पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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योगी समस्त वस्तुओंको एक साथ सब प्रकारसे जान सकता है, इस कारण यह 'सर्वविषयम्' और 'सर्वथाविषयम्' कहलाता है। इसके द्वारा योगी हरेक वस्तुको बिना क्रमके एक साथ जान सकता है, इस कारण इसको 'अक्रमम्' भी कहते हैं। यह ज्ञानकी अन्तिम अवस्था है, इससे ऊँची कोई स्थिति नहीं है। 'अक्रमम्' का यह भी भाव समझना चाहिये कि यह क्रमसे रहित है, अर्थात् दूसरे ज्ञानोंकी भाँति परिवर्तनशील नहीं है। इसी ज्ञानको पहले पादके सोलहवें सूत्रमें 'पुरुषख्याति' के नामसे परवैराग्यका हेतु बतलाया है ॥५४॥
सम्बन्ध— ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे विवेकज्ञान होनेपर ही कैवल्य हो, ऐसा नियम नहीं है। इसके सिवा दूसरे प्रकारसे भी विवेकज्ञान होकर कैवल्य प्राप्त हो सकता है; अतः उसके लिये जो बात अवश्य होनी चाहिये, उसका वर्णन करते हैं—
सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम् ॥५५॥
'बुद्धि और पुरुष—इन दोनोंकी जब समानभावसे शुद्धि हो जाती है, तब कैवल्य होता है।'
व्याख्या— इधर बुद्धि अत्यन्त निर्मल होकर अपने कारणमें विलीन होने लग जाती है और उधर पुरुषका जो बुद्धिके साथ अज्ञानकृत सम्बन्ध है, उसका और तज्जनित मल-विक्षेप-आवरणका अभाव होनेसे पुरुष भी निर्मल हो जाता है। इस प्रकार जब दोनोंकी समभावसे शुद्धि हो जाती है, तब कैवल्य होता है; वह चाहे किसी भी निमित्तसे किसी भी प्रकारसे क्यों न हो जाय ॥५५॥