भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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१०० पातञ्जलयोगदर्शन

लेता है तो उसे कोई छू नहीं सकता—इत्यादि सिद्धियाँ भी उपलक्षण-से समझ लेनी चाहिये ॥२१॥

**सम्बन्ध—**अन्य सिद्धिका वर्णन करते हैं—

सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त-
ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥२२॥

'उपक्रमसहित और उपक्रमरहित—ऐसे दो प्रकारके कर्म होते हैं। उनमें संयम कर लेनेसे (योगीको) मृत्युका ज्ञान हो जाता है अथवा अरिष्टोंसे भी (मृत्युका ज्ञान हो जाता है)।'

**व्याख्या—**जिन कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्यकी आयुका निर्माण होता है, वे दो प्रकारके होते हैं—(१) सोपक्रम—जिनके फलका आरम्भ हो चुका है, जो कि अपना फल देनेमें लगे हुए हैं, (२) निरुपक्रम—जिनके फल-भोगका आरम्भ नहीं हुआ है। इन दोनों प्रकारके कर्मोंमें संयम करके जब मनुष्य इनको इस तरह प्रत्यक्ष कर लेता है कि कौन-कौन-से कर्म कितने अंशमें अपना फल दे चुके हैं और कौन-से कर्मोंका कितना फल-भोग बाकी है और इनकी गतिके हिसाबसे कितने कालमें दोनों प्रकारके समस्त कर्मोंकी समाप्ति हो जायगी, तब उसे अपनी मृत्युका अर्थात् शरीरनाशके समयका पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है।

इसके सिवा, अरिष्टोंसे अर्थात् बुरे चिह्नोंसे भी मृत्युका ज्ञान हो जाता है, परंतु यह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है, अनुमान-ज्ञान है ॥२२॥