भारतकोश
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पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ
१२८पातञ्जलयोगदर्शन

जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥२॥

'( यह ) एक जातिसे दूसरी जातिमें बदल जानारूप जात्यन्तरपरिणाम प्रकृतियोंके पूर्ण होनेसे होता है ।'

**व्याख्या—**उक्त जाति-अन्तर परिणामरूप परिवर्तनके लिये अर्थात् उन-उन विलक्षण शक्तियोंके प्रकट होनेके लिये जिन-जिन प्रकृतियोंकी अर्थात् जिन-जिन उपादान कारणरूप तत्त्वोंकी आवश्यकता है, उनकी पूर्तिसे शरीर, इन्द्रियों और चित्तका एक जातिसे दूसरी जातिमें परिवर्तन होता है ॥२॥

**सम्बन्ध—**यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जन्म, ओषधि आदि निमित्त कारण प्रकृतियोंकी पूर्णता कैसे कर देते हैं, क्या वे प्रकृतियोंके प्रयोजक ( चलानेवाले ) हैं, इसपर कहते हैं—

निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥३॥

'निमित्त प्रकृतियोंको चलानेवाला नहीं है, उससे तो केवल किसानकी भाँति रुकावटका छेदन किया जाता है ।'

**व्याख्या—**पहले बतलाये हुए जो जन्म, ओषधि आदि निमित्त कारण हैं, वे प्रकृतियोंको एक स्थानसे दूसरे स्थानमें ले जानेवाले नहीं हैं, उनका काम तो केवल रुकावटको दूर कर देनामात्र है; उसके बाद प्रकृतियोंकी पूर्ति तो अपने-आप हो जाती है। जैसे किसान एक खेतसे दूसरे खेतमें जल ले जाता है तो केवल उसकी रुकावटको ही दूर करता है, उस जलको चलानेका काम वह नहीं करता, रुकावट दूर होनेसे जल अपने-आप एक खेतसे दूसरे खेतमें

कैवल्यपाद-४ १२९

चला जाता है, उसी प्रकार पहले बतलाये हुए जन्म आदि निमित्तोंद्वारा जब रुकावट दूर हो जाती है, तब शरीर, इन्द्रियाँ और चित्त—इन सबमें परिवर्तनके लिये जिन-जिन वस्तुओंकी आवश्यकता होती है, उन-उनकी पूर्ति अपने-आप हो जाती है। रुकावट दूर होनेपर कमीको पूर्ण कर देना प्रकृतिका स्वभाव है ॥३॥

निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४॥

'बनाये हुए चित्त केवल अस्मितासे होते हैं।'

व्याख्या—चित्तका उपादान कारण अस्मिता है, अतः निर्मित यानी बनाये हुए सब चित्त केवल अस्मितासे ही उत्पन्न होते हैं ॥४॥

प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥५॥

'अनेक चित्तोंको नाना प्रकारकी प्रवृत्तियोंमें नियुक्त करने-वाला एक चित्त होता है।'

व्याख्या—जैसे अपने शरीरमें भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंको भिन्न-भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला एक चित्त रहता है, उसी प्रकार उन बनाये हुए चित्तोंको भिन्न-भिन्न कामोंमें नियुक्त करनेवाला सञ्चालक एक ही चित्त होता है, जो कि योगीका स्वाभाविक चित्त है *॥५॥


* यहाँ चौथे और पाँचवें सूत्रका जो अर्थ भाष्यकार और टीकाकारों-ने बतलाया है, उसके अनुसार छठे सूत्रकी सङ्गति ठीक नहीं बैठती; इस कारण टीकाकारोंने अगले सूत्रका सम्बन्ध प्रथम सूत्रसे जोड़ा है। तथा चौथे और पाँचवें सूत्रमें जिस प्रकारसे अनेक निर्माणचित्तोंकी बात कही है, वह भी यहाँके प्रसङ्गानुकूल नहीं प्रतीत होती; अतः वास्तवमें सूत्रकारका यहाँ क्या कहना है, यह विचारणीय विषय है। मैंने तो इन सूत्रोंका केवल शब्दानुवादमात्र कर दिया है।

पा० यो० द० ९—

१३० | पातञ्जलयोगदर्शन

सम्बन्ध—पहले सूत्रमें बतलाये हुए पाँच प्रकारके सिद्ध चित्तोंमें-से समाधिद्वारा सिद्ध हुए चित्तकी विशेषताका वर्णन करते हैं—

तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥

'उनमेंसे जो ध्यानजनित चित्त होता है, वह कर्मसंस्कारों-से रहित होता है।'

व्याख्या—जन्म, ओषधि, मन्त्र, तप और समाधि—इन पाँच कारणोंसे शरीर, इन्द्रिय और चित्तका विलक्षण परिणाम होता है—यह बात पहले कही गयी। उन पाँच प्रकारसे उत्कर्षताको प्राप्त हुए चित्तोंमेंसे जो चित्त ध्यानसे उत्पन्न होता है अर्थात् समाधिद्वारा विलक्षण शक्तिवाला होता है, वह कर्मसंस्कारोंसे रहित होता है; अतः वही कैवल्यका हेतु हो सकता है; दूसरे जन्म, औषध आदिके द्वारा विलक्षण शक्तियुक्त चित्तोंमें कर्मोंके संस्कार रहते हैं, इस कारण वे कैवल्यके हेतु नहीं हो सकते ॥६॥

सम्बन्ध—अब योगीके कर्मोंकी विलक्षणताका प्रतिपादन करते हैं—

कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥७॥

'योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं तथा दूसरोंके तीन प्रकारके होते हैं।'

व्याख्या—शुक्लकर्म उन कर्मोंको कहते हैं, जिनका फल सुखभोग होता है और कृष्णकर्म उनको कहते हैं, जो नरक आदि दुःखोंके कारण हैं अर्थात् पुण्यकर्मोंका नाम शुक्लकर्म है और पापकर्मोंका नाम कृष्णकर्म है; सिद्ध योगीके कर्म किसी प्रकारका भी भोग देनेवाले नहीं होते, इसलिये उनको अशुक्ल और अकृष्ण

कैवल्यपाद-४ १३१

कहते हैं। योगीके सिवा साधारण मनुष्योंके कर्म तीन प्रकारके होते हैं—(१) शुक्ल अर्थात् पुण्यकर्म, (२) कृष्ण अर्थात् पापकर्म और (३) शुक्लकृष्ण अर्थात् पुण्य और पाप मिले हुए ॥७॥

**सम्बन्ध—**अब साधारण मनुष्योंके उन तीन प्रकारके कर्मोंका भोग किस प्रकार होता है, यह बतलाते हैं—

ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥८॥

'उन (तीन प्रकारके कर्मों) से उनके फलभोगानुकूल वासनाओंकी अभिव्यक्ति (उत्पत्ति) होती है।'

**व्याख्या—**वे कर्म संस्काररूपसे अन्तःकरणमें संगृहीत (इकट्ठे हुए) रहते हैं; अतः उन कर्मोंमेंसे जो कर्म जिस समय फल भोग करानेके लिये तैयार होता है, उस समय उस कर्मका जैसा फल होनेवाला है, वैसी ही वासना उत्पन्न होती है, अन्य कर्मोंके फलभोगकी नहीं ॥८॥

**सम्बन्ध—**कर्मसंस्कार तो अनेक जन्मोंके अनन्त होते हैं, उनमें देश, काल और जन्म-जन्मान्तरका अन्तर पड़ जाता है, इस स्थितिमें वर्तमान जन्मके अनुरूप फलभोगकी वासनाएँ कैसे उत्पन्न होती हैं, इसपर कहते हैं—

जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृति-संस्कारयोरेकरूपत्वात् ॥६॥

'जाति, देश और काल—इन तीनोंका व्यवधान रहनेपर भी कर्मके संस्कारोंमें व्यवधान नहीं होता है; क्योंकि स्मृति और संस्कार दोनों एकरूप होते हैं।'

१३२पातञ्जलयोगदर्शन

व्याख्या—कोई कर्म किसी एक जन्ममें किया गया है और कोई कर्म किसी दूसरे ही जन्ममें किया गया है, यह उन कर्मोंमें जन्मका व्यवधान है। इसी तरह भिन्न-भिन्न कर्मोंमें देश और कालका भी व्यवधान होता है। इस प्रकार जन्म, देश और कालका व्यवधान होते हुए भी जिस कर्मका फल प्राप्त होनेवाला है, उसके अनुसार भोगवासना उत्पन्न होनेमें कोई अड़चन नहीं पड़ती; क्योंकि स्मृति और संस्कार—ये दोनों एक ही हैं। जिस कर्मफलका उत्पादक निमित्त कारण आ जाता है, वैसी ही वासना प्रकट हो जाती है। यदि किसीको उसके पूर्वजन्मके कर्मका फल भोगनेके लिये गौकी योनि मिलनेवाली है, तो उसने गौकी योनि जब कभी पायी है, उसकी वासना प्रकट हो जायगी। भाव यह कि चाहे उस जन्मके बाद दूसरे कितने ही जन्म बीत चुके हों, कितना ही समय बीत चुका हो और वह किसी भी देशमें हुआ हो, उसकी वासना स्फुरित हो जायगी। स्मृति और संस्कारोंकी एकता होनेके कारण जो फल मिलना है, उसीके अनुकूल भोगवासना यानी स्मृति पैदा हो जाती है॥९॥

**सम्बन्ध—**यहाँ यह शङ्का होती है कि जब वासनाओंके अनुसार ही जन्म होता है और कर्मोंके अनुसार वासना होती है, तब सबसे पहले जन्म देनेवाली वासना कहाँसे आयी, इसपर कहते हैं—

तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥१०॥

'वे वासनाएँ अनादि हैं, क्योंकि प्राणीमें अपने बने रहनेकी इच्छा नित्य रहती है।'

**व्याख्या—**प्रत्येक प्राणीको जीवनकी इच्छा नित्य बनी रहती है, मृत्युका भय तुरंत जन्मे हुए क्षुद्र-से-क्षुद्र जीवोंमें भी देखा जाता

कैवल्यपाद-४ | १३३

है, इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है। उस जन्ममें भी मरणभयकी व्याप्ति होनेसे जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा अनादि सिद्ध हो जाती है। अतएव वासनाओंका अनादित्व भी अपने-आप सिद्ध हो जाता है ॥१०॥

**सम्बन्ध—**इस प्रकार यदि वासनाएँ अनादि हैं, तब तो इनका अभाव भी नहीं होता होगा, फिर पुरुषकी मुक्ति कैसे होगी, इसपर कहते हैं—

हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥११॥

'हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन—इनसे वासनाओंका संग्रह होता है, इसलिये इन (चारों) का अभाव होनेसे उन (वासनाओं) का भी (सर्वथा) अभाव हो जाता है।'

**व्याख्या—**वासनाओंका हेतु अविद्यादि क्लेश और उनके रहते हुए होनेवाले कर्म हैं। इनका फल पुनर्जन्म, आयु और भोग है। आश्रय चित्त है और शब्दादि विषय आलम्बन है। वासनाएँ इनके सम्बन्धसे ही संगृहीत हो रही हैं। जब योगसाधनोंसे इनका अभाव हो जाता है अर्थात् जब विवेकज्ञानसे अविद्याका नाश हो जाता है (योग० ४।३०), तब कर्मोंमें फल देनेकी सामर्थ्य नहीं रहती, चित्त अपने कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४।३४)। उपर्युक्त साधनोंके न रहनेसे विषयोंके साथ पुरुषका सम्बन्ध नहीं होता। इस प्रकार हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन—इन चारोंका अभाव होनेसे वासनाओंका अभाव अपने-आप हो जाता है, अतः योगीका पुनर्जन्म नहीं होता ॥११॥

**सम्बन्ध—**यदि सत् वस्तुका कभी अभाव होता ही नहीं, तब

१३४पातञ्जलयोगदर्शन

वासनाओंका और उनके हेतु आदिका नाश होना कैसे सम्भव है, इसपर कहते हैं—

अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥ १२ ॥

‘धर्मोंमें कालका भेद होता है, इस कारण जो धर्म (अविद्या, वासना, चित्त और चित्तकी वृत्तियाँ आदि) अतीत हो गये हैं और जो अनागत हैं—अभी प्रकट नहीं हुए हैं, उनका भी स्वरूपसे अस्तित्व है।’

व्याख्या—वस्तुका वास्तवमें अभाव कभी नहीं होता, वस्तुके धर्म चित्त और वासना आदि कुछ अनागत स्थितिमें रहते हैं, कुछ वर्तमान स्थितिमें और कुछ अतीत स्थितिमें। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि जो वर्तमान हैं, उन्हींकी सत्ता है, दूसरोंकी नहीं। क्योंकि उनका स्वरूपसे अभाव नहीं होता है, अतीत और अनागत अवस्थामें वे अपने कारणमें रहते हैं, व्यक्त नहीं रहते। यह अपने कारणमें विलीन हो जाना ही उनका नाश या अभाव है; योगीका उन वासनादिके साथ सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, अतः वे योगीके पुनर्जन्ममें हेतु नहीं बन सकते ॥१२॥

सम्बन्ध—धर्मोंका असली स्वरूप क्या है, सो बतलाते हैं—,

ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥ १३ ॥

‘वे समस्त धर्म व्यक्त स्थितिमें और सूक्ष्म स्थितिमें (सदैव) गुणस्वरूप ही हैं।’

व्याख्या—वे धर्म जिस समय वर्तमान हैं, उस समय भी अपने कारणरूप गुणोंसे भिन्न नहीं हैं तथा जिस समय अनागत और अतीत—इन दोनों प्रकारकी सूक्ष्म स्थितिमें हैं, तब भी गुणस्वरूप

कैवल्यपाद-४ [१३५]

ही हैं; क्योंकि गुण उन धर्मरूप समस्त भिन्न-भिन्न वस्तुओंमें धर्मी ( कारण ) रूपसे सदैव अनुगत रहते हैं, उनका कभी अभाव नहीं होता । अतः वास्तवमें किसी भी वस्तुकी सत्ताका अभाव नहीं है । गुणस्वरूपसे वह सदैव विद्यमान है, परन्तु परिणामशील होनेके कारण उसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है ॥ १३ ॥

**सम्बन्ध—**यदि गुणोंका परिणाम होनेसे वास्तवमें सब कुछ गुणस्वरूप ही है तो फिर भिन्न-भिन्न स्वभाववाले तीनों गुणोंसे एक-एक वस्तुकी उत्पत्ति कैसे हो जाती है, हरेकसे अलग-अलग वस्तु होनी चाहिये थी ? इसपर कहते हैं—

परिणामैकत्वाद् वस्तुतत्त्वम् ॥ १४ ॥

'परिणामकी एकतासे वस्तुका वैसा होना सम्भव है ।'

**व्याख्या—**परस्पर भिन्न स्वभाववाले गुणोंका जब एक परिणाम होता है, सब मिल-जुलकर जब किसी एक वस्तुके रूपमें परिणत होते हैं, तब वैसा होनेमें कोई विरोध नहीं है । भिन्न-भिन्न वस्तुओंके एक परिणामसे एक वस्तुका प्रकट होना प्रत्यक्ष देखनेमें भी आता है । जैसे पृथ्वी और जल मिलकर सूर्य और चन्द्रमाकी रश्मियोंके सम्बन्धसे वृक्षके रूपमें परिणत हो जाते हैं और उसमें फिर नाना जाति, नाना आकार और नाना व्यक्तित्वका भेद हो जाता है । परन्तु वस्तुतः वे अपने धर्मियोंसे सर्वथा अभिन्न हैं, उसी प्रकार सब वस्तुएँ गुणस्वरूप ही हैं, उनसे भिन्न नहीं हैं ॥ १४ ॥

**सम्बन्ध—**जो लोग यह मानते हैं कि दृश्य कोई वस्तु नहीं है, वासनाके बलसे चित्त ही दृश्यरूपमें प्रतीत होने लग जाता है, उनकी मान्यता गलत है; क्योंकि—

१३६पातञ्जलयोगदर्शन

वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥१५॥

'वस्तुकी एकतामें भी चित्तका भेद प्रत्यक्ष है, इसलिये (चित्त और उसके द्वारा देखी जानेवाली वस्तु) इन दोनोंका मार्ग अलग-अलग है।'

**व्याख्या—**एक ही वस्तुमें मनुष्योंके चित्तोंकी वृत्तियाँ अलग-अलग होती हैं अर्थात् अनेक चित्तका विषय वह एक ही वस्तु बनती है, यह प्रत्यक्ष है। इस परिस्थितिमें यदि वस्तु किसी एक चित्तकी कल्पनामात्र मानी जाय तो वह अनेक चित्तोंका विषय नहीं बन सकती। अतः सबको उसका स्वरूप नहीं दीखना चाहिये था; परन्तु ऐसा नहीं होता, वह सबको ही दीखती है। इसके सिवा यदि उसको अनेक चित्तोंकी कल्पना मानी जाय, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह वस्तु भिन्न-भिन्न कालमें अनेक चित्तोंका विषय बनती हुई देखी जाती है। इस परिस्थितिमें वह कौन-से अनेक चित्तोंकी कल्पना मानी जायगी ? अतएव वस्तुकी एकता और उसे विषय करनेवाले चित्तोंकी अनेकता होनेके कारण दोनों अलग-अलग पदार्थ हैं—यह मान्यता ही समीचीन है ॥१५॥

**सम्बन्ध—**पुनः पूर्वपक्षका खण्डन करनेके लिये दूसरा सूत्र कहते हैं—

न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥१६॥

'दृश्य वस्तु किसी एक चित्तके अधीन नहीं है (क्योंकि) जब वह चित्तका विषय नहीं रहेगी, उस समय वस्तुका क्या होगा?'

कैवल्यपाद-४ १३७

व्याख्या- विद्यमान दृश्य वस्तु किसी एक चित्तकी कल्पना-मात्र नहीं है; क्योंकि यदि कल्पनामात्र मानी जाय तो जब वह चित्त उसको विषय करना (देखना) छोड़ दे, उस समय वह नहीं रहनी चाहिये। परन्तु ऐसा नहीं होता, वस्तु वैसी-की-वैसी ही विद्यमान रहती है। इससे यह सिद्ध होता है कि दीखनेवाली वस्तु किसी एक चित्तके अधीन नहीं है तथा दृश्य वस्तु चित्तसे भिन्न है और वह सच्ची है ॥१६॥

सम्बन्ध- यदि बाहरकी दृश्य वस्तु अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखती है तो वह कभी दीखती है और कभी नहीं दीखती, इसमें क्या कारण है? इसपर कहते हैं—

तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्॥१७॥

'चित्त, वस्तुके उपरागकी (अपनेमें उसका प्रतिबिम्ब पड़नेकी) अपेक्षावाला है, इस कारण उसके द्वारा वस्तु कभी ज्ञात और कभी अज्ञात होती है।'

व्याख्या- जिस पदार्थकी चित्तमें इन्द्रियोंकी समीपतासे परछाईं पड़ती है, उसी वस्तुको चित्त जान सकता है, अन्य वस्तुको नहीं। उसे वस्तुका ज्ञान प्राप्त करनेमें उसके उपराग (परछाईं—प्रतिबिम्ब) की अपेक्षा है। अतः जब जिस वस्तुका उसमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, यानी इन्द्रियोंके द्वारा चित्तसे जब जिस वस्तुका सम्बन्ध होता है, उस समय वह वस्तु उसके ज्ञात है और जिस समय वह उसकी वृत्तिका विषय नहीं बनती अर्थात् चित्तमें उपरञ्जित नहीं होती, उस समय अज्ञात है ॥१७॥

१३८ पातञ्जलयोगदर्शन

**सम्बन्ध—**इस प्रकार दृश्य वस्तुओंसे चित्तकी भिन्न सत्ता सिद्ध करके अब द्रष्टा पुरुषसे भी चित्तकी भिन्न सत्ता सिद्ध करते हैं—

सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्या- परिणामित्वात् ॥१८॥

'उस (चित्त) का स्वामी पुरुष परिणामी नहीं है, इसलिये चित्तकी वृत्तियाँ उसे सदा ज्ञात रहती हैं।'

**व्याख्या—**चित्त तो परिणामी है, इस कारण वह बाहरकी वस्तुओंको सदा नहीं देख सकता। जब जिस वस्तुका उसके साथ सम्बन्ध होता है, तभी उसे देखता है। किन्तु उस चित्तका स्वामी जो पुरुष है, वह अपरिणामी है। इस कारण वह उसकी वृत्तियोंको सदैव देखता रहता है। जिस समय जो वृत्ति उसमें उत्पन्न होती है और जो शान्त होती है, वे सभी उसे विदित रहती हैं ॥१८॥

**सम्बन्ध—**चित्त जिस प्रकार वस्तुका प्रकाशक है, उसी प्रकार अपना भी है। फिर चित्तसे भिन्न दूसरेको द्रष्टा माननेकी क्या आवश्यकता है ? इसपर कहते हैं—

न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥१९॥

'वह (चित्त) स्वप्रकाश (प्रकाशस्वरूप) नहीं है, क्योंकि वह दृश्य है।'

**व्याख्या—**चित्त दृश्य है, इसलिये जड है। वह स्वप्रकाश यानी अपने-आपको जाननेवाला—प्रकाशस्वरूप नहीं है, उसमें जो चेतनता दिखलायी देती है, जिसके कारण वह किसी अंशमें चेतन कहा जाता है, वह उसमें चेतन पुरुषका प्रतिबिम्ब पड़नेसे है। जब चित्तमें

कैवल्यपाद-४१३९

बाह्य वस्तुएँ और चेतन पुरुष—इन दोनोंका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उस समय पुरुष चित्तकी वृत्तियोंके रूपमें तद्रूप-सा हुआ रहता है (योग० १।४) और चित्त चेतन-सा प्रतीत होने लगता है; परन्तु वास्तवमें जैसे इन्द्रियाँ और शब्द आदि विषय दृश्य होनेके कारण स्वप्रकाश नहीं हैं, उसी प्रकार चित्त भी दृश्य होनेके कारण स्वप्रकाश नहीं है॥१९॥

सम्बन्ध—चित्तको स्वप्रकाश माननेमें दूसरा दोष दिखलाते हैं—

एकसमये चोभयानवधारणम् ॥२०॥

‘तथा (चित्त और उसका विषय)—इन दोनोंके स्वरूपको जानना भी एक कालमें नहीं हो सकता।’

व्याख्या—बाहरके पदार्थका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, तब द्रष्टा पुरुषको उस प्रतिबिम्बसहित चित्तका ज्ञान होना युक्तियुक्त है; क्योंकि वह अपरिणामी है। परन्तु चित्त अपने स्वरूपको और दृश्य पदार्थके स्वरूपको एक साथ नहीं जान सकता; क्योंकि परिणामशील होनेके कारण उसे एक ही कालमें दो ज्ञान नहीं हो सकते। अतः यही समझना चाहिये कि चित्त स्वप्रकाश नहीं है। चित्तका काम केवल बाह्य पदार्थके स्वरूपको अपने स्वामी द्रष्टा पुरुषके सामने रख देना है; फिर उसे जाननेका काम तो पुरुषका है ॥२०॥

सम्बन्ध—चित्तसे विषयका साक्षात्कार होता है और वह चित्त उस विषयसहित दूसरे चित्तसे देखा जाता है। इस प्रकार चित्तका और विषयका एक साथ ज्ञान हो जाता है, यह मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं—

२४० पातञ्जलयोगदर्शन

चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसङ्करश्च॥ २१॥

'एक चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य मान लेनेपर वह चित्त फिर दूसरे चित्तका दृश्य होगा—इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होगी और स्मृतिका भी मिश्रण हो जायगा।'

व्याख्या— इस प्रकार एक चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य मान लेनेसे एक तो अनवस्था दोष आता है, दूसरे स्मृतिके सङ्कर हो जानेका दोष आता है; क्योंकि एक चित्तने तो किसी विषयको जाना, दूसरेने उस विषयसहित चित्तको जाना, इसी प्रकार दूसरेको तीसरेने, तीसरेको चौथेने, इस तरह चलता रहनेपर तो एक वस्तुका ज्ञान भी कभी समाप्त नहीं होगा, यह अनवस्था दोष आवेगा और उन अनेक ज्ञानोंकी एक साथ स्मृति होनेपर यह निर्णय नहीं हो सकेगा कि कौन-से ज्ञानका क्या स्वरूप है, स्मृतिका मिश्रण हो जायगा, सो यह किसीके अनुभवकी बात नहीं है। सब कोई ऐसा ही स्मरण करते हैं कि अमुक पदार्थको मैंने जाना था। ऐसा कोई नहीं कहता कि अमुक पदार्थको, उसके ज्ञानको, फिर उसके ज्ञानसहित ज्ञानको, फिर उसके भी ज्ञानसहित ज्ञानको मैंने जाना था—इत्यादि। अतः चित्तसे भिन्न द्रष्टाको मानना ही युक्तिसङ्गत है॥

सम्बन्ध— चित्त स्वप्रकाश भी नहीं है और दूसरे चित्तका विषय भी नहीं है तो फिर यह बतलाना चाहिये कि चित्तका द्रष्टा कौन है; क्योंकि पुरुष तो असङ्ग और निर्विकार है, वह किसीका द्रष्टा और भोक्ता कैसे हो सकता है, इसपर कहते हैं—

कैवल्यपाद-४

चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥२२॥

'यद्यपि चेतन शक्ति (पुरुष) क्रियासे रहित और असङ्ग है, तो भी तदाकार हो जानेपर उसे अपनी बुद्धिका (चित्तका) ज्ञान होता है।'

व्याख्या—चेतन पुरुष निर्विकार, अपरिणामी, क्रियाशून्य और असङ्ग है, इसमें कोई सन्देह नहीं; परन्तु विकारशील नाना प्रकारके दृश्य पदार्थोंके प्रतिबिम्बसे तदाकार हुए चित्तके सम्बन्धसे जब वह चित्तके आकारवाला-सा हो जाता है (योग० १।४), उस समय उसे वृत्तियोंसहित बुद्धिका ज्ञान होता है। अतः उसे अपनी बुद्धि और बुद्धिकी वृत्तियोंका ज्ञाता और भोक्ता कहा जाता है। वास्तवमें तो पुरुष न ज्ञाता ही है और न भोक्ता ही, वह तो सर्वथा निर्विकार, असङ्ग और स्वप्रकाश चेतनमात्र है। भाव यह है कि चेतनके उपरागसे उपराञ्जित हुई बुद्धिका केवल अनुकरण करनेवाला-सा होनेके कारण ही चेतनको ज्ञाता कहा जाता है ॥२२॥

सम्बन्ध—ऐसा किस कारणसे होता है, यह बतलाते हैं—

द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥२३॥

'द्रष्टा और दृश्य—इन दोनोंसे रँगा हुआ चित्त सब अर्थवाला हो जाता है।'

व्याख्या—यह चित्त जब दृश्य पदार्थसे रँगा हुआ अपने स्वरूपके सहित द्रष्टाका विषय (दृश्य) बनकर उससे सम्बन्धित होता है, तब द्रष्टा और दृश्य—इन दोनोंके रंगमें रँग जाता है अर्थात् उन दोनोंका प्रतिबिम्ब इसमें पड़नेके कारण यह

१४२ पातञ्जलयोगदर्शन

दोनोंका आकार धारण कर लेता है और इसका निजी रूप भी वर्तमान रहता ही है, इस कारण यह चित्त ही सब अर्थवाला हो जाता है यानी दृश्य पदार्थके रूपवाला, द्रष्टा पुरुषके रूपवाला और अपने रूपवाला—इस प्रकार सर्वरूपवाला हो जाता है।

इसे इस प्रकार समझना चाहिये—

( १ ) चित्ततत्त्व या बुद्धितत्त्व जो कुछ कहिये—यह तीनों गुणोंका पहला और सात्त्विक परिणाम है। यह क्रियाशील, परिणामी और जड है, किंतु सात्त्विक होनेके कारण स्फटिकमणिकी भाँति उज्ज्वल है; यह चित्तका अपना रूप है।

( २ ) इसके सामने जिस समय जैसा बाह्य पदार्थ आता है अर्थात् जिस पदार्थका सम्बन्ध होता है, उसके रंगमें रँगा हुआ यह तदाकार हो जाता है, इसलिये पदार्थके रूपमें प्रतीत होता है।

( ३ ) पुरुषके साथ सम्बन्ध होनेके कारण यह द्रष्टा चेतन पुरुषके रंगमें रँगा हुआ रहता है, इसलिये यह तदाकार हुआ चेतनके रूपमें प्रतीत होने लगता है।

वास्तवमें चित्त उसमें प्रतिबिम्बित होनेवाले विषयोंसे और चेतन पुरुषसे सर्वथा भिन्न है तो भी भ्रान्तिसे उनके रूपमें प्रतीत होने लग जाता है। अतएव कई दर्शनकार तो चित्तको ही चेतन—द्रष्टा मानकर कहने लगते हैं कि चित्तसे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है और दूसरे यह कहते हैं कि चित्तसे अतिरिक्त ये दीखनेवाले गौ, घट आदि और उसके कारणरूप पञ्चभूत आदि पदार्थ भी कुछ नहीं हैं; चित्त ही सब रूप होकर दिखलायी देता है।

कैवल्यपाद-४ १४३

परन्तु यह भ्रम समाधिके द्वारा पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जानेपर नष्ट हो जाता है ॥२३॥

**सम्बन्ध—**अब चित्तसे भिन्न द्रष्टा पुरुषकी सत्ताको दृढ़ करने-के लिये दूसरा हेतु बतलाते हैं—

तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥ २४॥

‘वह (चित्त) असंख्येय वासनाओंसे चित्रित होनेपर भी दूसरेके लिये है; क्योंकि यह संहत्यकारी (मिल-जुलकर कार्य करनेवाला) है।’

**व्याख्या—**जो वस्तु बहुत पदार्थोंसे मिल-जुलकर कार्यमें समर्थ होती है, वह संहत्यकारी कहलाती है—जैसे मकान, भोजन आदि। ऐसी वस्तु अपनेसे भिन्न किसी दूसरेके लिये ही हुआ करती है, अपने लिये नहीं; अतः वह परार्थ कहलाती है। यह चित्त भी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके मिश्रणसे उत्पन्न है तथा बाह्य पदार्थ और इन्द्रियोंके संयोगसे उनसे मिल-जुलकर कार्य करनेमें समर्थ होता है; अतः यह अपने लिये नहीं है, द्रष्टा पुरुषके लिये है तथा उसीके भोग और अपवर्गके सम्पादनार्थ यह नाना वासनाओंसे चित्रित है, अपने लिये नहीं।

भाव यह है कि यद्यपि चित्तमें ही सब बाह्य पदार्थोंके चित्र पड़ते हैं और वह अगणित वासनाओंसे रँगा हुआ है तो भी वह स्वयंप्रकाश और द्रष्टा नहीं है; क्योंकि वह बाह्य पदार्थ और इन्द्रिय आदिसे मिल-जुलकर काम करनेवाला है, अतः दूसरेके लिये है ॥२४॥

१४४पातञ्जलयोगदर्शन

**सम्बन्ध—**यहाँतक चित्त और आत्मा—इन दोनोंकी भिन्नता-का युक्तियाँद्वारा प्रतिपादन किया; किन्तु युक्तियोंसे तो आत्माका स्वरूप सामान्य भावसे ही समझमें आता है, उसके स्वरूपका विशेष ज्ञान तो समाधिद्वारा ही हो सकता है। अतः समाधिमें होनेवाले विवेकज्ञानद्वारा जब योगी आत्मस्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है, तब उसकी क्या पहचान है, यह बतलाते हैं—

विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥ २५॥

( समाधिर्जनित विवेकज्ञानके द्वारा ) चित्त और आत्माके भेदको प्रत्यक्ष कर लेनेवाले योगीकी आत्मभावविषयक भावना सर्वथा निवृत्त हो जाती है।

**व्याख्या—**अपने स्वरूपको जाननेके लिये जो इस प्रकारके संकल्प होते हैं कि मैं कौन हूँ, कैसा हूँ—इत्यादि, इसका नाम आत्मभावभावना अर्थात् आत्मज्ञानके विषयका चिन्तन है। यह जबतक मनुष्यको आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता, तबतक ऊँचे-से-ऊँचे साधकमें भी विद्यमान रहती है। परंतु जिसने विवेक-ज्ञानद्वारा इस भेदको भलीभाँति समझ लिया है कि शरीर और चित्त आदिसे आत्मा भिन्न है, जिसे अपने स्वरूपका संशयरहित प्रत्यक्ष अनुभव हो गया है, उसकी उपर्युक्त आत्मभावभावना सर्वथा मिट जाती है। यही उसकी पहचान है ॥२५॥

**सम्बन्ध—**उस समय उस योगीके चित्तकी कैसी स्थिति रहती है, यह बतलाते हैं—

कैवल्यपाद-४ १४५

तदा विवेकिनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥ २६ ॥

'उस समय योगीका चित्त विवेकमें झुका हुआ और कैवल्यके अभिमुख हो जाता है।'

**व्याख्या—**अज्ञान-अवस्थामें साधारण मनुष्योंका चित्त अज्ञानमें निमग्न और विषयपरायण अर्थात् विषयोंके अभिमुख रहता है। परन्तु जब विवेकज्ञानका उदय हो जाता है, उस समय योगीका चित्त निःसार संसारके विषयोंकी ओर नहीं जाता, उनसे सर्वथा विरक्त हो जाता है और उस विवेकज्ञानमें निरन्तर बहता है तथा कैवल्यके अभिमुख हो जाता है यानी अपने कारणमें विलीन होना आरम्भ कर देता है। क्योंकि चित्तका अपने कारणमें विलीन हो जाना और द्रष्टाका स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना—यही कैवल्य है (योग० ४।३४) ॥२६॥

**सम्बन्ध—**यदि योगीका चित्त विवेकज्ञानमें झुका हुआ रहता है तथा अपने कारणमें विलीन होने लगता है तो फिर व्युत्थान-अवस्थामें उसकी दूसरी वृत्तियाँ कैसे होती होंगी, इसपर कहते हैं—

तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ २७ ॥

'उस (समाधि) के अन्तरालमें दूसरे पदार्थोंका ज्ञान पूर्वसंस्कारोंसे होता है।'

**व्याख्या—**विवेकज्ञानमें निमग्न हुए चित्तमें व्युत्थान-अवस्थाओंके समय जो अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका व्यवहार देखनेमें आता है, वह दग्धबीजके सदृश विद्यमान पूर्वसंस्कारोंसे देखनेमें आता है ॥२७॥

**सम्बन्ध—**उन संस्कारोंका सर्वथा नाश कब और कैसे होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

पा० यो० द० १०—

१४६ पातञ्जलयोगदर्शन

हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥२८॥

'इन संस्कारोंका विनाश क्लेशोंकी भाँति कहा गया है।'

**व्याख्या—**दग्ध हुए बीजके सदृश जो सूक्ष्म क्लेश हैं, उनका अभाव जैसे प्रतिप्रसवसे अर्थात् कारणमें कार्यके लयसे बतलाया है (योग० २ । १०), उसी प्रकार इनका भी समझ लेना चाहिये। जबतक किसी भी परिस्थितिमें चित्त वर्तमान है, तबतक संस्कारोंका सर्वथा नाश नहीं होता, उनका नाश तो चित्तके अपने कारण गुणोंमें विलीन होनेपर उसके साथ ही होता है। परन्तु भूने हुए बीजके सदृश ज्ञानरूप अग्निसे जलाये हुए संस्कार विद्यमान रहकर भी पुनर्जन्मके हेतु नहीं बन सकते। अतः उनके कारण होनेवाला पदार्थोंका ज्ञान नये संस्कारोंका उत्पादक नहीं है ॥२८॥

**सम्बन्ध—**विवेकज्ञान प्राप्त होनेके बाद क्या होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्याते-

र्धर्ममेघः समाधिः ॥२९॥

'जिस योगीका विवेकज्ञानकी महिमामें भी वैराग्य हो जाता है, उसका विवेकज्ञान सर्वथा प्रकाशमान रहनेके कारण उसको धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है।'

**व्याख्या—**जब विवेकज्ञान उदय होता है, तब योगीके चित्तमें अत्यन्त स्वच्छता आ जाती है। अतः उसमें विलक्षण शक्ति आ जाती है, उस समय योगी सर्वज्ञ हो जाता है (योग० ३ । ४९)।

कैवल्यपाद-४ [१४७]

ऐसी सामर्थ्य प्राप्त होनेपर भी जो योगी उस सामर्थ्यका उपभोग नहीं करता, सर्वज्ञतारूप ऐश्वर्यमें आसक्त नहीं होता, उससे सर्वथा विरक्त हो जाता है, तब उसके विवेकज्ञानमें किसी प्रकारका अन्तराय (विघ्न) नहीं पड़ सकता, वह निरन्तर उदित (प्रकाशमान) रहता है, इसलिये तत्काल ही उस योगीको धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है ॥२९॥

सम्बन्ध—उस धर्ममेघ समाधिसे क्या होता है, इसपर कहते हैं—

ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥३०॥

‘उस (धर्ममेघ समाधि) से क्लेश और कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है ।’

व्याख्या—उक्त प्रकारसे जब योगीकी धर्ममेघ समाधि सिद्ध हो जाती है, तब उस योगीके अविद्यादि पाँचों क्लेश तथा शुक्ल, कृष्ण और मिश्रित—ऐसे तीनों प्रकारके कर्मसंस्कार समूल नष्ट हो जाते हैं । अतः वह योगी जीवन्मुक्त कहलाता है ॥३०॥

सम्बन्ध—उस समय योगीके ज्ञानका क्या स्वरूप रहता है; यह बतलाते हैं—

तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्या-

ज्ज्ञेयमल्पम् ॥३१॥

‘उस समय जिसके सब प्रकारके परदे और मल हट चुके हैं, ऐसा ज्ञान अनन्त (सीमारहित) हो जाता है, इस कारण ज्ञेय पदार्थ अल्प हो जाते हैं ।’