पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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ही प्रकारके संस्कार अनेक जन्म-जन्मान्तरोंसे संगृहीत होते आ रहे हैं । उन संस्कारोंमें संयम करके उनको प्रत्यक्ष कर लेनेसे योगीको पूर्वजन्मका ज्ञान हो जाता है । जैसे अपने पूर्व संस्कारोंके साक्षात्कारसे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होता है, उसी प्रकार दूसरेके संस्कारोंमें संयम करनेसे उसके पूर्वजन्मका भी ज्ञान हो सकता है ॥१८॥
प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥१९॥
‘दूसरेके चित्तका ( संयमद्वारा ) साक्षात्कार कर लेनेसे दूसरेके चित्तका ज्ञान हो जाता है ।’
व्याख्या—श्रीविज्ञानभिक्षुका अर्थ है कि संयमद्वारा अपने चित्तकी वृत्तिका साक्षात्कार कर लेनेसे योगी संकल्पमात्रसे ही दूसरेके चित्तको जान लेता है कि यह कुछ चिन्तन करनेमें लग रहा है या नहीं । किंतु दूसरे टीकाकारोंने यह अर्थ स्वीकार नहीं किया है ।
इस ग्रन्थमें प्रायः चित्तकी वृत्तिविशेषको या ज्ञानको ही प्रत्यय नामसे कहा गया है । किंतु यहाँ दूसरे टीकाकारोंने प्रत्ययका अर्थ चित्तवृत्ति न लेकर चित्त लिया है; क्योंकि इस सूत्रमें उसके साक्षात्कारका फल चित्तका ज्ञान कहा है और अगले सूत्रमें वृत्ति-सहित ज्ञानका निषेध किया है तथा इस सूत्रमें यह स्पष्ट नहीं है कि किसके चित्तसाक्षात्कारका यह फल बतलाया गया है । किंतु फलमें ‘पर’ शब्दका प्रयोग देखकर साक्षात्कार भी दूसरेके ही चित्तका माना है । वास्तवमें क्या बात है, ठीक समझमें नहीं आती ॥१९॥
सम्बन्ध—उसीको स्पष्ट करते हैं—