पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूतिपाद-३ १२१
चित्त अपने कारणमें विलीन हो जाता है और पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है (योग० ४ । ३४) । यह पुरुषका गुणोंके साथ आत्यन्तिक वियोग है। इसीको कैवल्य कहते हैं ॥५०॥
सम्बन्ध— जब साधक कुछ उन्नत अवस्थामें जाने लगता है, तब उसके जीवनमें नाना प्रकारके विघ्न आया करते हैं, अतः उनसे बचनेके लिये सावधान करते हैं—
स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ॥५१॥
‘लोकपाल देवताओंके बुलानेपर न तो (उनके भोगोंमें) सङ्ग (प्रेम) करना चाहिये और न अभिमान ही करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे पुनः अनिष्ट होना संभव है।’
व्याख्या— जब योगीकी अच्छी स्थिति हो जाती है, उस समय उसे बड़े-बड़े लोकपाल अधिकारी देवता और सिद्धोंके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं, उस समय देवतालोग उसे अपने लोकोंमें भोगोंका सुख दिखाकर नाना प्रकारसे उन भोगोंकी बड़ाई करके अपने पास बुलाया करते हैं, उस समय साधकको खूब सावधान रहना चाहिये, उनके प्रलोभनमें नहीं पड़ना चाहिये। अपने मनमें बार-बार यह भाव लाना चाहिये कि जन्म-जन्मान्तरमें कर्मोंका भोग करते-करते इस मनुष्यशरीरमें बड़े सौभाग्यसे महापुरुषोंकी और ईश्वरकी परम दयासे मुझे यह स्थिति प्राप्त हुई है, इसके सामने ये नाना प्रकारके क्षणभङ्गुर भोग अत्यन्त तुच्छ हैं, इनके प्रलोभनमें पड़कर मैं अपने-आपको कैसे संसारसमुद्रमें डुबा सकता हूँ। मैंने तो इन सबका