भारतकोश
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पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

विभूतिपाद-३ १०५

प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥३३॥

'अथवा प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होनेसे (बिना किसी संयमके ही) योगी पहले कही हुई सारी बातोंको जान लेता है।'

व्याख्या—जिसका वर्णन इसी पादके ३६ वें सूत्रमें है, उसका नाम प्रातिभ ज्ञान है; यह विवेकजनित ज्ञानका पूर्वरूप है। अतः जिस प्रकार सूर्यकी प्रभासे, जो कि सूर्योदयसे कुछ पहले प्रकट होती है, मनुष्य सब वस्तुओंको देख सकता है, उसी प्रकार प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होनेसे योगी सबको जान जाता है ॥३३॥

हृदये चित्तसंवित् ॥३४॥

'हृदयमें संयम करनेसे चित्तके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है।'

व्याख्या—इस ब्रह्मपुर नामक हृदयदेशमें गर्त (गड्ढे) के आकारवाला कमल है, वह चित्तका स्थान है, उसमें संयम करनेसे वृत्तियोंसहित चित्तका ज्ञान हो जाता है ॥३४॥

सम्बन्ध—चित्तके स्वरूपका ज्ञान होनेसे विवेक होते ही पुरुषके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है। अतः अगले सूत्रमें कहते हैं—

सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थात्स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् ॥३५॥

'सत्त्व (बुद्धि) और पुरुष, जो कि दोनों परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं (किसी प्रकार भी एकत्र होनेवाले नहीं हैं)—इन दोनोंकी प्रतीतिका जो अभेद है, वही भोग है, उसमेंसे परार्थ प्रतीतिसे भिन्न जो स्वार्थ-प्रतीति है, उसमें संयम करनेसे पुरुषका ज्ञान होता है।'

व्याख्या—बुद्धि और पुरुष—दोनों सर्वथा भिन्न हैं, इनका कोई

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मेल नहीं है; क्योंकि बुद्धि परिणामशील, जड, भोग्य और चञ्चल है एवं पुरुष अपरिणामी, चेतन, भोक्ता और असङ्ग है। तथापि अविद्याके कारण इनकी एकता-सी हो रही है, इसीका नाम अस्मिता है (योग० २।६)। इस एकताके कारण दोनोंका अलग-अलग ज्ञान नहीं होता, एक साथ मिला हुआ ज्ञान होता है, उस दशामें इस जड-बुद्धिमें (जो कि पुरुषकी चेतनतासे चेतन-सी हो रही है) जो सुख-दुःख और मोहरूप नाना प्रकारकी वृत्तियोंका उदय होता है, वह वृत्ति अविशेष (अभिन्न-मिश्रित) है; क्योंकि इससे चित्तके धर्म सुख-दुःख और मोह आदि चित्तमें प्रतिबिम्बित चैतन्य पुरुषमें अध्यारोपित होते हैं। यह अभेद-प्रतीति ही भोग है। यह अभेदरूप वृत्ति यद्यपि चित्तका धर्म है, परन्तु पुरुषके लिये है; इस कारण परार्थ है। और इसी दशामें जो इस भोगरूप वृत्तियोंसे भिन्न द्रष्टा-पुरुषके स्वरूपविषयक वृत्ति होती है, वह पौरुषेय वृत्ति स्वार्थ है, क्योंकि उसका विषय भी पुरुष है और वह है भी उसीके लिये; अतः वह परार्थ नहीं है। इस स्वार्थवृत्तिमें संयम करनेसे पुरुषका ज्ञान होता है। यद्यपि ज्ञान बुद्धिका धर्म है, अतः उस बुद्धिके धर्मरूप ज्ञानसे पुरुष नहीं जाना जाता है, किन्तु बुद्धिमें जो पुरुषका चेतन रूप प्रतिबिम्बित है, उसको दर्पणमें अपना मुख देखनेकी भाँति पुरुष देखता है। इस प्रकार उक्त संयमसे योगीको पुरुषका ज्ञान होता है।*


* यह विषय मैंने भाष्य और दूसरे-दूसरे टीकाकारोंका भाव लेकर लिखा है, परन्तु यह तर्कसे समझमें आनेवाला विषय नहीं है। अतः अनुभवी सज्जनोंको इसपर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये।

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यही प्रथम पादके इकतालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई ग्रहीतृ-विषयक समाधि है। इस समाधिका ध्येय 'पुरुष' अस्मितासे सम्बन्धित होनेके कारण पहले पादके सतरहवें सूत्रमें इसको भी अस्मितानुगत समाधिके नामसे कहा है, ऐसा अनुमान किया जाता है। क्योंकि ऐसा माननेसे पूर्वापरका प्रसङ्ग ठीक बैठ जाता है तथा ग्रहीतृविषयक समाधिका निर्विचारमें अन्तर्भाव मानना भी सुसंगत हो जाता है॥३५॥

**सम्बन्ध—**उक्त संयमसे पुरुषका ज्ञान होनेके पूर्व जो सिद्धियाँ योगीके सामने आती हैं, उनका वर्णन करते हैं—

ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥३६॥

'उस (स्वार्थ-संयम) से प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद और वार्ता—ये (छः सिद्धियाँ) प्रकट होती हैं।'

**व्याख्या—**ये छहों सिद्धियाँ ग्रहीतृविषयक समाधिके साधनमें लगे हुए साधकको पुरुषज्ञानके पहले प्राप्त होती हैं। इनके लक्षण इस प्रकार हैं—

(१) **प्रातिभ—**इसका वर्णन तैंतीसवें सूत्रमें आया है। इससे भूत, भविष्य और वर्तमान एवं सूक्ष्म, ढकी हुई और दूर देशमें स्थित वस्तुएँ प्रत्यक्ष हो जाती हैं।

(२) **श्रावण—**इससे दिव्य शब्द सुना जाता है।

(३) **वेदन—**इससे दिव्य स्पर्शका अनुभव होता है।

(४) **आदर्श—**इससे दिव्य रूपका दर्शन होता है।

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( ५ ) आस्वाद—इससे दिव्य रसका अनुभव होता है।
( ६ ) वार्ता—इससे दिव्य गन्धका अनुभव होता है ॥३६॥

**सम्बन्ध—**इन सिद्धियोंमें वैराग्य करानेके लिये कहते हैं—

ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥३७॥

'वे ( उक्त छः प्रकारकी सिद्धियाँ ) समाधिकी सिद्धिमें ( पुरुषका ज्ञान प्राप्त करनेमें ) विघ्न हैं और व्युत्थानमें सिद्धियाँ हैं।'

**व्याख्या—**उक्त छः प्रकारकी सिद्धियाँ साधकके सामने आवें तो इनका त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि ये उसके साधनमें विघ्नस्वरूप हैं। हाँ, जिसका चित्त चञ्चल है, जो साधक नहीं है, जो समाधिकी या आत्मोद्धारकी आवश्यकता नहीं समझता है, ऐसे मनुष्यको किसी कारणसे प्राप्त हो जायँ तो उसके लिये अवश्य ही ये सिद्धियाँ हैं ॥३७॥

**सम्बन्ध—**यहाँतक नाना प्रकारके संयमोंसे जो भिन्न-भिन्न ज्ञान होते हैं, उनका वर्णन पुरुषके ज्ञानपर्यन्त किया गया; अब भिन्न-भिन्न संयमोंसे जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी क्रियाशक्तियाँ उपलब्ध होती हैं, उनका वर्णन अगले सूत्रोंमें किया जाता है—

बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥३८॥

'बन्धनके कारण ( कर्म ) की शिथिलतासे और चित्तकी गतिका भलीभाँति ज्ञान होनेसे चित्तका दूसरेके शरीरमें प्रवेश ( किया जा सकता है )।'

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**व्याख्या—**चित्तके बन्धनका कारण कर्म-संस्कार है; कर्मोंका फल भुगतानेके लिये ही यह चित्त किसी एक शरीरमें बँधे रहनेके लिये बाध्य हो जाता है। उक्त बन्धनके कारणरूप कर्म-संस्कारोंको जब मनुष्य समाधिके अभ्यासद्वारा शिथिल करके चित्तको स्वच्छ बना लेता है और साथ ही जिन-जिन मार्गोंद्वारा चित्त शरीरमें विचरता है (जाता-आता है), उन मार्गोंको और चित्तकी गतिको भी भलीभाँति जान लेता है, तब उसमें यह सामर्थ्य आ जाती है कि वह अपने चित्तको शरीरसे बाहर करके दूसरेके (मृत या जीवित) किसी भी शरीरमें प्रविष्ट कर सकता है। चित्तके साथ-साथ इन्द्रियाँ भी जहाँ चित्त जाता है, वहाँ अपने-आप चली जाती हैं ॥३८॥

उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥३९॥

'उदान वायुको जीत लेनेसे जल, कीचड़, कण्टकादिसे उसके शरीरका संयोग नहीं होता और ऊर्ध्वगति भी होती है।'

**व्याख्या—**शरीरके जीवनका आधार प्राण है, क्रियाभेदसे उसके प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—ये पाँच नाम हैं। उनके लक्षण इस प्रकार हैं—

( १ ) प्राण—यह इन पाँचोंमें प्रधान है, इसकी गति मुख और नासिकाद्वारा होती है। नासिकाके अग्रभागसे लेकर हृदयतक शरीरमें इसका देश है।

( २ ) अपान—यह नीचेकी ओर गमन करनेवाला है,

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नाभिसे लेकर पादतलतक इसका देश है । मूत्र, विष्ठा और गर्भ आदि इसीके वेगसे नीचे उतरते हैं ।

(३) समान—हृदयसे लेकर नाभितक इसका देश है, खान-पानके रसको समस्त शरीरमें यथायोग्य पहुँचा देना इसका काम है, इसकी गति सम है ।

(४) व्यान—यह समस्त शरीरमें व्याप्त रहता हुआ ही विचरता है ।

(५) उदान—यह ऊपरकी ओर गमन करनेवाला है; कण्ठमें रहनेवाला और सिरतक गमन करनेवाला है । मृत्युके समय इसीके सहारे सूक्ष्म शरीरका गमन होता है ।

जब योगी उक्त उदान वायुपर विजय प्राप्त कर लेता है, तब उसका शरीर धुनी हुई रूईकी भाँति अत्यन्त हल्का हो जाता है, अतः पानी और कीचड़पर चलते हुए भी उसके पैर अंदर नहीं जाते, काँटे आदि भी उसके शरीरमें प्रविष्ट नहीं हो सकते । इसके सिवा, मरणकालमें उसके प्राण ब्रह्मरन्ध्र (मूर्धाके छिद्र) द्वारा निकलते हैं, इस कारण ऐसे योगीकी शुक्लमार्गसे गति होती है । उपनिषदोंमें भी उक्त ऊर्ध्वगतिका वर्णन आया है (देखिये कठ० २।३।१६) ॥३९॥

समानजयाज्ज्वलनम् ॥४०॥

'(संयमद्वारा) समान वायुको जीत लेनेसे (योगीका शरीर) दीप्तिमान् हो जाता है।'

व्याख्या—जब योगी संयमके द्वारा उपर्युक्त समानवायुको जीत लेता है, तब उसका शरीर अग्निके सदृश प्रज्वलित यानी अत्यन्त

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देदीप्यमान (प्रकाशयुक्त) हो जाता है; क्योंकि जठराग्नि और समानवायुका घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतः समानवायुको जीत लेनेपर योगी अपने शरीरमें रहनेवाले जठराग्निके आवरणको हटाकर अग्निके सदृश प्रकाशमान हो सकता है ॥४०॥

**सम्बन्ध—**पहले छत्तीसवें सूत्रमें जो छः सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं, उनमेंसे श्रावण नामकी सिद्धिका साधन बतलाते हैं—

श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् ॥४१॥

'श्रोत्र (कान) और आकाशके सम्बन्धमें संयम कर लेनेसे योगीके श्रोत्र दिव्य हो जाते हैं।'

**व्याख्या—**शब्दको ग्रहण करनेवाली श्रोत्र-इन्द्रिय अहंकारसे उत्पन्न हुई है और आकाशकी उत्पत्ति अहंकारजनित शब्दतन्मात्रा-से हुई है, अतः आकाश, शब्द और श्रोत्र-इन्द्रिय—इन तीनोंकी एकता है। इस श्रोत्र और आकाशके सम्बन्धको जब योगी संयम-द्वारा प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उसकी श्रोत्र-इन्द्रियमें दिव्य शक्ति आ जाती है। फिर वह सूक्ष्म-से-सूक्ष्म शब्दको सुन सकता है तथा किसी वस्तुसे ढके हुए शब्दको भी सुन सकता है और जो शब्द कहीं दूर देशमें बोला जाय, उसे भी सुन सकता है; क्योंकि आकाश विभु अर्थात् सर्वव्यापी है, इस कारण उसके अंदर कहीं भी होनेवाला शब्द तत्काल ही सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। अतः जिसकी श्रोत्र-इन्द्रिय दिव्य यानी अलौकिक हो जाती है, वह चाहे जिस शब्दको, जहाँपर वह हो, वहीं सुन सकता है ॥४१॥

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कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्ते-

श्चाकाशगमनम् ॥४२॥

'शरीर और आकाशके सम्बन्धमें संयम करनेसे अथवा हल्की वस्तु (रूई आदि) में संयम करनेसे आकाशमें चलनेकी शक्ति आ जाती है।'

व्याख्या—शरीर और आकाशका जो सम्बन्ध है, उसे संयमद्वारा पूर्णतया प्रत्यक्ष कर लेनेपर योगी इस तत्त्वको भलीभाँति समझ लेता है कि शरीरके अङ्ग किस प्रकार सूक्ष्म अवस्थासे स्थूल अवस्थामें परिणत होते हैं और किस प्रकार पुनः स्थूलसे सूक्ष्म किये जाते हैं। अतः वह अपने शरीरको अत्यन्त हल्का बनाकर चाहे जहाँ गमन कर सकता है। इसी तरह योगी जब किसी भी सूक्ष्म (धुनी हुई रूई या बादल आदि) वस्तुमें संयम करके तद्रूप हो जाता है, तब उससे भी उसको आकाशगमनकी योग्यता मिल जाती है ॥४२॥

सम्बन्ध—अब ज्ञानके आवरणका नाश जिस उपायसे किया जा सकता है, वह बतलाते हैं—

बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशा-

वरणक्षयः ॥४३॥

'शरीरके बाहर अकल्पित स्थितिका नाम महाविदेहा है। उससे बुद्धिकी ज्ञानशक्तिके आवरणका क्षय हो जाता है।'

व्याख्या—शरीरके बाहर जो मनकी स्थिति है, उसको विदेह-धारणा कहते हैं, वह जब मनके शरीरमें रहते हुए ही केवल

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भावनामात्रसे होती है, तब तो कल्पित है और जब शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर बाहर निकले हुए मनकी बाहर स्थिर स्थिति हो जाती है, तब अकल्पित होती है । कल्पित धारणाके अभ्याससे ही अकल्पित धारणा सिद्ध होती है । इसीको महाविदेहा कहते हैं, इससे योगीके ज्ञानका आवरण नष्ट हो जाता है। यह धारणा इन्द्रिय और मनकी स्वरूपावस्थामें संयम करनेसे होती है (योग० ३।४८) ॥४३॥

**सम्बन्ध—**यहाँतक नाना प्रकारके संयमोंका फलसहित वर्णन किया; अब जो पहले पादके इकतालीसवें सूत्रमें ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीतामें की जानेवाली सबीज समाधिके लक्षण बतलाये गये थे, उसका फल बतलानेके लिये पहले पाँच भूतोंमें और तज्जनित पदार्थोंमें की जानेवाली ग्राह्यविषयक समाधिका फल बतलाते हैं—

स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्

भूतजयः ॥४४॥

‘(भूतोंकी) स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व— इन पाँच प्रकारकी अवस्थाओंमें संयम करनेसे (योगी) पाँचों भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है।’

**व्याख्या—**पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच भूत हैं । इनमेंसे हरेककी पाँच अवस्थाएँ होती हैं । जैसे—

**(१) स्थूलावस्था—**जिस रूपमें हम इनको अपनी इन्द्रियों- द्वारा अनुभव कर रहे हैं, जिनको गीतामें इन्द्रियगोचर नाम दिया है (१३।५), वे इन्द्रियोंद्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामवाले पाँचों विषय इनकी स्थूल-अवस्था है ।

पा० यो० द० ८—

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( २ ) स्वरूपावस्था—इनके जो लक्षण हैं, वह इनकी स्वरूपावस्था है। जैसे, पृथ्वीकी मूर्त्ति, जलका गीलापन, अग्निकी उष्णता और प्रकाश, वायुकी गति और कम्पन, आकाशका अवकाश—यह इनकी स्वरूपावस्था है; क्योंकि इन्हींसे इनकी भिन्न-भिन्न सत्ताका अनुभव होता है।

( ३ ) सूक्ष्मावस्था—इनकी जो कारण-अवस्था है, जिनको तन्मात्रा और सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं, वे इनकी सूक्ष्म-अवस्था हैं। जैसे पृथ्वीकी गन्धतन्मात्रा, जलकी रसतन्मात्रा, अग्निकी रूपतन्मात्रा, वायुकी स्पर्शतन्मात्रा और आकाशकी शब्दतन्मात्रा।

( ४ ) अन्वय-अवस्था—पाँचों भूतोंमें जो तीनों गुणोंका स्वभाव यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति व्याप्त है, वह इनकी अन्वय-अवस्था है।

( ५ ) अर्थवत्त्व-अवस्था—ये पाँचों भूत पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये हैं। यही इनकी अर्थवत्त्व ( प्रयोजनता ) अवस्था है।

इन पाँचों भूतोंकी प्रत्येक अवस्थाके क्रमसे सम्पूर्ण अवस्थाओंमें भलीभाँति संयम करके जब योगी इनको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब योगीका इन भूतोंपर पूरा अधिकार हो जाता है ॥४४॥

सम्बन्ध—इस प्रकार जब योगी भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है, तब क्या होता है, सो बतलाते हैं—

ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मानभिघातश्च ४५

'उससे (भूतजयसे) अणिमादि आठ सिद्धियोंका प्रकट हो जाना, कायसम्पत्की प्राप्ति और उन भूतोंके धर्मोंसे बाधा न होना—(ये तीनों होते हैं)।'

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व्याख्या— ( क ) ऊपर बतलायी हुई अणिमादि आठ सिद्धियोंके नाम और लक्षण इस प्रकार हैं—

( १ ) अणिमा—अणुके समान सूक्ष्मरूप धारण कर लेना। जैसे हनुमान्‌जीने सुरसाके मुखमें एवं लङ्कामें प्रवेश करते समय किया था ( वा० रामायण सुन्दर० १ । १५६; २ । ४७ )।

( २ ) लघिमा—शरीरको हल्का कर लेना। इससे जल, पङ्क और कण्टकादिसे बाधा नहीं होती ( योग० ३ । ३९ ) और आकाशमें गमन करनेकी शक्ति आ जाती है ( योग० ३ । ४२ )।

( ३ ) महिमा—शरीरको बड़ा कर लेना। जैसे हनुमान्‌जीने सुरसाके सामने किया था ( वा० रामायण सुन्दर० १ । १५४ )।

( ४ ) गरिमा—शरीरको भारी कर लेना। जैसे हनुमान्‌जीने भीमसेनके मार्गमें रुकावट डालते समय किया था ( महा० वन० १४६-१४७ वाँ अध्याय )।

( ५ ) प्राप्ति—जिस भौतिक पदार्थको चाहे, संकल्पमात्रसे ही प्राप्त कर लेना।

( ६ ) प्राकाम्य—बिना रुकावट भौतिक पदार्थसम्बन्धी इच्छाकी पूर्ति हो जाना।

( ७ ) वशित्व—पाँचों भूतोंका और तज्जन्य पदार्थोंका वशमें हो जाना।

( ८ ) ईशित्व—उन भूत और भौतिक पदार्थोंको नाना रूपोंमें उत्पन्न करनेकी और उनपर शासन करनेकी सामर्थ्य।

( ख ) कायसंपत्‌का विवरण अगले सूत्रमें आवेगा।

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( ग ) भूतोंके धर्मोंसे बाधा न होना—इसका यह भाव है कि भूतोंके धर्म उस योगीके काममें बाधा नहीं डाल सकते। वह पृथ्वीके अंदर भी उसी प्रकार प्रवेश कर सकता है, जैसे हरेक मनुष्य जलमें प्रवेश कर सकता है। पृथ्वीका धर्म स्थूलभाव ( कड़ापन ) उसे बाधा नहीं पहुँचा सकता। उसपर यदि पत्थरोंकी वर्षा की जाय तो वे उसके शरीरमें आघात नहीं पहुँचा सकते। इसी तरह जलका गीलापन उसके शरीरको गला नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकता अर्थात् सर्दी-गर्मी-वर्षा आदि कोई भी भूतोंके धर्म उसके शरीरमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं पहुँचा सकते।

ये सब सिद्धियाँ योगीको चौवालीसवें सूत्रके कथनानुसार भूतोंकी सब अवस्थाओंपर विजय प्राप्त कर लेनेपर मिलती हैं, यह भाव है ॥ ४५ ॥

सम्बन्ध—उक्त कायसंपत्की व्याख्या सूत्रकार स्वयं करते हैं—

रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत् ॥ ४६ ॥

‘रूप, लावण्य, बल और वज्रके समान संगठन—ये कायसंपत् ( शरीरकी सम्पदाएँ ) हैं।’

व्याख्या—अत्यन्त सुन्दर आकृति, समस्त अङ्गोंमें चमक, बलकी बहुलता तथा शरीरके समस्त अङ्गोंका वज्रकी भाँति दृढ़ और परिपूर्ण हो जाना—ये चारों शरीरसम्बन्धी सम्पदा हैं ॥ ४६ ॥

सम्बन्ध—अब मनसहित इन्द्रियोंमें की जानेवाली ग्रहण-विषयक समाधिके फलका वर्णन करते हैं—

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ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ४७

‘ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व—इन पाँचों अवस्थाओंमें संयम करनेसे मनसहित समस्त इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त हो जाती है।’

व्याख्या—मनसहित इन्द्रियोंकी पाँच अवस्थाएँ हैं। उनमें क्रमसे संयम करनेसे योगीका इन्द्रियोंपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। उनकी अवस्थाओंके पाँच भेद इस प्रकार हैं—

( १ ) ग्रहण—विषयोंको ग्रहण करते समय जो वृत्तिके आकारमें मनसहित इन्द्रियोंकी अवस्था है, यह उनकी ग्रहण-अवस्था है।

( २ ) स्वरूप—मन और इन्द्रियोंका स्वाभाविक स्वरूप, जो कि अपने-अपने स्थानमें विद्यमान रहता है और लक्षण ( संकेत ) से जाननेमें आता है, यह उनकी स्वरूप-अवस्था है।

( ३ ) अस्मिता—यह मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्मरूप है। इसीसे मनसहित दसों इन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है, यह उनकी सूक्ष्मावस्था है।

( ४ ) अन्वय—मनसहित सब इन्द्रियोंमें जो तीनों गुणोंका स्वभाव यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति व्याप्त है, वह इनकी अन्वय-अवस्था है।

( ५ ) अर्थवत्त्व—ये मनसहित सब इन्द्रियाँ पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये हैं, यही इनकी अर्थवत्त्व-अवस्था ( सार्थकता ) है।

इस प्रकार जब मन और दसों इन्द्रियोंकी पाँचों अवस्थाओंमें योगी क्रमसे संयम करके भलीभाँति उनको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब इन सबपर उसका पूरा अधिकार हो जाता है।

११८ पातञ्जलयोगदर्शन

इन्द्रियाँ और मन—ये सभी अहंकारसे उत्पन्न हैं तथा मन और इन्द्रियोंके मेलसे पुरुष विषयोंको ग्रहण करता है या अकेले मनके द्वारा करता है। अतः यहाँ इन्द्रियजयसे मनसहित सब इन्द्रियोंकी जय समझनी चाहिये तथा मनमें की जानेवाली और अस्मितामें की जानेवाली समाधिको भी ग्रहणमें की जानेवाली समाधिके अन्तर्गत समझना चाहिये ॥४७॥

**सम्बन्ध—**उक्त इन्द्रियजयका फल बतलाते हैं—

ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥४८॥

'उससे (इन्द्रियजयसे) मनके सदृश गति, शरीरके बिना भी विषयोंका अनुभव करनेकी शक्ति और प्रकृतिपर अधिकार—ये तीनों सिद्धियाँ मिलती हैं।'

**व्याख्या—**इन तीनों सिद्धियोंका अलग-अलग स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिये—

(१) **मनोजवित्व—**स्थूल शरीर और इन्द्रियोंके सहित मनकी तरह एक क्षणमें कहीं-से-कहीं दूर देशमें जानेकी शक्तिको मनोजवित्व अर्थात् मनके सदृश गतिकी शक्ति कहते हैं। यह ग्रहण-अवस्थामें संयमका फल है।

(२) **विकरणभाव—**स्थूल शरीरके बिना ही दूर देशमें स्थित वस्तुओंको प्रत्यक्ष कर लेनेकी शक्तिको विकरणभाव कहते हैं। जब योगीकी महाविदेहा धारणा (योग० ३।४३) सिद्ध हो जाती है, उस समय भी मन और इन्द्रियोंमें यही शक्ति काम करती है; उसीसे मनुष्य दूर देशमें स्थित पर-शरीरको प्रत्यक्ष करके उसमें प्रविष्ट होता है (योग० ३।३८); यह स्वरूपावस्थामें संयमका फल है।

विभूतिपाद-३ १११९

( ३ ) प्रधानजय—कार्य और कारणरूपमें स्थित प्रकृतिके सम्पूर्ण भेदोंपर पूरा अधिकार हो जाना 'प्रधानजय' है; यह अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व-अवस्था में संयमका फल है। यह संयम ही प्रकृतिलय कहलाता है।

ये तीनों प्रकारकी सिद्धियाँ ग्रहणविषयक समाधि सिद्ध हो जानेपर अपने-आप मिल जाती हैं ॥४८॥

सम्बन्ध—अब ग्रहीतामें होनेवाली ग्रहीतृविषयक समाधिका फलसहित वर्णन करते हैं—

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥४९॥

'बुद्धि और पुरुष—इन दोनोंकी भिन्नतामात्रका ही जिसमें ज्ञान रहता है, ऐसी सबीज समाधिको प्राप्त योगीका सब भावों-पर स्वामिभाव और सर्वज्ञभाव हो जाता है।'

व्याख्या—ग्रहीतृविषयक समाधिसे जब बुद्धिके रजोगुण और तमोगुणसम्बन्धी संस्कार सर्वथा धुलकर उसमें शुद्ध सत्त्वगुणके ही संस्कार रह जाते हैं, उस समय केवलमात्र पुरुष और प्रकृतिकी भिन्नताका अनुभव करनेवाली वृत्ति रहती है, इसीको विवेकज्ञान भी कहते हैं (योग० ३। ५४, ४। २५)। इसीको पहले स्वार्थमें संयम करनेसे होनेवाले पुरुषज्ञानके नामसे कहा है (योग० ३। ३५)। ग्रहीतृविषयक समाधिके द्वारा जब यह स्थिति प्राप्त हो जाती है, उस समय योगीको समस्त भावोंपर स्वामिभाव प्राप्त हो जाता है अर्थात् सम्पूर्ण गुण जो कि कार्यका आरम्भ करनेमें लगे हुए हैं और जो अनारम्भ-अवस्था में हैं, वे सब दासकी भाँति आज्ञा-

१२०पातञ्जलयोगदर्शन

पालन करनेके लिये सर्वभावसे उपस्थित हो जाते हैं। तथा उसे भूत, वर्तमान और भविष्य अवस्थाओंमें स्थित समस्त गुणोंका एक साथ भलीभाँति ज्ञान हो जाता है। इसीसे वह योगी सर्वज्ञ कहलाता है; इसके बादकी अवस्था धर्ममेघसमाधि है (योग० ४। २९) ॥४९॥

**सम्बन्ध—**पहले पादके सैंतालीसवें सूत्रमें कही हुई ऊँची-से-ऊँची सबीज समाधिको और अड़तालीसवें सूत्रमें कही हुई ऋतम्भरा प्रज्ञाको भी निर्बीज समाधिका बहिरङ्ग साधन बतलाया है, अतः उपर्युक्त सिद्धिसे भी विरक्त होनेपर निर्बीज समाधिरूप कैवल्यकी प्राप्ति बतलाते हैं—

तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥५०॥

'उसमें (उपर्युक्त सिद्धिमें) भी वैराग्य होनेसे दोषके बीजका नाश हो जानेपर कैवल्यकी प्राप्ति होती है।'

**व्याख्या—**ग्रहीतृविषयक समाधिमें जब यह ज्ञान हो जाता है कि बुद्धि और पुरुष—दोनों अत्यन्त भिन्न हैं, इनका संयोग अविद्याकृत है अर्थात् जब यह बात विवेकज्ञानसे प्रत्यक्ष हो जाती है, उस समय उसके सामने उपर्युक्त सिद्धियोंका प्रादुर्भाव होता है। उनमें न अटककर जो योगी पुरुषको सर्वथा असङ्ग, निर्विकार, कूटस्थ, आनन्दमय और चेतन तथा समस्त गुण और उसके कार्यको प्रतिक्षण बदलनेवाला, जड और दुःखप्रद समझकर सम्पूर्ण गुणोंसे और उनके कार्यसे अत्यन्त विरक्त हो जाता है (योग० १। १६), उक्त परवैराग्यसे जिसके दोषोंके बीजरूप अन्तिम वृत्तिका भी सर्वथा निरोध हो जाता है, उसकी निर्बीज समाधि हो जाती है। इस अवस्थामें अपनी वृत्तियोंके संस्कारोंके सहित

विभूतिपाद-३ १२१

चित्त अपने कारणमें विलीन हो जाता है और पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है (योग० ४ । ३४) । यह पुरुषका गुणोंके साथ आत्यन्तिक वियोग है। इसीको कैवल्य कहते हैं ॥५०॥

सम्बन्ध— जब साधक कुछ उन्नत अवस्थामें जाने लगता है, तब उसके जीवनमें नाना प्रकारके विघ्न आया करते हैं, अतः उनसे बचनेके लिये सावधान करते हैं—

स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ॥५१॥

‘लोकपाल देवताओंके बुलानेपर न तो (उनके भोगोंमें) सङ्ग (प्रेम) करना चाहिये और न अभिमान ही करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे पुनः अनिष्ट होना संभव है।’

व्याख्या— जब योगीकी अच्छी स्थिति हो जाती है, उस समय उसे बड़े-बड़े लोकपाल अधिकारी देवता और सिद्धोंके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं, उस समय देवतालोग उसे अपने लोकोंमें भोगोंका सुख दिखाकर नाना प्रकारसे उन भोगोंकी बड़ाई करके अपने पास बुलाया करते हैं, उस समय साधकको खूब सावधान रहना चाहिये, उनके प्रलोभनमें नहीं पड़ना चाहिये। अपने मनमें बार-बार यह भाव लाना चाहिये कि जन्म-जन्मान्तरमें कर्मोंका भोग करते-करते इस मनुष्यशरीरमें बड़े सौभाग्यसे महापुरुषोंकी और ईश्वरकी परम दयासे मुझे यह स्थिति प्राप्त हुई है, इसके सामने ये नाना प्रकारके क्षणभङ्गुर भोग अत्यन्त तुच्छ हैं, इनके प्रलोभनमें पड़कर मैं अपने-आपको कैसे संसारसमुद्रमें डुबा सकता हूँ। मैंने तो इन सबका

१२२पातञ्जलयोगदर्शन

तत्त्व भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लिया है, इनमें सारकी गन्ध भी नहीं है। इस प्रकारकी भावनासे उनसे विरक्त हो जाना चाहिये, उनमें जरा-सा भी अपने चित्तका रागयुक्त सम्बन्ध यानी आसक्ति नहीं होने देनी चाहिये तथा इस बातका अभिमान भी अपने मनमें नहीं आने देना चाहिये कि मैं कैसी उच्च स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ, जिसके कारण बड़े-बड़े देवतालोग भी मेरा सत्कार करते हैं और मुझे अपने लोकोंमें बुलाते हैं। क्योंकि सङ्ग और अभिमान करनेसे साधकके पुनः संसारचक्रमें फँसनेका प्रसङ्ग (मौका) आ जाता है। अतः साधकको हर समय हरेक प्रकारके विघ्नसे खूब सावधान रहना चाहिये; यह भाव है ॥५१॥

**सम्बन्ध—**विवेकज्ञानकी उत्पत्तिका दूसरा उपाय बतलाते हैं—

क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥५२॥

'क्षण और उसके क्रममें संयम करनेसे विवेकज्ञान उत्पन्न होता है।'

**व्याख्या—**कालका जो छोटे-से-छोटा हिस्सा है, जिससे छोटा विभाग हो ही नहीं सकता, उसे 'क्षण' कहते हैं; उसका जो क्रम है अर्थात् एक क्षणके बाद दूसरे क्षणके प्रकट होनेका जो लगातार सिलसिला है, उसका नाम क्रम है। दो क्षण एक साथ नहीं रह सकते और दोनोंके बीचमें किसी औरका व्यवधान भी नहीं है, एकके पीछे दूसरे क्षणका सिलसिला चालू रहता है, इसको 'क्रम' कहते हैं। अतः क्षण और उसके क्रममें संयम कर लेनेसे विवेकज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ५२ ॥

**सम्बन्ध—**उस विवेकज्ञानका लक्षण करते हैं—

विभूतिपाद-३

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जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥ ५३॥

'(जिन वस्तुओंका) जाति, लक्षण और देशभेदसे भेद नहीं किया जा सकता, इस कारण जो दो वस्तुएँ तुल्य (एकके सदृश) प्रतीत होती हैं, उनके भेदकी उपलब्धि उस (विवेक-ज्ञान) से होती है।'

व्याख्या—वस्तुओंका विवेचन करके उनका भेद समझानेके तीन कारण हैं—(१) वस्तुकी जाति, (२) वस्तुका लक्षण अर्थात् वर्ण, आकृति आदि, (३) उसका देश अर्थात् स्थान—इन तीनोंके भेदसे वस्तुओंकी भिन्नताका विवेचन होता है; परंतु जिन दो वस्तुओंमें इनसे भेदकी उपलब्धि नहीं हो सके, उनके भेदको जो प्रत्यक्ष करा देनेवाला है, उसका नाम विवेक-ज्ञान है ॥ ५३ ॥

सम्बन्ध—उस विवेकज्ञानकी विशेषताका वर्णन करते हैं—

तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥ ५४ ॥

'जो संसारसमुद्रसे तारनेवाला है, सबको जाननेवाला है, सब प्रकारसे जाननेवाला है और बिना क्रमके (पूर्वापरके) जाननेवाला है, वह विवेकज्ञान है।'

व्याख्या—यह ज्ञान परवैराग्यको उत्पन्न करके योगीकी कैवल्य-अवस्थाका सम्पादन करनेमें हेतु है, इसलिये इसको तारक अर्थात् संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाला कहा है। इसके द्वारा

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योगी समस्त वस्तुओंको एक साथ सब प्रकारसे जान सकता है, इस कारण यह 'सर्वविषयम्' और 'सर्वथाविषयम्' कहलाता है। इसके द्वारा योगी हरेक वस्तुको बिना क्रमके एक साथ जान सकता है, इस कारण इसको 'अक्रमम्' भी कहते हैं। यह ज्ञानकी अन्तिम अवस्था है, इससे ऊँची कोई स्थिति नहीं है। 'अक्रमम्' का यह भी भाव समझना चाहिये कि यह क्रमसे रहित है, अर्थात् दूसरे ज्ञानोंकी भाँति परिवर्तनशील नहीं है। इसी ज्ञानको पहले पादके सोलहवें सूत्रमें 'पुरुषख्याति' के नामसे परवैराग्यका हेतु बतलाया है ॥५४॥

सम्बन्ध— ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे विवेकज्ञान होनेपर ही कैवल्य हो, ऐसा नियम नहीं है। इसके सिवा दूसरे प्रकारसे भी विवेकज्ञान होकर कैवल्य प्राप्त हो सकता है; अतः उसके लिये जो बात अवश्य होनी चाहिये, उसका वर्णन करते हैं—

सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम् ॥५५॥

'बुद्धि और पुरुष—इन दोनोंकी जब समानभावसे शुद्धि हो जाती है, तब कैवल्य होता है।'

व्याख्या— इधर बुद्धि अत्यन्त निर्मल होकर अपने कारणमें विलीन होने लग जाती है और उधर पुरुषका जो बुद्धिके साथ अज्ञानकृत सम्बन्ध है, उसका और तज्जनित मल-विक्षेप-आवरणका अभाव होनेसे पुरुष भी निर्मल हो जाता है। इस प्रकार जब दोनोंकी समभावसे शुद्धि हो जाती है, तब कैवल्य होता है; वह चाहे किसी भी निमित्तसे किसी भी प्रकारसे क्यों न हो जाय ॥५५॥