पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूतिपाद-३ ९९
न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥२०॥
'वह ज्ञान आलम्बनसहित नहीं होता, क्योंकि ( वैसा चित्त ) योगीके चित्तका विषय नहीं है।'
व्याख्या—चित्तके साक्षात्कारसे योगीको जो दूसरेके चित्तका ज्ञान होता है, वह केवल चित्तके स्वरूपमात्रका ही होता है, उस चित्तके आलम्बनका यानी उसका चित्त जिस वस्तुका चिन्तन कर रहा है, उसका ज्ञान नहीं होता; क्योंकि योगीके चित्तका विषय दूसरेका चित्त है, उसका आलम्बन नहीं ॥२०॥
सम्बन्ध—अब दूसरी सिद्धिका वर्णन करते हैं—
कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुः- प्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥२१॥
'शरीरके रूपमें संयम कर लेनेसे जब उसकी ग्राह्यशक्ति रोक ली जाती है, तब चक्षुके प्रकाशका उसके साथ सम्बन्ध न होनेके कारण योगी अन्तर्धान हो जाता है।'
व्याख्या—जब योगी अपने शरीरके रूपमें संयम कर लेता है, तब वह दूसरेके देखनेमें आनेवाली शरीरकी दृश्यताशक्तिका संकल्पमात्रसे अवरोध कर सकता है; उसका अवरोध कर लेनेपर दूसरोंके नेत्रोंकी प्रकाशशक्तिसे उसका सम्बन्ध नहीं होता, इस कारण उसे कोई नहीं देख सकता। इसका नाम अन्तर्धान है।
इसी तरह यदि योगी शब्दमें संयम कर लेता है तो उसके शब्दको कोई नहीं सुन सकता। यदि शरीरके स्पर्शमें संयम कर