पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १२२ | पातञ्जलयोगदर्शन |
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तत्त्व भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लिया है, इनमें सारकी गन्ध भी नहीं है। इस प्रकारकी भावनासे उनसे विरक्त हो जाना चाहिये, उनमें जरा-सा भी अपने चित्तका रागयुक्त सम्बन्ध यानी आसक्ति नहीं होने देनी चाहिये तथा इस बातका अभिमान भी अपने मनमें नहीं आने देना चाहिये कि मैं कैसी उच्च स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ, जिसके कारण बड़े-बड़े देवतालोग भी मेरा सत्कार करते हैं और मुझे अपने लोकोंमें बुलाते हैं। क्योंकि सङ्ग और अभिमान करनेसे साधकके पुनः संसारचक्रमें फँसनेका प्रसङ्ग (मौका) आ जाता है। अतः साधकको हर समय हरेक प्रकारके विघ्नसे खूब सावधान रहना चाहिये; यह भाव है ॥५१॥
**सम्बन्ध—**विवेकज्ञानकी उत्पत्तिका दूसरा उपाय बतलाते हैं—
क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥५२॥
'क्षण और उसके क्रममें संयम करनेसे विवेकज्ञान उत्पन्न होता है।'
**व्याख्या—**कालका जो छोटे-से-छोटा हिस्सा है, जिससे छोटा विभाग हो ही नहीं सकता, उसे 'क्षण' कहते हैं; उसका जो क्रम है अर्थात् एक क्षणके बाद दूसरे क्षणके प्रकट होनेका जो लगातार सिलसिला है, उसका नाम क्रम है। दो क्षण एक साथ नहीं रह सकते और दोनोंके बीचमें किसी औरका व्यवधान भी नहीं है, एकके पीछे दूसरे क्षणका सिलसिला चालू रहता है, इसको 'क्रम' कहते हैं। अतः क्षण और उसके क्रममें संयम कर लेनेसे विवेकज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ५२ ॥
**सम्बन्ध—**उस विवेकज्ञानका लक्षण करते हैं—