भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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१०२ पातञ्जलयोगदर्शन

करता है तो गरुड़के समान बल मिल जाता है, यदि वायुके बलमें संयम करतां है तो वायुके समान बल मिलता है। इसी तरह जिसके बलमें संयम करता है, वैसा ही बल उसे प्राप्त हो जाता है ॥२४॥

प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहित-

विप्रकृष्टज्ञानम् ॥२५॥

'ज्योतिष्मती प्रवृत्तिका प्रकाश डालनेसे सूक्ष्म व्यवधान-युक्त और दूर देशमें स्थित विषयोंका ज्ञान हो जाता है।'

व्याख्या—तीन प्रकारकी वस्तुओंका प्रत्यक्ष साधारणतया इन्द्रियोंसे नहीं हो सकता। एक तो जो वस्तु अत्यन्त सूक्ष्म होती है, जैसे परमाणु, महत्तत्त्व, प्रकृति आदि; दूसरी व्यवहित अर्थात् जो किसी परदेमें छिपी हो, जैसे समुद्रमें रत्न, खानमें सुवर्ण, मणि आदि; तीसरी विप्रकृष्ट अर्थात् जो दूर देशमें वर्तमान हो, जैसे हम आसाममें बैठे हैं और वस्तु मारवाड़में पड़ी है अथवा यों समझिये कि हम हिंदुस्थानमें हैं और वस्तु अमेरिकामें पड़ी है। इनमेंसे किसी भी वस्तुको जाननेके लिये जब योगी पहले पादके छत्तीसवें सूत्रमें और इस पादके पाँचवें सूत्रमें वर्णित ज्योतिष्मती अर्थात् प्रकाशवती प्रवृत्तिके प्रकाशको उसपर छोड़ता है, तब उसी समय वह योगीके प्रत्यक्ष हो जाती है ॥२५॥

भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥२६॥

'सूर्यमें संयम करनेसे समस्त लोकोंका ज्ञान हो जाता है।'

व्याख्या—पुराणोंमें चौदह भुवनोंका वर्णन आता है, उनमेंसे एक भूलोक है; उन चौदहों भुवनोंका ज्ञान सूर्यमें संयम करनेसे हो जाता है। व्यासभाष्यमें इन लोकोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया