भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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१०४पातञ्जलयोगदर्शन

कौन-सी धातु किस प्रकार कहाँ स्थित है, इन सबका और समस्त नाड़ियोंका योगीको पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है ॥२९॥

कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥३०॥

'कण्ठकूपमें संयम करनेसे भूख और प्यासकी निवृत्ति हो जाती है।'

व्याख्या—जिह्वाके नीचे एक तन्तु है (जिसे जिह्वामूल भी कहते हैं), उसके नीचे कण्ठ है, उसके नीचे कूप (गड्ढा) है। उस कण्ठकूपमें संयम करनेसे भूख-प्यासकी बाधा मिट जाती है। इसमें यह कारण बतलाया जाता है कि उस कण्ठकूपसे प्राणवायु टकराती है, उसीसे भूख-प्यासकी बाधा होती है; उसमें संयम करनेके बाद वह नहीं होती ॥३०॥

कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥३१॥

'कूर्माकार नाड़ीमें संयम करनेसे स्थिरता होती है।'

व्याख्या—उक्त कूपके नीचे वक्षःस्थलमें एक कछुवेके आकार-वाली नाड़ी है, उसमें संयम करनेसे स्थिर स्थितिकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् चित्त और शरीर—दोनों स्थिर हो जाते हैं ॥३१॥

मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥३२॥

'मूर्धाकी ज्योतिमें संयम करनेसे सिद्ध पुरुषोंके दर्शन होते हैं।'

व्याख्या—सिरके कपालमें एक छिद्र है (इसीको ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं) वहाँ जो प्रकाशमयी ज्योति है, उसमें संयम करनेवालेको पृथ्वी और स्वर्गलोकके बीचमें विचरनेवाले सिद्धोंके दर्शन होते हैं ॥३२॥