पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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सम्बन्ध—पहले सूत्रमें बतलाये हुए पाँच प्रकारके सिद्ध चित्तोंमें-से समाधिद्वारा सिद्ध हुए चित्तकी विशेषताका वर्णन करते हैं—
तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥
'उनमेंसे जो ध्यानजनित चित्त होता है, वह कर्मसंस्कारों-से रहित होता है।'
व्याख्या—जन्म, ओषधि, मन्त्र, तप और समाधि—इन पाँच कारणोंसे शरीर, इन्द्रिय और चित्तका विलक्षण परिणाम होता है—यह बात पहले कही गयी। उन पाँच प्रकारसे उत्कर्षताको प्राप्त हुए चित्तोंमेंसे जो चित्त ध्यानसे उत्पन्न होता है अर्थात् समाधिद्वारा विलक्षण शक्तिवाला होता है, वह कर्मसंस्कारोंसे रहित होता है; अतः वही कैवल्यका हेतु हो सकता है; दूसरे जन्म, औषध आदिके द्वारा विलक्षण शक्तियुक्त चित्तोंमें कर्मोंके संस्कार रहते हैं, इस कारण वे कैवल्यके हेतु नहीं हो सकते ॥६॥
सम्बन्ध—अब योगीके कर्मोंकी विलक्षणताका प्रतिपादन करते हैं—
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥७॥
'योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं तथा दूसरोंके तीन प्रकारके होते हैं।'
व्याख्या—शुक्लकर्म उन कर्मोंको कहते हैं, जिनका फल सुखभोग होता है और कृष्णकर्म उनको कहते हैं, जो नरक आदि दुःखोंके कारण हैं अर्थात् पुण्यकर्मोंका नाम शुक्लकर्म है और पापकर्मोंका नाम कृष्णकर्म है; सिद्ध योगीके कर्म किसी प्रकारका भी भोग देनेवाले नहीं होते, इसलिये उनको अशुक्ल और अकृष्ण