' हो जाता है। यही लक्षण निर्वितर्क समापत्तिके नामसे पहले पादमें किया गया है ( योग० १ । ४३ ) ॥३॥

सम्बन्ध—उक्त तीनों साधनोंका साङ्केतिक नाम बतलाते हैं—

त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥

'किसी एक ध्येय विषयमें तीनोंका होना 'संयम' है।'

व्याख्या—किसी एक ध्येय पदार्थमें तीनों होनेसे 'संयम' कहलाता है। अतः इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ किसी विषयमें संयम करनेको कहा जाय या संयमका फल बतलाया जाय तो संयमके नामसे किसी एक ध्येयमें तीनोंका होना समझ लेना चाहिये ॥४॥

विभूतिपाद-३
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**सम्बन्ध—**संयमकी सिद्धिका फल बतलाते हैं—

तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥

'उसको जीत लेनेसे बुद्धिका प्रकाश होता है।'

**व्याख्या—**साधन करते-करते जब योगी संयमपर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् चित्तमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि जिस विषयमें वह संयम करना चाहे, उसीमें तत्काल संयम हो जाता है, उस समय योगीको बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धिमें अलौकिक ज्ञानशक्ति आ जाती है, इसीको प्रथम पादमें अध्यात्मप्रसादके नामसे कहा है (योग० १ । ४७-४८) ॥५॥

**सम्बन्ध—**संयमके प्रयोगकी विधिका वर्णन करते हैं—

तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥

'उस (संयम) का (क्रमसे) भूमियोंमें विनियोग करना चाहिये।'

**व्याख्या—**पहले स्थूल विषयमें संयम करना चाहिये। वह स्थिर हो जानेपर सूक्ष्म विषयोंमें क्रमसे संयम करना चाहिये। इसी प्रकार जिस-जिस स्थलमें संयम स्थिर होता जाय, उस-उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये ॥६॥

**सम्बन्ध—**उक्त तीनों साधनोंकी विशेषता बतलाते हैं—

त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥

'पहले कहे हुओंकी अपेक्षा ये तीनों (साधन) अन्तरङ्ग हैं।'

**व्याख्या—**इसके पहले अर्थात् दूसरे पादमें जो योगके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार—ये पाँच अङ्ग बताये गये हैं,

८६ पातञ्जलयोगदर्शन

उनकी अपेक्षा उपर्युक्त धारणा, ध्यान और समाधि—ये तीनों साधन अन्तरङ्ग हैं; क्योंकि इन तीनोंका योग-सिद्धिके साथ निकटतम सम्बन्ध है ॥७॥

सम्बन्ध—निर्बीज समाधिकी विशेषताका वर्णन करते हैं—

तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥८॥

‘वे (ऊपर कहे हुए धारणा आदि तीनों) भी निर्बीज समाधिके बहिरङ्ग साधन ही हैं।’

व्याख्या—पर-वैराग्यकी दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके संस्कारोंका भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि सिद्ध होती है (योग० १।५१)। अतः धारणा, ध्यान और समाधि भी उसके अन्तरङ्ग साधन नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंका अभाव किया जाता है (योग० १।१८), किसी भी ध्येयमें चित्तको स्थिर करनेका अभ्यास नहीं किया जाता ॥८॥

सम्बन्ध—गुणोंका स्वभाव चञ्चल है, उनमें प्रतिक्षण परिणाम होता रहता है; चित्त गुणोंका ही कार्य है, अतः वह भी कभी एक अवस्थामें नहीं रह सकता। अतः निरोध-समाधिके समय उसका कैसा परिणाम होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं—

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षण-चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥

‘व्युत्थान-अवस्थाके संस्कारोंका दब जाना और निरोध-अवस्थाके संस्कारोंका प्रकट हो जाना—यह निरोधकालमें संस्कारानुगत चित्तका निरोध-परिणाम है।’

विभूतिपाद-३ ८७

व्याख्या— निरोधसमाधिमें चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अभाव हो जानेपर भी उनके संस्कारोंका नाश नहीं होता। उस कालमें केवल संस्कार ही शेष रहते हैं, यह बात पहले पादमें कही है (योग० १।१८)। अतः निरोधकालमें चित्त व्युत्थान और निरोध-दोनों ही प्रकारके संस्कारोंमें व्याप्त रहता है; क्योंकि चित्त धर्मी है और संस्कार उसके धर्म हैं, धर्मी अपने धर्ममें सदैव व्याप्त रहता है, यह नियम है (योग० ३।१४)। उस निरोधकालमें जो व्युत्थानके संस्कारोंका दब जाना और निरोध-संस्कारोंका प्रकट हो जाना है, यह संस्कारोंमें व्याप्त चित्तका व्युत्थानधर्मसे निरोधधर्ममें परिणत होनारूप निरोध-परिणाम है।* निरोध-समाधिकी अपेक्षा संप्रज्ञात समाधि भी व्युत्थान-अवस्था ही है (योग० ३।८)। अतः उसके संस्कारोंको यहाँ व्युत्थान-संस्कारोंके ही अन्तर्गत समझना चाहिये ॥९॥

सम्बन्ध— इसके बाद क्या होता है, सो बतलाते हैं—


* यहाँ समाधि-परिणाम और एकाग्रता-परिणामके लक्षण पहले न करके पहले निरोध-परिणामका स्वरूप बतलाया है। इसका यह कारण मालूम होता है कि आठवें सूत्रमें निरोध-समाधिका वर्णन आ गया। इसलिये पहले निरोध-परिणामका लक्षण बतलाना आवश्यक हो गया; क्योंकि पहले (योग० १।५१ में) निरोध-समाधिका लक्षण करते हुए सब वृत्तियोंके निरोधसे निर्बीज समाधिका होना बतलाया है। अतः उसमें परिणाम न होनेकी धारणा स्वाभाविक हो जाती है; परंतु जबतक चित्तकी गुणोंसे भिन्न सत्ता रहती है, वह अपने कारणमें विलीन नहीं हो जाता; तबतक उसमें परिणाम होना अनिवार्य है। इसलिये निरोध-परिणाम किस प्रकार होता है, यह जाननेकी इच्छा स्वाभाविक हो जाती है।

८८पातञ्जलयोगदर्शन

तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ १० ॥

'संस्कारबलसे उस चित्तकी प्रशान्तवाहिता स्थिति होती है।'

व्याख्या—पहले सूत्रके कथनानुसार जब व्युत्थानके संस्कार सर्वथा दब जाते हैं और निरोधके संस्कार बढ़कर भरपूर हो जाते हैं, उस समय उस संस्कारमात्र शेष चित्तमें निरोधसंस्कारोंकी अधिकतासे केवल निर्मल निरोधसंस्कारधारा चलती रहती है अर्थात् केवल निरोध-संस्कारोंका ही प्रवाह चलता रहता है। यह निरुद्धचित्तका अवस्था-परिणाम है ॥ १० ॥

सम्बन्ध—अब संप्रज्ञात-समाधिमें चित्तका जैसा परिणाम होता है, उसका वर्णन करते हैं—

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ११ ॥

'सब प्रकारके विषयोंका चिन्तन करनेकी वृत्तिका क्षय हो जाना और किसी एक ही ध्येय विषयको चिन्तन करनेवाली एकाग्रता-अवस्थाका उदय हो जाना—यह चित्तका समाधि-परिणाम है।'

व्याख्या—निरोध-समाधिके पहले जब योगीका संप्रज्ञात योग सिद्ध होता है, उस समय चित्तकी विक्षिप्तावस्थाका क्षय होकर एकाग्र-अवस्थाका उदय हो जाता है। निर्वितर्क और निर्विचार संप्रज्ञात समाधिमें केवल ध्येयमात्रका ही ज्ञान रहता है, चित्तके निज स्वरूपतकका भान नहीं रहता (योग० १। ४३), वह चित्तका विक्षिप्तावस्थासे एकाग्र-अवस्थामें परिणत हो जानारूप समाधि-परिणाम है ॥ ११ ॥

विभूतिपाद-३

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**सम्बन्ध—**उसके बादकी स्थितिका वर्णन करते हैं—

ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥१२॥

'उसके बाद फिर जब शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली दोनों ही वृत्तियाँ एक-सी हो जाती हैं, तब वह चित्तका एकाग्रता-परिणाम है।'

**व्याख्या—**जब चित्त विक्षिप्त-अवस्थासे एकाग्र-अवस्थामें प्रवेश करता है, उस समय चित्तका जो परिणाम होता है, उसका नाम समाधि-परिणाम है। जब चित्त भलीभाँति समाहित हो चुकता है, उसके बाद जो चित्तमें परिणाम होता रहता है, उसे एकाग्रता-परिणाम कहते हैं। उसमें शान्त होनेवाली वृत्ति और उदय होनेवाली वृत्ति एक-सी ही होती है।

पहले कहे हुए समाधि-परिणाममें तो शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद होता है; किन्तु इसमें शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद नहीं होता, यही समाधि-परिणाममें और एकाग्रता-परिणाममें अन्तर है। संप्रज्ञात-समाधिकी प्रथम अवस्थामें समाधि-परिणाम होता है और उसकी परिपक्व-अवस्थामें एकाग्रता-परिणाम होता है। इस एकाग्रता-परिणामके समय होनेवाली स्थितिको ही पहले पादमें निर्विचार समाधिकी निर्मलताके नामसे कहा है (योग० १ । ४७) ॥१२॥

**सम्बन्ध—**उपर्युक्त परिणामोंके नाम बतलाते हुए उनके उदाहरणसे अन्य समस्त वस्तुओंमें होनेवाले परिणामोंकी व्याख्या करते हैं—

९० पातञ्जलयोगदर्शन

एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥१३॥

'( ऊपर जो चित्तके परिणाम बतला चुके हैं, ) इसीसे पाँचों भूतोंमें और सब इन्द्रियोंमें होनेवाले धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम—( इन तीनों परिणामों ) की व्याख्या कर दी गयी।'

व्याख्या—पहले नवें और दसवें सूत्रमें तो निरोध-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणामका वर्णन किया गया है तथा ग्यारहवें और बारहवें सूत्रमें संप्रज्ञात-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणामका वर्णन किया गया है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें ये परिणाम बराबर होते रहते हैं; क्योंकि तीनों ही गुण परिणामी हैं, अतः उनके कार्योंमें परिवर्तन होते रहना अनिवार्य है। इसलिये इस सूत्रमें यह बात कही गयी है कि ऊपरके वर्णनसे ही पाँचों भूतोंमें और समस्त इन्द्रियोंमें होनेवाले धर्म, लक्षण और अवस्था-परिणामोंको समझ लेना चाहिये। इनका भेद उदाहरणसहित समझाया जाता है।

यह ध्यानमें रखना चाहिये कि सांख्य और योगके सिद्धान्तमें कोई भी पदार्थ बिना हुए उत्पन्न नहीं होता। जो कुछ वस्तु उत्पन्न होती है, वह उत्पन्न होनेसे पहले भी अपने कारणमें विद्यमान थी और लुप्त होनेके बाद भी विद्यमान रहेगी।

(१) धर्म-परिणाम—जब किसी धर्मीमें एक धर्मका लय

विभूतिपाद-३

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होकर दूसरे धर्मका उदय होता है, उसे 'धर्म-परिणाम' कहते हैं; जैसे नवें सूत्रमें चित्तरूप धर्मीके व्युत्थानसंस्काररूप धर्मका दब जाना और निरोधसंस्काररूप धर्मका प्रकट होना बतलाया गया है । यही धर्मोंमें विद्यमान रहनेवाले चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी प्रकार ग्यारहवें सूत्रमें जो सर्वार्थतारूप धर्मका क्षय और एकाग्रतारूप धर्मका उदय बतलाया गया है, यह भी चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी तरह मिट्टीमें पिण्डरूप धर्मका क्षय और घटरूप धर्मका उदय होना, फिर घटरूप धर्मका क्षय और ठीकरी (फूटे हुए घटके टुकड़े) रूप धर्मका उदय होना—सब प्रकारके धर्मोंमें विद्यमान रहनेवाले मिट्टीरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी तरह अन्य समस्त वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये ।

(२) लक्षण-परिणाम—यह परिणाम भी धर्म-परिणामके साथ-साथ हो जाता है । यह लक्षण-परिणाम धर्ममें होता है । वर्तमान धर्मका नष्ट हो जाना उसका अतीत लक्षण-परिणाम है, अनागत धर्मका प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है और प्रकट होनेसे पहले वह अनागत लक्षणवाला रहता है । इन तीनोंको धर्मका 'लक्षण-परिणाम' कहते हैं । ग्यारहवें सूत्रमें जो चित्तके सर्वार्थता-धर्मका क्षय होना बतलाया गया है, वह उसका अतीत लक्षण-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्मका उदय होना बतलाया है, वह उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है । उदय होनेसे पहले वह अनागत लक्षण-परिणाममें था । इसी प्रकार दूसरी वस्तुओंके परिणामोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये ।

(३) अवस्था-परिणाम—जो वर्तमान लक्षणयुक्त धर्ममें

९२ पातञ्जलयोगदर्शन

नयापनसे पुरानापन आता जाता है, वह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है और फिर वर्तमान लक्षणको छोड़कर अतीत लक्षणमें चला जाता है, यह लक्षणका 'अवस्था-परिणाम' है । एकादश सूत्रके वर्णनानुसार जब चित्तरूप धर्मीका वर्तमान लक्षणवाला सर्वार्थतारूप धर्म दबकर अतीत लक्षणको प्राप्त होता है, उस वर्तमान कालमें जो उसके दबनेका क्रम है, वह उसका अवस्था-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्म अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें आता है, तब उसका जो उदय होनेका क्रम है, वह भी अवस्था-परिणाम है । इस प्रकार यह एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थामें परिवर्तन होते जाना ही अवस्था-परिणाम है । यह अवस्था-परिणाम प्रतिक्षण होता रहता है । कोई भी त्रिगुणमय वस्तु क्षणभर भी एक अवस्थामें नहीं रहती । यही बात दसवें और बारहवें सूत्रोंमें निरोधधर्मके और एकाग्रधर्मके वर्तमान लक्षण-परिणाममें एक ही प्रकारके संस्कार और वृत्तियोंका क्षय और उदय बतलाकर दिखलायी गयी है । हम बालकसे जवान और जवानसे बूढ़े किसी एक दिनमें या एक घड़ीमें नहीं हुए, हमारा यह अवस्था-परिणाम अर्थात् अवस्थाका परिवर्तन प्रतिक्षणमें होता हुआ ही यहाँतक पहुँचा है । इसीको अवस्था-परिणाम कहते हैं । यह परिणाम विचारद्वारा समझमें आता है, सहसा प्रतीत नहीं होता; आगे कहेंगे भी कि क्रमका ज्ञान परिणामके अवसानमें होता है ( योग० ४ । ३३ ) ।

धर्म-परिणाममें तो धर्मीके धर्मका परिवर्तन होता है, लक्षण-परिणाममें पहले धर्मका अतीत हो जाना और नये धर्मका वर्तमान हो जाना—इस प्रकार धर्मका लक्षण बदलता है और

विभूतिपाद-३

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अवस्था-परिणाममें धर्मके वर्तमान लक्षणसे युक्त रहते हुए ही उसकी अवस्था बदलती रहती है। पहले परिणामकी अपेक्षा दूसरा सूक्ष्म है और दूसरेकी अपेक्षा तीसरा सूक्ष्म है ॥१३॥

सम्बन्ध—धर्म और धर्मीका विवेचन करनेके लिये धर्मीका स्वरूप बतलाते हैं—

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥१४॥

‘अतीत, वर्तमान और आनेवाले धर्मोंमें जो अनुगत रहता है (आधाररूपमें विद्यमान रहता है), वह धर्मी है।’

व्याख्या—द्रव्यमें सदा विद्यमान रहनेवाली अनेकों शक्तियोंका नाम धर्म है और उसके आधारभूत द्रव्यका नाम धर्मी है। भाव यह है कि जिस कारणरूप पदार्थसे जो कुछ बन चुका है, जो बना हुआ है और जो बन सकता है, वे सब उसके धर्म हैं। वे एक धर्मीमें अनेक रहते हैं तथा अपने-अपने निमित्तोंके मिलनेपर प्रकट और शान्त होते रहते हैं। उनके तीन भेद इस प्रकार हैं—

(१) अव्यपदेश्य—जो धर्म धर्मीमें शक्तिरूपसे विद्यमान रहते हैं, व्यवहारमें आने लायक न होनेके कारण जिनका निर्देश नहीं किया जा सकता, वे ‘अव्यपदेश्य’ कहलाते हैं। इन्हींको अनागत या आनेवाले भी कहते हैं। जैसे जलमें बर्फ और मिट्टीमें बर्तन अपना व्यापार करनेके लिये प्रकट होनेसे पहले शक्तिरूपमें छिपे रहते हैं।

(२) उदित—जो धर्म पहले शक्तिरूपसे धर्मीमें छिपे

९४ पातञ्जलयोगदर्शन

हुए थे, वे जब अपना कार्य करनेके लिये प्रकट हो जाते हैं, तब 'उदित' कहलाते हैं। इन्हींको वर्तमान भी कहते हैं। जैसे जलमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्फका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना, मिट्टीमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्तनोंका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना।

( ३ ) जो धर्म अपना व्यापार पूरा करके धर्मीमें विलीन हो जाते हैं, वे 'शान्त' कहलाते हैं, इन्हींको अतीत भी कहते हैं। जैसे बर्फका गलकर जलमें विलीन हो जाना और घड़ेका फूटकर मिट्टीमें विलीन हो जाना।

धर्मोंकी शान्त, उदित और अव्यपदेश्य—इन तीनों स्थितियोंमें ही धर्मी सदा ही अनुगत रहता है। किसी भी कालमें धर्मीके बिना धर्म नहीं रहते ॥१४॥

**सम्बन्ध—**एक ही धर्मीके भिन्न-भिन्न अनेक धर्म-परिणाम कैसे होते हैं, यह बतलाते हैं—

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥१५॥

'परिणामकी भिन्नतामें क्रमकी भिन्नता कारण है।'

**व्याख्या—**एक ही द्रव्यका किसी एक क्रमसे जो परिणाम होता है, दूसरे क्रमसे उससे भिन्न दूसरा ही परिणाम होता है, अन्य प्रकारके क्रमसे तीसरा ही परिणाम होता है। जैसे हमें रूईसे वस्त्र बनाना है तो पहले रूईको धुनकर उसकी पूनी बनाकर चरखेपर कातकर उसका सूत बनाना पड़ेगा, फिर उस सूतका लंबा ताना करेंगे, फिर उसे सानेमेंसे पार करके रोलरपर चढ़ायेंगे,

विभूतिपाद-३ ९५

फिर 'वै'मेंसे पार करके उसके आधे तन्तुओंको ऊपर उठायेंगे, आधोंको नीचे ले जायँगे और बीचमें भरनीका सूत फेंककर उस धागेको यथास्थान बैठायेंगे, फिर ऊपरवाले धागोंको नीचे लायेंगे और नीचेवालोंको ऊपर ले जायेंगे, इस तरह क्रमसे करते रहनेपर अन्तमें वस्त्ररूपमें रूईका परिणाम होगा। पर यदि हमें उसी रूईसे दीपककी बत्ती बनानी है तो उसे कुछ फैलाकर थोड़ा बट दे देनेसे तुरंत बन जायगी और यदि कुएँमेंसे जल निकालनेकी रस्सी बनानी है तो पहले सूत बनाकर उन धागोंको तीन या चार भागोंमें लंबा करके बट लगानेसे रस्सी बन जायगी। इनमें भी जैसा वस्त्र या जैसी बत्ती या जिस प्रकारकी रस्सी बनानी है, वैसे ही उनमें क्रमका भेद करना पड़ेगा। इसी तरह दूसरी वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये।

इससे यह सिद्ध हो गया कि क्रममें परिवर्तन करनेसे एक ही धर्मी भिन्न-भिन्न नाम-रूपवाले धर्मोंसे युक्त हो जाता है, उसके परिणामकी भिन्नताका कारण क्रमकी भिन्नता ही है, दूसरा कुछ नहीं। क्रमकी भिन्नता सहकारी कारणोंके सम्बन्धसे होती है। जैसे ठण्डके सम्बन्धसे जलमें बर्फरूप धर्मके प्रकट होनेका क्रम चलता है और गर्मीके संयोगसे स्टीम (भाप) बननेका क्रम आरम्भ हो जाता है॥१५॥

**सम्बन्ध—**उक्त संयम किस ध्येय वस्तुमें सिद्ध कर लेनेपर उससे क्या फल मिलता है, इसका वर्णन यहाँसे इस पादकी समाप्तिपर्यन्त किया गया है। इनको ही योगकी 'विभूति' अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकारका महत्त्व कहते हैं। (इन सबको समझकर

९६पातञ्जलयोगदर्शन

योगीको चाहिये कि अपने लिये जो सबसे बढ़कर फल मालूम पड़े, उसे चुन ले । )

ऊपर तीन प्रकारके परिणामोंका वर्णन किया गया; अतः पहले इनमें संयम करनेका फल बतलाते हैं—

परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥१६॥

‘(उक्त ) तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे अतीत ( भूत ) और अनागत ( भविष्य—होनहार ) का ज्ञान हो जाता है ।’

व्याख्या—धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम—इस प्रकार जिन तीन परिणामोंका पहले वर्णन किया गया है, उन तीनों परिणामोंमें संयम अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि कर लेनेसे योगीको उनका साक्षात्कार होकर भूत और भविष्यका ज्ञान हो जाता है । अभिप्राय यह है कि जिस वर्तमान वस्तुके विषयमें योगी यह जानना चाहे कि इसका मूल कारण क्या है और यह किस ढंगसे बदलती हुई, कितने कालमें वर्तमान रूपमें आयी है और भविष्यमें किस प्रकार बदलती हुई कितने कालमें किस प्रकार अपने कारणमें विलीन होगी, तो ये सब बातें उक्त तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे जान सकता है ॥१६॥

सम्बन्ध—इसी प्रकार अब दूसरी विभूतियोंका वर्णन करते हैं—

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥१७॥

‘शब्द, अर्थ और ज्ञान-इन तीनोंका जो एकमें दूसरेका अध्यास हो जानेके कारण मिश्रण हो रहा है, उसके विभागमें संयम करनेसे संपूर्ण प्राणियोंकी वाणीका ज्ञान हो जाता है ।’

विभूतिपाद-३ ९७

व्याख्या—वस्तुके नाम, रूप और ज्ञान—यह तीनों यद्यपि परस्पर भिन्न हैं; जैसे 'घट' यह शब्द मिट्टीसे बने हुए जिस पदार्थका संकेत करता है, उस पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है। इसी प्रकार उस घटरूप पदार्थकी जो प्रतीति होती है, वह चित्तकी वृत्तिविशेष है, अतः वह भी घटरूप पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है; क्योंकि शब्द वाणीका धर्म है, घटरूप पदार्थ मिट्टीका धर्म है और वृत्ति चित्त-का धर्म है; तथापि तीनोंका मिश्रण हुआ रहता है। अतः जब योगी विचारद्वारा इनके विभागको समझकर उस विभागमें संयम कर लेता है, तब उसको समस्त प्राणियोंकी वाणीके अर्थका ज्ञान हो जाता है* ॥१७॥

संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥१८॥

‘(संयमद्वारा) संस्कारोंका साक्षात् कर लेनेसे पूर्वजन्मों-का ज्ञान हो जाता है।’

व्याख्या—प्राणी जो कुछ कर्म करता है, एवं अपने इन्द्रियों और मन-बुद्धिद्वारा जो कुछ अनुभव करता है, वे सब उसके अन्तःकरणमें संस्काररूपमें सञ्चित रहते हैं। उक्त संस्कार दो प्रकारके होते हैं—एक वासनारूप, जो कि स्मृतिके हेतु हैं, दूसरे धर्माधर्मरूप, जो कि जाति, आयु और भोगके हेतु हैं—ये दोनों


* सूत्रकारने जिस संयमका जो फल बतलाया है, उसका अनुवादमात्र मैंने कर दिया है। उस संयमका वह फल कैसे होता है और क्यों होता है—यह मेरी समझके बाहरकी बात है; क्योंकि मैं योगी नहीं हूँ और मैंने कभी किसी संयमको सिद्ध करके उसका फल प्राप्त भी नहीं किया है, इस परिस्थितिमें उसके विषयमें कुछ भी लिखना मेरी समझमें उचित नहीं है।

पा० यो० द० ७—

९८पातञ्जलयोगदर्शन

ही प्रकारके संस्कार अनेक जन्म-जन्मान्तरोंसे संगृहीत होते आ रहे हैं । उन संस्कारोंमें संयम करके उनको प्रत्यक्ष कर लेनेसे योगीको पूर्वजन्मका ज्ञान हो जाता है । जैसे अपने पूर्व संस्कारोंके साक्षात्कारसे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होता है, उसी प्रकार दूसरेके संस्कारोंमें संयम करनेसे उसके पूर्वजन्मका भी ज्ञान हो सकता है ॥१८॥

प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥१९॥

‘दूसरेके चित्तका ( संयमद्वारा ) साक्षात्कार कर लेनेसे दूसरेके चित्तका ज्ञान हो जाता है ।’

व्याख्या—श्रीविज्ञानभिक्षुका अर्थ है कि संयमद्वारा अपने चित्तकी वृत्तिका साक्षात्कार कर लेनेसे योगी संकल्पमात्रसे ही दूसरेके चित्तको जान लेता है कि यह कुछ चिन्तन करनेमें लग रहा है या नहीं । किंतु दूसरे टीकाकारोंने यह अर्थ स्वीकार नहीं किया है ।

इस ग्रन्थमें प्रायः चित्तकी वृत्तिविशेषको या ज्ञानको ही प्रत्यय नामसे कहा गया है । किंतु यहाँ दूसरे टीकाकारोंने प्रत्ययका अर्थ चित्तवृत्ति न लेकर चित्त लिया है; क्योंकि इस सूत्रमें उसके साक्षात्कारका फल चित्तका ज्ञान कहा है और अगले सूत्रमें वृत्ति-सहित ज्ञानका निषेध किया है तथा इस सूत्रमें यह स्पष्ट नहीं है कि किसके चित्तसाक्षात्कारका यह फल बतलाया गया है । किंतु फलमें ‘पर’ शब्दका प्रयोग देखकर साक्षात्कार भी दूसरेके ही चित्तका माना है । वास्तवमें क्या बात है, ठीक समझमें नहीं आती ॥१९॥

सम्बन्ध—उसीको स्पष्ट करते हैं—

विभूतिपाद-३ ९९

न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥२०॥

'वह ज्ञान आलम्बनसहित नहीं होता, क्योंकि ( वैसा चित्त ) योगीके चित्तका विषय नहीं है।'

व्याख्या—चित्तके साक्षात्कारसे योगीको जो दूसरेके चित्तका ज्ञान होता है, वह केवल चित्तके स्वरूपमात्रका ही होता है, उस चित्तके आलम्बनका यानी उसका चित्त जिस वस्तुका चिन्तन कर रहा है, उसका ज्ञान नहीं होता; क्योंकि योगीके चित्तका विषय दूसरेका चित्त है, उसका आलम्बन नहीं ॥२०॥

सम्बन्ध—अब दूसरी सिद्धिका वर्णन करते हैं—

कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुः- प्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥२१॥

'शरीरके रूपमें संयम कर लेनेसे जब उसकी ग्राह्यशक्ति रोक ली जाती है, तब चक्षुके प्रकाशका उसके साथ सम्बन्ध न होनेके कारण योगी अन्तर्धान हो जाता है।'

व्याख्या—जब योगी अपने शरीरके रूपमें संयम कर लेता है, तब वह दूसरेके देखनेमें आनेवाली शरीरकी दृश्यताशक्तिका संकल्पमात्रसे अवरोध कर सकता है; उसका अवरोध कर लेनेपर दूसरोंके नेत्रोंकी प्रकाशशक्तिसे उसका सम्बन्ध नहीं होता, इस कारण उसे कोई नहीं देख सकता। इसका नाम अन्तर्धान है।

इसी तरह यदि योगी शब्दमें संयम कर लेता है तो उसके शब्दको कोई नहीं सुन सकता। यदि शरीरके स्पर्शमें संयम कर

१०० पातञ्जलयोगदर्शन

लेता है तो उसे कोई छू नहीं सकता—इत्यादि सिद्धियाँ भी उपलक्षण-से समझ लेनी चाहिये ॥२१॥

**सम्बन्ध—**अन्य सिद्धिका वर्णन करते हैं—

सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त-
ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥२२॥

'उपक्रमसहित और उपक्रमरहित—ऐसे दो प्रकारके कर्म होते हैं। उनमें संयम कर लेनेसे (योगीको) मृत्युका ज्ञान हो जाता है अथवा अरिष्टोंसे भी (मृत्युका ज्ञान हो जाता है)।'

**व्याख्या—**जिन कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्यकी आयुका निर्माण होता है, वे दो प्रकारके होते हैं—(१) सोपक्रम—जिनके फलका आरम्भ हो चुका है, जो कि अपना फल देनेमें लगे हुए हैं, (२) निरुपक्रम—जिनके फल-भोगका आरम्भ नहीं हुआ है। इन दोनों प्रकारके कर्मोंमें संयम करके जब मनुष्य इनको इस तरह प्रत्यक्ष कर लेता है कि कौन-कौन-से कर्म कितने अंशमें अपना फल दे चुके हैं और कौन-से कर्मोंका कितना फल-भोग बाकी है और इनकी गतिके हिसाबसे कितने कालमें दोनों प्रकारके समस्त कर्मोंकी समाप्ति हो जायगी, तब उसे अपनी मृत्युका अर्थात् शरीरनाशके समयका पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है।

इसके सिवा, अरिष्टोंसे अर्थात् बुरे चिह्नोंसे भी मृत्युका ज्ञान हो जाता है, परंतु यह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है, अनुमान-ज्ञान है ॥२२॥

विभूतिपाद-३ १०१

मैत्र्यादिषु बलानि ॥२३॥

‘मैत्री आदि भावनाओंमें संयम करनेसे ( मैत्री आदि विषयक ) बल मिलते हैं।’

**व्याख्या—**पहले ( योग० १ । ३३ में ) मैत्री, करुणा और मुदिता—इन तीन प्रकारकी भावनाओंका वर्णन है; चौथी जो उपेक्षा है, वह भावना नहीं है, भावनाका त्याग है। उनमेंसे पहली जो सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना है, उसमें संयम करनेसे योगीको मित्रताकी सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है अर्थात् वह सबका मित्र बनकर उनको सुख पहुँचानेमें समर्थ हो जाता है। दूसरी जो दुखी मनुष्योंमें करुणाकी भावना है, उसमें संयम करनेसे योगीको करुणाबल प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसका स्वभाव परम दयालु हो जाता है और उसमें हरेक प्राणीके दुःखोंको दूर करनेकी सामर्थ्य आ जाती है। तीसरी जो पुण्यात्मा मनुष्योंमें मुदिताकी भावना है, उसमें संयम करनेसे मुदिताका बल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह ईर्ष्याके दोषसे सर्वथा शून्य हो जाता है और सदैव प्रसन्न रहता है। कोई भी परिस्थिति उसके मनमें किञ्चिन्मात्र भी चिन्ता, शोक या भयकी वृत्ति उत्पन्न नहीं कर सकती तथा वह दूसरोंको भी अपनी ही भाँति प्रसन्न बनानेमें समर्थ हो जाता है ॥२३॥

बलेषु हस्तिबलादीनि ॥२४॥

‘( भिन्न-भिन्न ) बलोंमें संयम करनेसे हाथी आदिके सदृश ( संयमके अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकारके ) बल प्राप्त होते हैं।’

**व्याख्या—**यदि वह हाथीके बलमें संयम करता है तो उसे हाथीके समान बल मिल जाता है, यदि गरुड़के बलमें संयम

१०२ पातञ्जलयोगदर्शन

करता है तो गरुड़के समान बल मिल जाता है, यदि वायुके बलमें संयम करतां है तो वायुके समान बल मिलता है। इसी तरह जिसके बलमें संयम करता है, वैसा ही बल उसे प्राप्त हो जाता है ॥२४॥

प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहित-

विप्रकृष्टज्ञानम् ॥२५॥

'ज्योतिष्मती प्रवृत्तिका प्रकाश डालनेसे सूक्ष्म व्यवधान-युक्त और दूर देशमें स्थित विषयोंका ज्ञान हो जाता है।'

व्याख्या—तीन प्रकारकी वस्तुओंका प्रत्यक्ष साधारणतया इन्द्रियोंसे नहीं हो सकता। एक तो जो वस्तु अत्यन्त सूक्ष्म होती है, जैसे परमाणु, महत्तत्त्व, प्रकृति आदि; दूसरी व्यवहित अर्थात् जो किसी परदेमें छिपी हो, जैसे समुद्रमें रत्न, खानमें सुवर्ण, मणि आदि; तीसरी विप्रकृष्ट अर्थात् जो दूर देशमें वर्तमान हो, जैसे हम आसाममें बैठे हैं और वस्तु मारवाड़में पड़ी है अथवा यों समझिये कि हम हिंदुस्थानमें हैं और वस्तु अमेरिकामें पड़ी है। इनमेंसे किसी भी वस्तुको जाननेके लिये जब योगी पहले पादके छत्तीसवें सूत्रमें और इस पादके पाँचवें सूत्रमें वर्णित ज्योतिष्मती अर्थात् प्रकाशवती प्रवृत्तिके प्रकाशको उसपर छोड़ता है, तब उसी समय वह योगीके प्रत्यक्ष हो जाती है ॥२५॥

भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥२६॥

'सूर्यमें संयम करनेसे समस्त लोकोंका ज्ञान हो जाता है।'

व्याख्या—पुराणोंमें चौदह भुवनोंका वर्णन आता है, उनमेंसे एक भूलोक है; उन चौदहों भुवनोंका ज्ञान सूर्यमें संयम करनेसे हो जाता है। व्यासभाष्यमें इन लोकोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया

विभूतिपाद-३ १०३

गया है; परन्तु आध्यात्मिक साधनके लिये उपयोगी न समझकर मैंने यहाँ उनका वर्णन नहीं किया है। इसके सिवा यह बात भी है कि इनके विषयका वर्णन ठीक-ठीक समझमें भी नहीं आता ॥२६॥

चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥२७॥

'चन्द्रमामें संयम करनेसे सब तारोंके व्यूहका (स्थान-विशेषका) ज्ञान हो जाता है।'

**व्याख्या—**चन्द्रमामें संयम करनेसे कौन तारा किस स्थानमें टिका है, इसका यथावत् ज्ञान हो जाता है ॥२७॥

**सम्बन्ध—**उसके बाद—

ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥२८॥

'ध्रुवतारेमें संयम करनेसे उन ताराओंकी गतिका ज्ञान हो जाता है।'

**व्याख्या—**ध्रुव तारा निश्चल है और सब ताराओंकी गतिका उससे सम्बन्ध है; अतः उसमें संयम करनेसे समस्त ताराओंकी गतिका अर्थात् कौन तारा कितने समयमें किस राशि और किस नक्षत्रपर जायगा—इसका पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है ॥२८॥

नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥२९॥

'नाभिचक्रमें संयम करनेसे शरीरके व्यूहका (उसकी स्थितिका) पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है।'

**व्याख्या—**नाभिमें स्थित जो चक्र है, जिसमें शरीरकी समस्त नाड़ियाँ गुँथी हुई हैं, उसमें संयम करनेसे शरीरके व्यूहका ज्ञान हो जाता है अर्थात् शरीरका संगठन किस प्रकार हुआ है, उसमें