पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकैवल्यपाद-४ १२९
चला जाता है, उसी प्रकार पहले बतलाये हुए जन्म आदि निमित्तोंद्वारा जब रुकावट दूर हो जाती है, तब शरीर, इन्द्रियाँ और चित्त—इन सबमें परिवर्तनके लिये जिन-जिन वस्तुओंकी आवश्यकता होती है, उन-उनकी पूर्ति अपने-आप हो जाती है। रुकावट दूर होनेपर कमीको पूर्ण कर देना प्रकृतिका स्वभाव है ॥३॥
निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४॥
'बनाये हुए चित्त केवल अस्मितासे होते हैं।'
व्याख्या—चित्तका उपादान कारण अस्मिता है, अतः निर्मित यानी बनाये हुए सब चित्त केवल अस्मितासे ही उत्पन्न होते हैं ॥४॥
प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥५॥
'अनेक चित्तोंको नाना प्रकारकी प्रवृत्तियोंमें नियुक्त करने-वाला एक चित्त होता है।'
व्याख्या—जैसे अपने शरीरमें भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंको भिन्न-भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला एक चित्त रहता है, उसी प्रकार उन बनाये हुए चित्तोंको भिन्न-भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला सञ्चालक एक ही चित्त होता है, जो कि योगीका स्वाभाविक चित्त है *॥५॥
* यहाँ चौथे और पाँचवें सूत्रका जो अर्थ भाष्यकार और टीकाकारों-ने बतलाया है, उसके अनुसार छठे सूत्रकी सङ्गति ठीक नहीं बैठती; इस कारण टीकाकारोंने अगले सूत्रका सम्बन्ध प्रथम सूत्रसे जोड़ा है। तथा चौथे और पाँचवें सूत्रमें जिस प्रकारसे अनेक निर्माणचित्तोंकी बात कही है, वह भी यहाँके प्रसङ्गानुकूल नहीं प्रतीत होती; अतः वास्तवमें सूत्रकारका यहाँ क्या कहना है, यह विचारणीय विषय है। मैंने तो इन सूत्रोंका केवल शब्दानुवादमात्र कर दिया है।
पा० यो० द० ९—