पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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इन्द्रियाँ और मन—ये सभी अहंकारसे उत्पन्न हैं तथा मन और इन्द्रियोंके मेलसे पुरुष विषयोंको ग्रहण करता है या अकेले मनके द्वारा करता है। अतः यहाँ इन्द्रियजयसे मनसहित सब इन्द्रियोंकी जय समझनी चाहिये तथा मनमें की जानेवाली और अस्मितामें की जानेवाली समाधिको भी ग्रहणमें की जानेवाली समाधिके अन्तर्गत समझना चाहिये ॥४७॥
**सम्बन्ध—**उक्त इन्द्रियजयका फल बतलाते हैं—
ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥४८॥
'उससे (इन्द्रियजयसे) मनके सदृश गति, शरीरके बिना भी विषयोंका अनुभव करनेकी शक्ति और प्रकृतिपर अधिकार—ये तीनों सिद्धियाँ मिलती हैं।'
**व्याख्या—**इन तीनों सिद्धियोंका अलग-अलग स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिये—
(१) **मनोजवित्व—**स्थूल शरीर और इन्द्रियोंके सहित मनकी तरह एक क्षणमें कहीं-से-कहीं दूर देशमें जानेकी शक्तिको मनोजवित्व अर्थात् मनके सदृश गतिकी शक्ति कहते हैं। यह ग्रहण-अवस्थामें संयमका फल है।
(२) **विकरणभाव—**स्थूल शरीरके बिना ही दूर देशमें स्थित वस्तुओंको प्रत्यक्ष कर लेनेकी शक्तिको विकरणभाव कहते हैं। जब योगीकी महाविदेहा धारणा (योग० ३।४३) सिद्ध हो जाती है, उस समय भी मन और इन्द्रियोंमें यही शक्ति काम करती है; उसीसे मनुष्य दूर देशमें स्थित पर-शरीरको प्रत्यक्ष करके उसमें प्रविष्ट होता है (योग० ३।३८); यह स्वरूपावस्थामें संयमका फल है।