भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146
१२८पातञ्जलयोगदर्शन

जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥२॥

'( यह ) एक जातिसे दूसरी जातिमें बदल जानारूप जात्यन्तरपरिणाम प्रकृतियोंके पूर्ण होनेसे होता है ।'

**व्याख्या—**उक्त जाति-अन्तर परिणामरूप परिवर्तनके लिये अर्थात् उन-उन विलक्षण शक्तियोंके प्रकट होनेके लिये जिन-जिन प्रकृतियोंकी अर्थात् जिन-जिन उपादान कारणरूप तत्त्वोंकी आवश्यकता है, उनकी पूर्तिसे शरीर, इन्द्रियों और चित्तका एक जातिसे दूसरी जातिमें परिवर्तन होता है ॥२॥

**सम्बन्ध—**यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जन्म, ओषधि आदि निमित्त कारण प्रकृतियोंकी पूर्णता कैसे कर देते हैं, क्या वे प्रकृतियोंके प्रयोजक ( चलानेवाले ) हैं, इसपर कहते हैं—

निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥३॥

'निमित्त प्रकृतियोंको चलानेवाला नहीं है, उससे तो केवल किसानकी भाँति रुकावटका छेदन किया जाता है ।'

**व्याख्या—**पहले बतलाये हुए जो जन्म, ओषधि आदि निमित्त कारण हैं, वे प्रकृतियोंको एक स्थानसे दूसरे स्थानमें ले जानेवाले नहीं हैं, उनका काम तो केवल रुकावटको दूर कर देनामात्र है; उसके बाद प्रकृतियोंकी पूर्ति तो अपने-आप हो जाती है। जैसे किसान एक खेतसे दूसरे खेतमें जल ले जाता है तो केवल उसकी रुकावटको ही दूर करता है, उस जलको चलानेका काम वह नहीं करता, रुकावट दूर होनेसे जल अपने-आप एक खेतसे दूसरे खेतमें