पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूतिपाद-३ ११७
ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ४७
‘ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व—इन पाँचों अवस्थाओंमें संयम करनेसे मनसहित समस्त इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त हो जाती है।’
व्याख्या—मनसहित इन्द्रियोंकी पाँच अवस्थाएँ हैं। उनमें क्रमसे संयम करनेसे योगीका इन्द्रियोंपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। उनकी अवस्थाओंके पाँच भेद इस प्रकार हैं—
( १ ) ग्रहण—विषयोंको ग्रहण करते समय जो वृत्तिके आकारमें मनसहित इन्द्रियोंकी अवस्था है, यह उनकी ग्रहण-अवस्था है।
( २ ) स्वरूप—मन और इन्द्रियोंका स्वाभाविक स्वरूप, जो कि अपने-अपने स्थानमें विद्यमान रहता है और लक्षण ( संकेत ) से जाननेमें आता है, यह उनकी स्वरूप-अवस्था है।
( ३ ) अस्मिता—यह मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्मरूप है। इसीसे मनसहित दसों इन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है, यह उनकी सूक्ष्मावस्था है।
( ४ ) अन्वय—मनसहित सब इन्द्रियोंमें जो तीनों गुणोंका स्वभाव यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति व्याप्त है, वह इनकी अन्वय-अवस्था है।
( ५ ) अर्थवत्त्व—ये मनसहित सब इन्द्रियाँ पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये हैं, यही इनकी अर्थवत्त्व-अवस्था ( सार्थकता ) है।
इस प्रकार जब मन और दसों इन्द्रियोंकी पाँचों अवस्थाओंमें योगी क्रमसे संयम करके भलीभाँति उनको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब इन सबपर उसका पूरा अधिकार हो जाता है।