पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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योगीको चाहिये कि अपने लिये जो सबसे बढ़कर फल मालूम पड़े, उसे चुन ले । )
ऊपर तीन प्रकारके परिणामोंका वर्णन किया गया; अतः पहले इनमें संयम करनेका फल बतलाते हैं—
परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥१६॥
‘(उक्त ) तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे अतीत ( भूत ) और अनागत ( भविष्य—होनहार ) का ज्ञान हो जाता है ।’
व्याख्या—धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम—इस प्रकार जिन तीन परिणामोंका पहले वर्णन किया गया है, उन तीनों परिणामोंमें संयम अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि कर लेनेसे योगीको उनका साक्षात्कार होकर भूत और भविष्यका ज्ञान हो जाता है । अभिप्राय यह है कि जिस वर्तमान वस्तुके विषयमें योगी यह जानना चाहे कि इसका मूल कारण क्या है और यह किस ढंगसे बदलती हुई, कितने कालमें वर्तमान रूपमें आयी है और भविष्यमें किस प्रकार बदलती हुई कितने कालमें किस प्रकार अपने कारणमें विलीन होगी, तो ये सब बातें उक्त तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे जान सकता है ॥१६॥
सम्बन्ध—इसी प्रकार अब दूसरी विभूतियोंका वर्णन करते हैं—
शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥१७॥
‘शब्द, अर्थ और ज्ञान-इन तीनोंका जो एकमें दूसरेका अध्यास हो जानेके कारण मिश्रण हो रहा है, उसके विभागमें संयम करनेसे संपूर्ण प्राणियोंकी वाणीका ज्ञान हो जाता है ।’