पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
विभूतिपाद-३ ११७
ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ४७
‘ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व—इन पाँचों अवस्थाओंमें संयम करनेसे मनसहित समस्त इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त हो जाती है।’
व्याख्या—मनसहित इन्द्रियोंकी पाँच अवस्थाएँ हैं। उनमें क्रमसे संयम करनेसे योगीका इन्द्रियोंपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। उनकी अवस्थाओंके पाँच भेद इस प्रकार हैं—
( १ ) ग्रहण—विषयोंको ग्रहण करते समय जो वृत्तिके आकारमें मनसहित इन्द्रियोंकी अवस्था है, यह उनकी ग्रहण-अवस्था है।
( २ ) स्वरूप—मन और इन्द्रियोंका स्वाभाविक स्वरूप, जो कि अपने-अपने स्थानमें विद्यमान रहता है और लक्षण ( संकेत ) से जाननेमें आता है, यह उनकी स्वरूप-अवस्था है।
( ३ ) अस्मिता—यह मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्मरूप है। इसीसे मनसहित दसों इन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है, यह उनकी सूक्ष्मावस्था है।
( ४ ) अन्वय—मनसहित सब इन्द्रियोंमें जो तीनों गुणोंका स्वभाव यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति व्याप्त है, वह इनकी अन्वय-अवस्था है।
( ५ ) अर्थवत्त्व—ये मनसहित सब इन्द्रियाँ पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये हैं, यही इनकी अर्थवत्त्व-अवस्था ( सार्थकता ) है।
इस प्रकार जब मन और दसों इन्द्रियोंकी पाँचों अवस्थाओंमें योगी क्रमसे संयम करके भलीभाँति उनको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब इन सबपर उसका पूरा अधिकार हो जाता है।
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इन्द्रियाँ और मन—ये सभी अहंकारसे उत्पन्न हैं तथा मन और इन्द्रियोंके मेलसे पुरुष विषयोंको ग्रहण करता है या अकेले मनके द्वारा करता है। अतः यहाँ इन्द्रियजयसे मनसहित सब इन्द्रियोंकी जय समझनी चाहिये तथा मनमें की जानेवाली और अस्मितामें की जानेवाली समाधिको भी ग्रहणमें की जानेवाली समाधिके अन्तर्गत समझना चाहिये ॥४७॥
**सम्बन्ध—**उक्त इन्द्रियजयका फल बतलाते हैं—
ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥४८॥
'उससे (इन्द्रियजयसे) मनके सदृश गति, शरीरके बिना भी विषयोंका अनुभव करनेकी शक्ति और प्रकृतिपर अधिकार—ये तीनों सिद्धियाँ मिलती हैं।'
**व्याख्या—**इन तीनों सिद्धियोंका अलग-अलग स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिये—
(१) **मनोजवित्व—**स्थूल शरीर और इन्द्रियोंके सहित मनकी तरह एक क्षणमें कहीं-से-कहीं दूर देशमें जानेकी शक्तिको मनोजवित्व अर्थात् मनके सदृश गतिकी शक्ति कहते हैं। यह ग्रहण-अवस्थामें संयमका फल है।
(२) **विकरणभाव—**स्थूल शरीरके बिना ही दूर देशमें स्थित वस्तुओंको प्रत्यक्ष कर लेनेकी शक्तिको विकरणभाव कहते हैं। जब योगीकी महाविदेहा धारणा (योग० ३।४३) सिद्ध हो जाती है, उस समय भी मन और इन्द्रियोंमें यही शक्ति काम करती है; उसीसे मनुष्य दूर देशमें स्थित पर-शरीरको प्रत्यक्ष करके उसमें प्रविष्ट होता है (योग० ३।३८); यह स्वरूपावस्थामें संयमका फल है।
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( ३ ) प्रधानजय—कार्य और कारणरूपमें स्थित प्रकृतिके सम्पूर्ण भेदोंपर पूरा अधिकार हो जाना 'प्रधानजय' है; यह अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व-अवस्था में संयमका फल है। यह संयम ही प्रकृतिलय कहलाता है।
ये तीनों प्रकारकी सिद्धियाँ ग्रहणविषयक समाधि सिद्ध हो जानेपर अपने-आप मिल जाती हैं ॥४८॥
सम्बन्ध—अब ग्रहीतामें होनेवाली ग्रहीतृविषयक समाधिका फलसहित वर्णन करते हैं—
सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥४९॥
'बुद्धि और पुरुष—इन दोनोंकी भिन्नतामात्रका ही जिसमें ज्ञान रहता है, ऐसी सबीज समाधिको प्राप्त योगीका सब भावों-पर स्वामिभाव और सर्वज्ञभाव हो जाता है।'
व्याख्या—ग्रहीतृविषयक समाधिसे जब बुद्धिके रजोगुण और तमोगुणसम्बन्धी संस्कार सर्वथा धुलकर उसमें शुद्ध सत्त्वगुणके ही संस्कार रह जाते हैं, उस समय केवलमात्र पुरुष और प्रकृतिकी भिन्नताका अनुभव करनेवाली वृत्ति रहती है, इसीको विवेकज्ञान भी कहते हैं (योग० ३। ५४, ४। २५)। इसीको पहले स्वार्थमें संयम करनेसे होनेवाले पुरुषज्ञानके नामसे कहा है (योग० ३। ३५)। ग्रहीतृविषयक समाधिके द्वारा जब यह स्थिति प्राप्त हो जाती है, उस समय योगीको समस्त भावोंपर स्वामिभाव प्राप्त हो जाता है अर्थात् सम्पूर्ण गुण जो कि कार्यका आरम्भ करनेमें लगे हुए हैं और जो अनारम्भ-अवस्था में हैं, वे सब दासकी भाँति आज्ञा-
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पालन करनेके लिये सर्वभावसे उपस्थित हो जाते हैं। तथा उसे भूत, वर्तमान और भविष्य अवस्थाओंमें स्थित समस्त गुणोंका एक साथ भलीभाँति ज्ञान हो जाता है। इसीसे वह योगी सर्वज्ञ कहलाता है; इसके बादकी अवस्था धर्ममेघसमाधि है (योग० ४। २९) ॥४९॥
**सम्बन्ध—**पहले पादके सैंतालीसवें सूत्रमें कही हुई ऊँची-से-ऊँची सबीज समाधिको और अड़तालीसवें सूत्रमें कही हुई ऋतम्भरा प्रज्ञाको भी निर्बीज समाधिका बहिरङ्ग साधन बतलाया है, अतः उपर्युक्त सिद्धिसे भी विरक्त होनेपर निर्बीज समाधिरूप कैवल्यकी प्राप्ति बतलाते हैं—
तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥५०॥
'उसमें (उपर्युक्त सिद्धिमें) भी वैराग्य होनेसे दोषके बीजका नाश हो जानेपर कैवल्यकी प्राप्ति होती है।'
**व्याख्या—**ग्रहीतृविषयक समाधिमें जब यह ज्ञान हो जाता है कि बुद्धि और पुरुष—दोनों अत्यन्त भिन्न हैं, इनका संयोग अविद्याकृत है अर्थात् जब यह बात विवेकज्ञानसे प्रत्यक्ष हो जाती है, उस समय उसके सामने उपर्युक्त सिद्धियोंका प्रादुर्भाव होता है। उनमें न अटककर जो योगी पुरुषको सर्वथा असङ्ग, निर्विकार, कूटस्थ, आनन्दमय और चेतन तथा समस्त गुण और उसके कार्यको प्रतिक्षण बदलनेवाला, जड और दुःखप्रद समझकर सम्पूर्ण गुणोंसे और उनके कार्यसे अत्यन्त विरक्त हो जाता है (योग० १। १६), उक्त परवैराग्यसे जिसके दोषोंके बीजरूप अन्तिम वृत्तिका भी सर्वथा निरोध हो जाता है, उसकी निर्बीज समाधि हो जाती है। इस अवस्थामें अपनी वृत्तियोंके संस्कारोंके सहित
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चित्त अपने कारणमें विलीन हो जाता है और पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है (योग० ४ । ३४) । यह पुरुषका गुणोंके साथ आत्यन्तिक वियोग है। इसीको कैवल्य कहते हैं ॥५०॥
सम्बन्ध— जब साधक कुछ उन्नत अवस्थामें जाने लगता है, तब उसके जीवनमें नाना प्रकारके विघ्न आया करते हैं, अतः उनसे बचनेके लिये सावधान करते हैं—
स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ॥५१॥
‘लोकपाल देवताओंके बुलानेपर न तो (उनके भोगोंमें) सङ्ग (प्रेम) करना चाहिये और न अभिमान ही करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे पुनः अनिष्ट होना संभव है।’
व्याख्या— जब योगीकी अच्छी स्थिति हो जाती है, उस समय उसे बड़े-बड़े लोकपाल अधिकारी देवता और सिद्धोंके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं, उस समय देवतालोग उसे अपने लोकोंमें भोगोंका सुख दिखाकर नाना प्रकारसे उन भोगोंकी बड़ाई करके अपने पास बुलाया करते हैं, उस समय साधकको खूब सावधान रहना चाहिये, उनके प्रलोभनमें नहीं पड़ना चाहिये। अपने मनमें बार-बार यह भाव लाना चाहिये कि जन्म-जन्मान्तरमें कर्मोंका भोग करते-करते इस मनुष्यशरीरमें बड़े सौभाग्यसे महापुरुषोंकी और ईश्वरकी परम दयासे मुझे यह स्थिति प्राप्त हुई है, इसके सामने ये नाना प्रकारके क्षणभङ्गुर भोग अत्यन्त तुच्छ हैं, इनके प्रलोभनमें पड़कर मैं अपने-आपको कैसे संसारसमुद्रमें डुबा सकता हूँ। मैंने तो इन सबका
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तत्त्व भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लिया है, इनमें सारकी गन्ध भी नहीं है। इस प्रकारकी भावनासे उनसे विरक्त हो जाना चाहिये, उनमें जरा-सा भी अपने चित्तका रागयुक्त सम्बन्ध यानी आसक्ति नहीं होने देनी चाहिये तथा इस बातका अभिमान भी अपने मनमें नहीं आने देना चाहिये कि मैं कैसी उच्च स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ, जिसके कारण बड़े-बड़े देवतालोग भी मेरा सत्कार करते हैं और मुझे अपने लोकोंमें बुलाते हैं। क्योंकि सङ्ग और अभिमान करनेसे साधकके पुनः संसारचक्रमें फँसनेका प्रसङ्ग (मौका) आ जाता है। अतः साधकको हर समय हरेक प्रकारके विघ्नसे खूब सावधान रहना चाहिये; यह भाव है ॥५१॥
**सम्बन्ध—**विवेकज्ञानकी उत्पत्तिका दूसरा उपाय बतलाते हैं—
क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥५२॥
'क्षण और उसके क्रममें संयम करनेसे विवेकज्ञान उत्पन्न होता है।'
**व्याख्या—**कालका जो छोटे-से-छोटा हिस्सा है, जिससे छोटा विभाग हो ही नहीं सकता, उसे 'क्षण' कहते हैं; उसका जो क्रम है अर्थात् एक क्षणके बाद दूसरे क्षणके प्रकट होनेका जो लगातार सिलसिला है, उसका नाम क्रम है। दो क्षण एक साथ नहीं रह सकते और दोनोंके बीचमें किसी औरका व्यवधान भी नहीं है, एकके पीछे दूसरे क्षणका सिलसिला चालू रहता है, इसको 'क्रम' कहते हैं। अतः क्षण और उसके क्रममें संयम कर लेनेसे विवेकज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ५२ ॥
**सम्बन्ध—**उस विवेकज्ञानका लक्षण करते हैं—
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जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥ ५३॥
'(जिन वस्तुओंका) जाति, लक्षण और देशभेदसे भेद नहीं किया जा सकता, इस कारण जो दो वस्तुएँ तुल्य (एकके सदृश) प्रतीत होती हैं, उनके भेदकी उपलब्धि उस (विवेक-ज्ञान) से होती है।'
व्याख्या—वस्तुओंका विवेचन करके उनका भेद समझानेके तीन कारण हैं—(१) वस्तुकी जाति, (२) वस्तुका लक्षण अर्थात् वर्ण, आकृति आदि, (३) उसका देश अर्थात् स्थान—इन तीनोंके भेदसे वस्तुओंकी भिन्नताका विवेचन होता है; परंतु जिन दो वस्तुओंमें इनसे भेदकी उपलब्धि नहीं हो सके, उनके भेदको जो प्रत्यक्ष करा देनेवाला है, उसका नाम विवेक-ज्ञान है ॥ ५३ ॥
सम्बन्ध—उस विवेकज्ञानकी विशेषताका वर्णन करते हैं—
तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥ ५४ ॥
'जो संसारसमुद्रसे तारनेवाला है, सबको जाननेवाला है, सब प्रकारसे जाननेवाला है और बिना क्रमके (पूर्वापरके) जाननेवाला है, वह विवेकज्ञान है।'
व्याख्या—यह ज्ञान परवैराग्यको उत्पन्न करके योगीकी कैवल्य-अवस्थाका सम्पादन करनेमें हेतु है, इसलिये इसको तारक अर्थात् संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाला कहा है। इसके द्वारा
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योगी समस्त वस्तुओंको एक साथ सब प्रकारसे जान सकता है, इस कारण यह 'सर्वविषयम्' और 'सर्वथाविषयम्' कहलाता है। इसके द्वारा योगी हरेक वस्तुको बिना क्रमके एक साथ जान सकता है, इस कारण इसको 'अक्रमम्' भी कहते हैं। यह ज्ञानकी अन्तिम अवस्था है, इससे ऊँची कोई स्थिति नहीं है। 'अक्रमम्' का यह भी भाव समझना चाहिये कि यह क्रमसे रहित है, अर्थात् दूसरे ज्ञानोंकी भाँति परिवर्तनशील नहीं है। इसी ज्ञानको पहले पादके सोलहवें सूत्रमें 'पुरुषख्याति' के नामसे परवैराग्यका हेतु बतलाया है ॥५४॥
सम्बन्ध— ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे विवेकज्ञान होनेपर ही कैवल्य हो, ऐसा नियम नहीं है। इसके सिवा दूसरे प्रकारसे भी विवेकज्ञान होकर कैवल्य प्राप्त हो सकता है; अतः उसके लिये जो बात अवश्य होनी चाहिये, उसका वर्णन करते हैं—
सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम् ॥५५॥
'बुद्धि और पुरुष—इन दोनोंकी जब समानभावसे शुद्धि हो जाती है, तब कैवल्य होता है।'
व्याख्या— इधर बुद्धि अत्यन्त निर्मल होकर अपने कारणमें विलीन होने लग जाती है और उधर पुरुषका जो बुद्धिके साथ अज्ञानकृत सम्बन्ध है, उसका और तज्जनित मल-विक्षेप-आवरणका अभाव होनेसे पुरुष भी निर्मल हो जाता है। इस प्रकार जब दोनोंकी समभावसे शुद्धि हो जाती है, तब कैवल्य होता है; वह चाहे किसी भी निमित्तसे किसी भी प्रकारसे क्यों न हो जाय ॥५५॥
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
कैवल्यपाद-४
पहले पादमें प्रधानतासे समाधिके स्वरूपका वर्णन है, इस कारण उसे समाधिपाद कहते हैं। दूसरेमें प्रधानतासे समाधिके साधनोंका वर्णन है, इस कारण उसे साधनपाद कहते हैं। तीसरेमें प्रधानतासे समाधिद्वारा प्राप्त होनेवाली नाना प्रकारकी सिद्धियोंका वर्णन है, अतः उसे विभूतिपाद कहते हैं। इन तीनों पादोंमें समाधिके वास्तविक फल (कैवल्य) का वर्णन प्रसङ्गानुसार हुआ है, किन्तु विवेचनपूर्वक नहीं हुआ; अतः उसका अच्छी तरह वर्णन करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया गया है और इसीलिये इसका नाम 'कैवल्यपाद' रक्खा गया है।
सम्बन्ध—तीसरे पादमें जो नाना प्रकारकी सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं, वे केवल समाधिसे ही होती हैं, ऐसी बात नहीं है; उनमें दूसरे भी निमित्त हो सकते हैं। अतः उनका वर्णन करते हैं—
जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ॥ १॥
'जन्मसे होनेवाली, ओषधिसे होनेवाली, मन्त्रसे होनेवाली, तपसे होनेवाली और समाधिसे होनेवाली (-ऐसे पाँच प्रकारकी) सिद्धियाँ होती हैं।'
४. चतुर्थ पाद — कैवल्यपाद (सूत्र १-३४)
१२६ पातञ्जलयोगदर्शन
व्याख्या—शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें परिवर्तन होनेपर जो पहलेकी अपेक्षा विलक्षण (अलौकिक) शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है, उसको सिद्धि कहते हैं। ये सिद्धियाँ पाँच कारणोंसे होती हैं। उनके भेद इस प्रकार हैं—
(१) जन्मसे होनेवाली सिद्धि—जब प्राणी मरकर एक योनिसे दूसरी योनिमें जाता है, तब उसके प्रारब्धानुसार शरीर, इन्द्रियों और चित्तका परिवर्तन होकर, उनमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है (योग० १ । १९)। जैसे—मनुष्य-योनिसे देवादि योनियोंकी प्राप्ति होनेसे शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें अपूर्व शक्ति आ जाती है, इसे 'जन्मजा' सिद्धि कहते हैं। कपिल, वेदव्यास, शुकदेव आदि महर्षियोंमें कई प्रकारकी जन्मसे ही होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन इतिहास और पुराणोंमें आता है। इसी तरह दूसरे प्रकारकी सिद्धियोंको भी समझ लेना चाहिये।
(२) ओषधिसे होनेवाली सिद्धि—जब मनुष्य किसी ओषधिके सेवनसे अपने शरीरका कल्प कर लेता है, तब उससे भी शरीरमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है। इसे 'ओषधिजा' सिद्धि कहते हैं। ओषधि (भौतिक पदार्थों) द्वारा किसी नेत्र आदि इन्द्रियोंमें अद्भुत शक्तिका प्रादुर्भाव भी इसीमें आ जाता है। ओषधिसे केवल मनुष्यके ही शरीर आदिका परिवर्तन होता हो, ऐसी बात नहीं है; वृक्ष, लता और पशु-पक्षी आदिमें भी अपूर्व शक्ति आ सकती है।
कैवल्यपाद-४ १२७
(३) मन्त्रसे होनेवाली सिद्धि—जब मनुष्य विलक्षण सामर्थ्य प्राप्त करनेके लिये किसी मन्त्रका विधिवत् अनुष्ठान करता है, तब उससे भी शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें विलक्षण शक्तिका प्रादुर्भाव हो जाता है, इसे 'मन्त्रजा' सिद्धि कहते हैं (योग० २।४४)। इनका वर्णन तन्त्रशास्त्रोंमें विस्तारपूर्वक आता है।
(४) तपसे होनेवाली सिद्धि—जब मनुष्य शास्त्रोक्त तपका विधिवत् अनुष्ठान करता है, अथवा अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये भारी-से-भारी कष्ट सहर्ष सहन करता है, परन्तु धर्मका त्याग नहीं करता, तब उस तपश्चर्यासे उसके शरीर, इन्द्रियों और चित्तके समस्त मल भस्म हो जाते हैं और उनमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है, इसे 'तपजा' सिद्धि कहते हैं (योग० २।४३)। इतिहासग्रन्थोंमें इसका बहुत जगह वर्णन आता है। भरद्वाज और विश्वामित्र आदि ऋषियोंने इन सिद्धियोंका प्रयोग करके भी दिखाया है।
(५) समाधिसे होनेवाली सिद्धि—धारणा, ध्यान और समाधिके अभ्याससे जो शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव होता है, इसे 'समाधिजा' सिद्धि कहते हैं। इसका वर्णन तीसरे पादमें विस्तारपूर्वक स्वयं सूत्रकारने किया ही है।
उपर्युक्त सिद्धियोंकी प्राप्तिमें जो शरीर, इन्द्रियों और चित्तका एक प्रकारसे दूसरे प्रकारमें बदल जाना है, यही परिणामान्तर है, अतः इसीको 'जाति-अन्तर-परिणाम' कहते हैं ॥१॥
सम्बन्ध- उक्त 'जात्यन्तरपरिणाम' किस प्रकार कैसे होता है, यह बतलाते हैं—
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जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥२॥
'( यह ) एक जातिसे दूसरी जातिमें बदल जानारूप जात्यन्तरपरिणाम प्रकृतियोंके पूर्ण होनेसे होता है ।'
**व्याख्या—**उक्त जाति-अन्तर परिणामरूप परिवर्तनके लिये अर्थात् उन-उन विलक्षण शक्तियोंके प्रकट होनेके लिये जिन-जिन प्रकृतियोंकी अर्थात् जिन-जिन उपादान कारणरूप तत्त्वोंकी आवश्यकता है, उनकी पूर्तिसे शरीर, इन्द्रियों और चित्तका एक जातिसे दूसरी जातिमें परिवर्तन होता है ॥२॥
**सम्बन्ध—**यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जन्म, ओषधि आदि निमित्त कारण प्रकृतियोंकी पूर्णता कैसे कर देते हैं, क्या वे प्रकृतियोंके प्रयोजक ( चलानेवाले ) हैं, इसपर कहते हैं—
निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥३॥
'निमित्त प्रकृतियोंको चलानेवाला नहीं है, उससे तो केवल किसानकी भाँति रुकावटका छेदन किया जाता है ।'
**व्याख्या—**पहले बतलाये हुए जो जन्म, ओषधि आदि निमित्त कारण हैं, वे प्रकृतियोंको एक स्थानसे दूसरे स्थानमें ले जानेवाले नहीं हैं, उनका काम तो केवल रुकावटको दूर कर देनामात्र है; उसके बाद प्रकृतियोंकी पूर्ति तो अपने-आप हो जाती है। जैसे किसान एक खेतसे दूसरे खेतमें जल ले जाता है तो केवल उसकी रुकावटको ही दूर करता है, उस जलको चलानेका काम वह नहीं करता, रुकावट दूर होनेसे जल अपने-आप एक खेतसे दूसरे खेतमें
कैवल्यपाद-४ १२९
चला जाता है, उसी प्रकार पहले बतलाये हुए जन्म आदि निमित्तोंद्वारा जब रुकावट दूर हो जाती है, तब शरीर, इन्द्रियाँ और चित्त—इन सबमें परिवर्तनके लिये जिन-जिन वस्तुओंकी आवश्यकता होती है, उन-उनकी पूर्ति अपने-आप हो जाती है। रुकावट दूर होनेपर कमीको पूर्ण कर देना प्रकृतिका स्वभाव है ॥३॥
निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४॥
'बनाये हुए चित्त केवल अस्मितासे होते हैं।'
व्याख्या—चित्तका उपादान कारण अस्मिता है, अतः निर्मित यानी बनाये हुए सब चित्त केवल अस्मितासे ही उत्पन्न होते हैं ॥४॥
प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥५॥
'अनेक चित्तोंको नाना प्रकारकी प्रवृत्तियोंमें नियुक्त करने-वाला एक चित्त होता है।'
व्याख्या—जैसे अपने शरीरमें भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंको भिन्न-भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला एक चित्त रहता है, उसी प्रकार उन बनाये हुए चित्तोंको भिन्न-भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला सञ्चालक एक ही चित्त होता है, जो कि योगीका स्वाभाविक चित्त है *॥५॥
* यहाँ चौथे और पाँचवें सूत्रका जो अर्थ भाष्यकार और टीकाकारों-ने बतलाया है, उसके अनुसार छठे सूत्रकी सङ्गति ठीक नहीं बैठती; इस कारण टीकाकारोंने अगले सूत्रका सम्बन्ध प्रथम सूत्रसे जोड़ा है। तथा चौथे और पाँचवें सूत्रमें जिस प्रकारसे अनेक निर्माणचित्तोंकी बात कही है, वह भी यहाँके प्रसङ्गानुकूल नहीं प्रतीत होती; अतः वास्तवमें सूत्रकारका यहाँ क्या कहना है, यह विचारणीय विषय है। मैंने तो इन सूत्रोंका केवल शब्दानुवादमात्र कर दिया है।
पा० यो० द० ९—
१३० | पातञ्जलयोगदर्शन
सम्बन्ध—पहले सूत्रमें बतलाये हुए पाँच प्रकारके सिद्ध चित्तोंमें-से समाधिद्वारा सिद्ध हुए चित्तकी विशेषताका वर्णन करते हैं—
तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥
'उनमेंसे जो ध्यानजनित चित्त होता है, वह कर्मसंस्कारों-से रहित होता है।'
व्याख्या—जन्म, ओषधि, मन्त्र, तप और समाधि—इन पाँच कारणोंसे शरीर, इन्द्रिय और चित्तका विलक्षण परिणाम होता है—यह बात पहले कही गयी। उन पाँच प्रकारसे उत्कर्षताको प्राप्त हुए चित्तोंमेंसे जो चित्त ध्यानसे उत्पन्न होता है अर्थात् समाधिद्वारा विलक्षण शक्तिवाला होता है, वह कर्मसंस्कारोंसे रहित होता है; अतः वही कैवल्यका हेतु हो सकता है; दूसरे जन्म, औषध आदिके द्वारा विलक्षण शक्तियुक्त चित्तोंमें कर्मोंके संस्कार रहते हैं, इस कारण वे कैवल्यके हेतु नहीं हो सकते ॥६॥
सम्बन्ध—अब योगीके कर्मोंकी विलक्षणताका प्रतिपादन करते हैं—
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥७॥
'योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं तथा दूसरोंके तीन प्रकारके होते हैं।'
व्याख्या—शुक्लकर्म उन कर्मोंको कहते हैं, जिनका फल सुखभोग होता है और कृष्णकर्म उनको कहते हैं, जो नरक आदि दुःखोंके कारण हैं अर्थात् पुण्यकर्मोंका नाम शुक्लकर्म है और पापकर्मोंका नाम कृष्णकर्म है; सिद्ध योगीके कर्म किसी प्रकारका भी भोग देनेवाले नहीं होते, इसलिये उनको अशुक्ल और अकृष्ण
कैवल्यपाद-४ १३१
कहते हैं। योगीके सिवा साधारण मनुष्योंके कर्म तीन प्रकारके होते हैं—(१) शुक्ल अर्थात् पुण्यकर्म, (२) कृष्ण अर्थात् पापकर्म और (३) शुक्लकृष्ण अर्थात् पुण्य और पाप मिले हुए ॥७॥
**सम्बन्ध—**अब साधारण मनुष्योंके उन तीन प्रकारके कर्मोंका भोग किस प्रकार होता है, यह बतलाते हैं—
ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥८॥
'उन (तीन प्रकारके कर्मों) से उनके फलभोगानुकूल वासनाओंकी अभिव्यक्ति (उत्पत्ति) होती है।'
**व्याख्या—**वे कर्म संस्काररूपसे अन्तःकरणमें संगृहीत (इकट्ठे हुए) रहते हैं; अतः उन कर्मोंमेंसे जो कर्म जिस समय फल भोग करानेके लिये तैयार होता है, उस समय उस कर्मका जैसा फल होनेवाला है, वैसी ही वासना उत्पन्न होती है, अन्य कर्मोंके फलभोगकी नहीं ॥८॥
**सम्बन्ध—**कर्मसंस्कार तो अनेक जन्मोंके अनन्त होते हैं, उनमें देश, काल और जन्म-जन्मान्तरका अन्तर पड़ जाता है, इस स्थितिमें वर्तमान जन्मके अनुरूप फलभोगकी वासनाएँ कैसे उत्पन्न होती हैं, इसपर कहते हैं—
जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृति-संस्कारयोरेकरूपत्वात् ॥६॥
'जाति, देश और काल—इन तीनोंका व्यवधान रहनेपर भी कर्मके संस्कारोंमें व्यवधान नहीं होता है; क्योंकि स्मृति और संस्कार दोनों एकरूप होते हैं।'
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व्याख्या—कोई कर्म किसी एक जन्ममें किया गया है और कोई कर्म किसी दूसरे ही जन्ममें किया गया है, यह उन कर्मोंमें जन्मका व्यवधान है। इसी तरह भिन्न-भिन्न कर्मोंमें देश और कालका भी व्यवधान होता है। इस प्रकार जन्म, देश और कालका व्यवधान होते हुए भी जिस कर्मका फल प्राप्त होनेवाला है, उसके अनुसार भोगवासना उत्पन्न होनेमें कोई अड़चन नहीं पड़ती; क्योंकि स्मृति और संस्कार—ये दोनों एक ही हैं। जिस कर्मफलका उत्पादक निमित्त कारण आ जाता है, वैसी ही वासना प्रकट हो जाती है। यदि किसीको उसके पूर्वजन्मके कर्मका फल भोगनेके लिये गौकी योनि मिलनेवाली है, तो उसने गौकी योनि जब कभी पायी है, उसकी वासना प्रकट हो जायगी। भाव यह कि चाहे उस जन्मके बाद दूसरे कितने ही जन्म बीत चुके हों, कितना ही समय बीत चुका हो और वह किसी भी देशमें हुआ हो, उसकी वासना स्फुरित हो जायगी। स्मृति और संस्कारोंकी एकता होनेके कारण जो फल मिलना है, उसीके अनुकूल भोगवासना यानी स्मृति पैदा हो जाती है॥९॥
**सम्बन्ध—**यहाँ यह शङ्का होती है कि जब वासनाओंके अनुसार ही जन्म होता है और कर्मोंके अनुसार वासना होती है, तब सबसे पहले जन्म देनेवाली वासना कहाँसे आयी, इसपर कहते हैं—
तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥१०॥
'वे वासनाएँ अनादि हैं, क्योंकि प्राणीमें अपने बने रहनेकी इच्छा नित्य रहती है।'
**व्याख्या—**प्रत्येक प्राणीको जीवनकी इच्छा नित्य बनी रहती है, मृत्युका भय तुरंत जन्मे हुए क्षुद्र-से-क्षुद्र जीवोंमें भी देखा जाता
कैवल्यपाद-४ | १३३
है, इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है। उस जन्ममें भी मरणभयकी व्याप्ति होनेसे जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा अनादि सिद्ध हो जाती है। अतएव वासनाओंका अनादित्व भी अपने-आप सिद्ध हो जाता है ॥१०॥
**सम्बन्ध—**इस प्रकार यदि वासनाएँ अनादि हैं, तब तो इनका अभाव भी नहीं होता होगा, फिर पुरुषकी मुक्ति कैसे होगी, इसपर कहते हैं—
हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥११॥
'हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन—इनसे वासनाओंका संग्रह होता है, इसलिये इन (चारों) का अभाव होनेसे उन (वासनाओं) का भी (सर्वथा) अभाव हो जाता है।'
**व्याख्या—**वासनाओंका हेतु अविद्यादि क्लेश और उनके रहते हुए होनेवाले कर्म हैं। इनका फल पुनर्जन्म, आयु और भोग है। आश्रय चित्त है और शब्दादि विषय आलम्बन है। वासनाएँ इनके सम्बन्धसे ही संगृहीत हो रही हैं। जब योगसाधनोंसे इनका अभाव हो जाता है अर्थात् जब विवेकज्ञानसे अविद्याका नाश हो जाता है (योग० ४।३०), तब कर्मोंमें फल देनेकी सामर्थ्य नहीं रहती, चित्त अपने कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४।३४)। उपर्युक्त साधनोंके न रहनेसे विषयोंके साथ पुरुषका सम्बन्ध नहीं होता। इस प्रकार हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन—इन चारोंका अभाव होनेसे वासनाओंका अभाव अपने-आप हो जाता है, अतः योगीका पुनर्जन्म नहीं होता ॥११॥
**सम्बन्ध—**यदि सत् वस्तुका कभी अभाव होता ही नहीं, तब
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वासनाओंका और उनके हेतु आदिका नाश होना कैसे सम्भव है, इसपर कहते हैं—
अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥ १२ ॥
‘धर्मोंमें कालका भेद होता है, इस कारण जो धर्म (अविद्या, वासना, चित्त और चित्तकी वृत्तियाँ आदि) अतीत हो गये हैं और जो अनागत हैं—अभी प्रकट नहीं हुए हैं, उनका भी स्वरूपसे अस्तित्व है।’
व्याख्या—वस्तुका वास्तवमें अभाव कभी नहीं होता, वस्तुके धर्म चित्त और वासना आदि कुछ अनागत स्थितिमें रहते हैं, कुछ वर्तमान स्थितिमें और कुछ अतीत स्थितिमें। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि जो वर्तमान हैं, उन्हींकी सत्ता है, दूसरोंकी नहीं। क्योंकि उनका स्वरूपसे अभाव नहीं होता है, अतीत और अनागत अवस्थामें वे अपने कारणमें रहते हैं, व्यक्त नहीं रहते। यह अपने कारणमें विलीन हो जाना ही उनका नाश या अभाव है; योगीका उन वासनादिके साथ सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, अतः वे योगीके पुनर्जन्ममें हेतु नहीं बन सकते ॥१२॥
सम्बन्ध—धर्मोंका असली स्वरूप क्या है, सो बतलाते हैं—,
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥ १३ ॥
‘वे समस्त धर्म व्यक्त स्थितिमें और सूक्ष्म स्थितिमें (सदैव) गुणस्वरूप ही हैं।’
व्याख्या—वे धर्म जिस समय वर्तमान हैं, उस समय भी अपने कारणरूप गुणोंसे भिन्न नहीं हैं तथा जिस समय अनागत और अतीत—इन दोनों प्रकारकी सूक्ष्म स्थितिमें हैं, तब भी गुणस्वरूप
कैवल्यपाद-४ [१३५]
ही हैं; क्योंकि गुण उन धर्मरूप समस्त भिन्न-भिन्न वस्तुओंमें धर्मी ( कारण ) रूपसे सदैव अनुगत रहते हैं, उनका कभी अभाव नहीं होता । अतः वास्तवमें किसी भी वस्तुकी सत्ताका अभाव नहीं है । गुणस्वरूपसे वह सदैव विद्यमान है, परन्तु परिणामशील होनेके कारण उसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है ॥ १३ ॥
**सम्बन्ध—**यदि गुणोंका परिणाम होनेसे वास्तवमें सब कुछ गुणस्वरूप ही है तो फिर भिन्न-भिन्न स्वभाववाले तीनों गुणोंसे एक-एक वस्तुकी उत्पत्ति कैसे हो जाती है, हरेकसे अलग-अलग वस्तु होनी चाहिये थी ? इसपर कहते हैं—
परिणामैकत्वाद् वस्तुतत्त्वम् ॥ १४ ॥
'परिणामकी एकतासे वस्तुका वैसा होना सम्भव है ।'
**व्याख्या—**परस्पर भिन्न स्वभाववाले गुणोंका जब एक परिणाम होता है, सब मिल-जुलकर जब किसी एक वस्तुके रूपमें परिणत होते हैं, तब वैसा होनेमें कोई विरोध नहीं है । भिन्न-भिन्न वस्तुओंके एक परिणामसे एक वस्तुका प्रकट होना प्रत्यक्ष देखनेमें भी आता है । जैसे पृथ्वी और जल मिलकर सूर्य और चन्द्रमाकी रश्मियोंके सम्बन्धसे वृक्षके रूपमें परिणत हो जाते हैं और उसमें फिर नाना जाति, नाना आकार और नाना व्यक्तित्वका भेद हो जाता है । परन्तु वस्तुतः वे अपने धर्मियोंसे सर्वथा अभिन्न हैं, उसी प्रकार सब वस्तुएँ गुणस्वरूप ही हैं, उनसे भिन्न नहीं हैं ॥ १४ ॥
**सम्बन्ध—**जो लोग यह मानते हैं कि दृश्य कोई वस्तु नहीं है, वासनाके बलसे चित्त ही दृश्यरूपमें प्रतीत होने लग जाता है, उनकी मान्यता गलत है; क्योंकि—
| १३६ | पातञ्जलयोगदर्शन |
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वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥१५॥
'वस्तुकी एकतामें भी चित्तका भेद प्रत्यक्ष है, इसलिये (चित्त और उसके द्वारा देखी जानेवाली वस्तु) इन दोनोंका मार्ग अलग-अलग है।'
**व्याख्या—**एक ही वस्तुमें मनुष्योंके चित्तोंकी वृत्तियाँ अलग-अलग होती हैं अर्थात् अनेक चित्तका विषय वह एक ही वस्तु बनती है, यह प्रत्यक्ष है। इस परिस्थितिमें यदि वस्तु किसी एक चित्तकी कल्पनामात्र मानी जाय तो वह अनेक चित्तोंका विषय नहीं बन सकती। अतः सबको उसका स्वरूप नहीं दीखना चाहिये था; परन्तु ऐसा नहीं होता, वह सबको ही दीखती है। इसके सिवा यदि उसको अनेक चित्तोंकी कल्पना मानी जाय, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह वस्तु भिन्न-भिन्न कालमें अनेक चित्तोंका विषय बनती हुई देखी जाती है। इस परिस्थितिमें वह कौन-से अनेक चित्तोंकी कल्पना मानी जायगी ? अतएव वस्तुकी एकता और उसे विषय करनेवाले चित्तोंकी अनेकता होनेके कारण दोनों अलग-अलग पदार्थ हैं—यह मान्यता ही समीचीन है ॥१५॥
**सम्बन्ध—**पुनः पूर्वपक्षका खण्डन करनेके लिये दूसरा सूत्र कहते हैं—
न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥१६॥
'दृश्य वस्तु किसी एक चित्तके अधीन नहीं है (क्योंकि) जब वह चित्तका विषय नहीं रहेगी, उस समय वस्तुका क्या होगा?'