भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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विभूतिपाद-३

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जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥ ५३॥

'(जिन वस्तुओंका) जाति, लक्षण और देशभेदसे भेद नहीं किया जा सकता, इस कारण जो दो वस्तुएँ तुल्य (एकके सदृश) प्रतीत होती हैं, उनके भेदकी उपलब्धि उस (विवेक-ज्ञान) से होती है।'

व्याख्या—वस्तुओंका विवेचन करके उनका भेद समझानेके तीन कारण हैं—(१) वस्तुकी जाति, (२) वस्तुका लक्षण अर्थात् वर्ण, आकृति आदि, (३) उसका देश अर्थात् स्थान—इन तीनोंके भेदसे वस्तुओंकी भिन्नताका विवेचन होता है; परंतु जिन दो वस्तुओंमें इनसे भेदकी उपलब्धि नहीं हो सके, उनके भेदको जो प्रत्यक्ष करा देनेवाला है, उसका नाम विवेक-ज्ञान है ॥ ५३ ॥

सम्बन्ध—उस विवेकज्ञानकी विशेषताका वर्णन करते हैं—

तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥ ५४ ॥

'जो संसारसमुद्रसे तारनेवाला है, सबको जाननेवाला है, सब प्रकारसे जाननेवाला है और बिना क्रमके (पूर्वापरके) जाननेवाला है, वह विवेकज्ञान है।'

व्याख्या—यह ज्ञान परवैराग्यको उत्पन्न करके योगीकी कैवल्य-अवस्थाका सम्पादन करनेमें हेतु है, इसलिये इसको तारक अर्थात् संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाला कहा है। इसके द्वारा