भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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१२०पातञ्जलयोगदर्शन

पालन करनेके लिये सर्वभावसे उपस्थित हो जाते हैं। तथा उसे भूत, वर्तमान और भविष्य अवस्थाओंमें स्थित समस्त गुणोंका एक साथ भलीभाँति ज्ञान हो जाता है। इसीसे वह योगी सर्वज्ञ कहलाता है; इसके बादकी अवस्था धर्ममेघसमाधि है (योग० ४। २९) ॥४९॥

**सम्बन्ध—**पहले पादके सैंतालीसवें सूत्रमें कही हुई ऊँची-से-ऊँची सबीज समाधिको और अड़तालीसवें सूत्रमें कही हुई ऋतम्भरा प्रज्ञाको भी निर्बीज समाधिका बहिरङ्ग साधन बतलाया है, अतः उपर्युक्त सिद्धिसे भी विरक्त होनेपर निर्बीज समाधिरूप कैवल्यकी प्राप्ति बतलाते हैं—

तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥५०॥

'उसमें (उपर्युक्त सिद्धिमें) भी वैराग्य होनेसे दोषके बीजका नाश हो जानेपर कैवल्यकी प्राप्ति होती है।'

**व्याख्या—**ग्रहीतृविषयक समाधिमें जब यह ज्ञान हो जाता है कि बुद्धि और पुरुष—दोनों अत्यन्त भिन्न हैं, इनका संयोग अविद्याकृत है अर्थात् जब यह बात विवेकज्ञानसे प्रत्यक्ष हो जाती है, उस समय उसके सामने उपर्युक्त सिद्धियोंका प्रादुर्भाव होता है। उनमें न अटककर जो योगी पुरुषको सर्वथा असङ्ग, निर्विकार, कूटस्थ, आनन्दमय और चेतन तथा समस्त गुण और उसके कार्यको प्रतिक्षण बदलनेवाला, जड और दुःखप्रद समझकर सम्पूर्ण गुणोंसे और उनके कार्यसे अत्यन्त विरक्त हो जाता है (योग० १। १६), उक्त परवैराग्यसे जिसके दोषोंके बीजरूप अन्तिम वृत्तिका भी सर्वथा निरोध हो जाता है, उसकी निर्बीज समाधि हो जाती है। इस अवस्थामें अपनी वृत्तियोंके संस्कारोंके सहित