भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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ॐ श्रीपरमात्मने नमः

कैवल्यपाद-४

पहले पादमें प्रधानतासे समाधिके स्वरूपका वर्णन है, इस कारण उसे समाधिपाद कहते हैं। दूसरेमें प्रधानतासे समाधिके साधनोंका वर्णन है, इस कारण उसे साधनपाद कहते हैं। तीसरेमें प्रधानतासे समाधिद्वारा प्राप्त होनेवाली नाना प्रकारकी सिद्धियोंका वर्णन है, अतः उसे विभूतिपाद कहते हैं। इन तीनों पादोंमें समाधिके वास्तविक फल (कैवल्य) का वर्णन प्रसङ्गानुसार हुआ है, किन्तु विवेचनपूर्वक नहीं हुआ; अतः उसका अच्छी तरह वर्णन करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया गया है और इसीलिये इसका नाम 'कैवल्यपाद' रक्खा गया है।

सम्बन्ध—तीसरे पादमें जो नाना प्रकारकी सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं, वे केवल समाधिसे ही होती हैं, ऐसी बात नहीं है; उनमें दूसरे भी निमित्त हो सकते हैं। अतः उनका वर्णन करते हैं—

जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ॥ १॥

'जन्मसे होनेवाली, ओषधिसे होनेवाली, मन्त्रसे होनेवाली, तपसे होनेवाली और समाधिसे होनेवाली (-ऐसे पाँच प्रकारकी) सिद्धियाँ होती हैं।'