पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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व्याख्या—शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें परिवर्तन होनेपर जो पहलेकी अपेक्षा विलक्षण (अलौकिक) शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है, उसको सिद्धि कहते हैं। ये सिद्धियाँ पाँच कारणोंसे होती हैं। उनके भेद इस प्रकार हैं—
(१) जन्मसे होनेवाली सिद्धि—जब प्राणी मरकर एक योनिसे दूसरी योनिमें जाता है, तब उसके प्रारब्धानुसार शरीर, इन्द्रियों और चित्तका परिवर्तन होकर, उनमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है (योग० १ । १९)। जैसे—मनुष्य-योनिसे देवादि योनियोंकी प्राप्ति होनेसे शरीर, इन्द्रियों और चित्तमें अपूर्व शक्ति आ जाती है, इसे 'जन्मजा' सिद्धि कहते हैं। कपिल, वेदव्यास, शुकदेव आदि महर्षियोंमें कई प्रकारकी जन्मसे ही होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन इतिहास और पुराणोंमें आता है। इसी तरह दूसरे प्रकारकी सिद्धियोंको भी समझ लेना चाहिये।
(२) ओषधिसे होनेवाली सिद्धि—जब मनुष्य किसी ओषधिके सेवनसे अपने शरीरका कल्प कर लेता है, तब उससे भी शरीरमें अपूर्व शक्तियोंका प्रादुर्भाव हो जाता है। इसे 'ओषधिजा' सिद्धि कहते हैं। ओषधि (भौतिक पदार्थों) द्वारा किसी नेत्र आदि इन्द्रियोंमें अद्भुत शक्तिका प्रादुर्भाव भी इसीमें आ जाता है। ओषधिसे केवल मनुष्यके ही शरीर आदिका परिवर्तन होता हो, ऐसी बात नहीं है; वृक्ष, लता और पशु-पक्षी आदिमें भी अपूर्व शक्ति आ सकती है।