भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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कैवल्यपाद-४ १२७

(३) मन्त्रसे होनेवाली सिद्धि—जब मनुष्य विलक्षण सामर्थ्य प्राप्त करनेके लिये किसी मन्त्रका विधिवत् अनुष्ठान करता है, तब उससे भी शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें विलक्षण शक्तिका प्रादुर्भाव हो जाता है, इसे 'मन्त्रजा' सिद्धि कहते हैं (योग० २।४४)। इनका वर्णन तन्त्रशास्त्रोंमें विस्तारपूर्वक आता है।

(४) तपसे होनेवाली सिद्धि—जब मनुष्य शास्त्रोक्त तपका विधिवत् अनुष्ठान करता है, अथवा अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये भारी-से-भारी कष्ट सहर्ष सहन करता है, परन्तु धर्मका त्याग नहीं करता, तब उस तपश्चर्यासे उसके शरीर, इन्द्रियों और चित्तके समस्त मल भस्म हो जाते हैं और उनमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है, इसे 'तपजा' सिद्धि कहते हैं (योग० २।४३)। इतिहासग्रन्थोंमें इसका बहुत जगह वर्णन आता है। भरद्वाज और विश्वामित्र आदि ऋषियोंने इन सिद्धियोंका प्रयोग करके भी दिखाया है।

(५) समाधिसे होनेवाली सिद्धि—धारणा, ध्यान और समाधिके अभ्याससे जो शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव होता है, इसे 'समाधिजा' सिद्धि कहते हैं। इसका वर्णन तीसरे पादमें विस्तारपूर्वक स्वयं सूत्रकारने किया ही है।

उपर्युक्त सिद्धियोंकी प्राप्तिमें जो शरीर, इन्द्रियों और चित्तका एक प्रकारसे दूसरे प्रकारमें बदल जाना है, यही परिणामान्तर है, अतः इसीको 'जाति-अन्तर-परिणाम' कहते हैं ॥१॥

सम्बन्ध- उक्त 'जात्यन्तरपरिणाम' किस प्रकार कैसे होता है, यह बतलाते हैं—