भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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विभूतिपाद-३ १०१

मैत्र्यादिषु बलानि ॥२३॥

‘मैत्री आदि भावनाओंमें संयम करनेसे ( मैत्री आदि विषयक ) बल मिलते हैं।’

**व्याख्या—**पहले ( योग० १ । ३३ में ) मैत्री, करुणा और मुदिता—इन तीन प्रकारकी भावनाओंका वर्णन है; चौथी जो उपेक्षा है, वह भावना नहीं है, भावनाका त्याग है। उनमेंसे पहली जो सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना है, उसमें संयम करनेसे योगीको मित्रताकी सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है अर्थात् वह सबका मित्र बनकर उनको सुख पहुँचानेमें समर्थ हो जाता है। दूसरी जो दुखी मनुष्योंमें करुणाकी भावना है, उसमें संयम करनेसे योगीको करुणाबल प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसका स्वभाव परम दयालु हो जाता है और उसमें हरेक प्राणीके दुःखोंको दूर करनेकी सामर्थ्य आ जाती है। तीसरी जो पुण्यात्मा मनुष्योंमें मुदिताकी भावना है, उसमें संयम करनेसे मुदिताका बल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह ईर्ष्याके दोषसे सर्वथा शून्य हो जाता है और सदैव प्रसन्न रहता है। कोई भी परिस्थिति उसके मनमें किञ्चिन्मात्र भी चिन्ता, शोक या भयकी वृत्ति उत्पन्न नहीं कर सकती तथा वह दूसरोंको भी अपनी ही भाँति प्रसन्न बनानेमें समर्थ हो जाता है ॥२३॥

बलेषु हस्तिबलादीनि ॥२४॥

‘( भिन्न-भिन्न ) बलोंमें संयम करनेसे हाथी आदिके सदृश ( संयमके अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकारके ) बल प्राप्त होते हैं।’

**व्याख्या—**यदि वह हाथीके बलमें संयम करता है तो उसे हाथीके समान बल मिल जाता है, यदि गरुड़के बलमें संयम

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