पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूतिपाद-३ ९७
व्याख्या—वस्तुके नाम, रूप और ज्ञान—यह तीनों यद्यपि परस्पर भिन्न हैं; जैसे 'घट' यह शब्द मिट्टीसे बने हुए जिस पदार्थका संकेत करता है, उस पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है। इसी प्रकार उस घटरूप पदार्थकी जो प्रतीति होती है, वह चित्तकी वृत्तिविशेष है, अतः वह भी घटरूप पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है; क्योंकि शब्द वाणीका धर्म है, घटरूप पदार्थ मिट्टीका धर्म है और वृत्ति चित्त-का धर्म है; तथापि तीनोंका मिश्रण हुआ रहता है। अतः जब योगी विचारद्वारा इनके विभागको समझकर उस विभागमें संयम कर लेता है, तब उसको समस्त प्राणियोंकी वाणीके अर्थका ज्ञान हो जाता है* ॥१७॥
संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥१८॥
‘(संयमद्वारा) संस्कारोंका साक्षात् कर लेनेसे पूर्वजन्मों-का ज्ञान हो जाता है।’
व्याख्या—प्राणी जो कुछ कर्म करता है, एवं अपने इन्द्रियों और मन-बुद्धिद्वारा जो कुछ अनुभव करता है, वे सब उसके अन्तःकरणमें संस्काररूपमें सञ्चित रहते हैं। उक्त संस्कार दो प्रकारके होते हैं—एक वासनारूप, जो कि स्मृतिके हेतु हैं, दूसरे धर्माधर्मरूप, जो कि जाति, आयु और भोगके हेतु हैं—ये दोनों
* सूत्रकारने जिस संयमका जो फल बतलाया है, उसका अनुवादमात्र मैंने कर दिया है। उस संयमका वह फल कैसे होता है और क्यों होता है—यह मेरी समझके बाहरकी बात है; क्योंकि मैं योगी नहीं हूँ और मैंने कभी किसी संयमको सिद्ध करके उसका फल प्राप्त भी नहीं किया है, इस परिस्थितिमें उसके विषयमें कुछ भी लिखना मेरी समझमें उचित नहीं है।
पा० यो० द० ७—