पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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गया है; परन्तु आध्यात्मिक साधनके लिये उपयोगी न समझकर मैंने यहाँ उनका वर्णन नहीं किया है। इसके सिवा यह बात भी है कि इनके विषयका वर्णन ठीक-ठीक समझमें भी नहीं आता ॥२६॥
चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥२७॥
'चन्द्रमामें संयम करनेसे सब तारोंके व्यूहका (स्थान-विशेषका) ज्ञान हो जाता है।'
**व्याख्या—**चन्द्रमामें संयम करनेसे कौन तारा किस स्थानमें टिका है, इसका यथावत् ज्ञान हो जाता है ॥२७॥
**सम्बन्ध—**उसके बाद—
ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥२८॥
'ध्रुवतारेमें संयम करनेसे उन ताराओंकी गतिका ज्ञान हो जाता है।'
**व्याख्या—**ध्रुव तारा निश्चल है और सब ताराओंकी गतिका उससे सम्बन्ध है; अतः उसमें संयम करनेसे समस्त ताराओंकी गतिका अर्थात् कौन तारा कितने समयमें किस राशि और किस नक्षत्रपर जायगा—इसका पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है ॥२८॥
नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥२९॥
'नाभिचक्रमें संयम करनेसे शरीरके व्यूहका (उसकी स्थितिका) पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है।'
**व्याख्या—**नाभिमें स्थित जो चक्र है, जिसमें शरीरकी समस्त नाड़ियाँ गुँथी हुई हैं, उसमें संयम करनेसे शरीरके व्यूहका ज्ञान हो जाता है अर्थात् शरीरका संगठन किस प्रकार हुआ है, उसमें