पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूतिपाद-३ १०५
प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥३३॥
'अथवा प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होनेसे (बिना किसी संयमके ही) योगी पहले कही हुई सारी बातोंको जान लेता है।'
व्याख्या—जिसका वर्णन इसी पादके ३६ वें सूत्रमें है, उसका नाम प्रातिभ ज्ञान है; यह विवेकजनित ज्ञानका पूर्वरूप है। अतः जिस प्रकार सूर्यकी प्रभासे, जो कि सूर्योदयसे कुछ पहले प्रकट होती है, मनुष्य सब वस्तुओंको देख सकता है, उसी प्रकार प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होनेसे योगी सबको जान जाता है ॥३३॥
हृदये चित्तसंवित् ॥३४॥
'हृदयमें संयम करनेसे चित्तके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है।'
व्याख्या—इस ब्रह्मपुर नामक हृदयदेशमें गर्त (गड्ढे) के आकारवाला कमल है, वह चित्तका स्थान है, उसमें संयम करनेसे वृत्तियोंसहित चित्तका ज्ञान हो जाता है ॥३४॥
सम्बन्ध—चित्तके स्वरूपका ज्ञान होनेसे विवेक होते ही पुरुषके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है। अतः अगले सूत्रमें कहते हैं—
सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थात्स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् ॥३५॥
'सत्त्व (बुद्धि) और पुरुष, जो कि दोनों परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं (किसी प्रकार भी एकत्र होनेवाले नहीं हैं)—इन दोनोंकी प्रतीतिका जो अभेद है, वही भोग है, उसमेंसे परार्थ प्रतीतिसे भिन्न जो स्वार्थ-प्रतीति है, उसमें संयम करनेसे पुरुषका ज्ञान होता है।'
व्याख्या—बुद्धि और पुरुष—दोनों सर्वथा भिन्न हैं, इनका कोई