भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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विभूतिपाद-३ १११९

( ३ ) प्रधानजय—कार्य और कारणरूपमें स्थित प्रकृतिके सम्पूर्ण भेदोंपर पूरा अधिकार हो जाना 'प्रधानजय' है; यह अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व-अवस्था में संयमका फल है। यह संयम ही प्रकृतिलय कहलाता है।

ये तीनों प्रकारकी सिद्धियाँ ग्रहणविषयक समाधि सिद्ध हो जानेपर अपने-आप मिल जाती हैं ॥४८॥

सम्बन्ध—अब ग्रहीतामें होनेवाली ग्रहीतृविषयक समाधिका फलसहित वर्णन करते हैं—

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥४९॥

'बुद्धि और पुरुष—इन दोनोंकी भिन्नतामात्रका ही जिसमें ज्ञान रहता है, ऐसी सबीज समाधिको प्राप्त योगीका सब भावों-पर स्वामिभाव और सर्वज्ञभाव हो जाता है।'

व्याख्या—ग्रहीतृविषयक समाधिसे जब बुद्धिके रजोगुण और तमोगुणसम्बन्धी संस्कार सर्वथा धुलकर उसमें शुद्ध सत्त्वगुणके ही संस्कार रह जाते हैं, उस समय केवलमात्र पुरुष और प्रकृतिकी भिन्नताका अनुभव करनेवाली वृत्ति रहती है, इसीको विवेकज्ञान भी कहते हैं (योग० ३। ५४, ४। २५)। इसीको पहले स्वार्थमें संयम करनेसे होनेवाले पुरुषज्ञानके नामसे कहा है (योग० ३। ३५)। ग्रहीतृविषयक समाधिके द्वारा जब यह स्थिति प्राप्त हो जाती है, उस समय योगीको समस्त भावोंपर स्वामिभाव प्राप्त हो जाता है अर्थात् सम्पूर्ण गुण जो कि कार्यका आरम्भ करनेमें लगे हुए हैं और जो अनारम्भ-अवस्था में हैं, वे सब दासकी भाँति आज्ञा-