पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकैवल्यपाद-४ । १३९
बाह्य वस्तुएँ और चेतन पुरुष—इन दोनोंका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उस समय पुरुष चित्तकी वृत्तियोंके रूपमें तद्रूप-सा हुआ रहता है (योग० १।४) और चित्त चेतन-सा प्रतीत होने लगता है; परन्तु वास्तवमें जैसे इन्द्रियाँ और शब्द आदि विषय दृश्य होनेके कारण स्वप्रकाश नहीं हैं, उसी प्रकार चित्त भी दृश्य होनेके कारण स्वप्रकाश नहीं है॥१९॥
सम्बन्ध—चित्तको स्वप्रकाश माननेमें दूसरा दोष दिखलाते हैं—
एकसमये चोभयानवधारणम् ॥२०॥
‘तथा (चित्त और उसका विषय)—इन दोनोंके स्वरूपको जानना भी एक कालमें नहीं हो सकता।’
व्याख्या—बाहरके पदार्थका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, तब द्रष्टा पुरुषको उस प्रतिबिम्बसहित चित्तका ज्ञान होना युक्तियुक्त है; क्योंकि वह अपरिणामी है। परन्तु चित्त अपने स्वरूपको और दृश्य पदार्थके स्वरूपको एक साथ नहीं जान सकता; क्योंकि परिणामशील होनेके कारण उसे एक ही कालमें दो ज्ञान नहीं हो सकते। अतः यही समझना चाहिये कि चित्त स्वप्रकाश नहीं है। चित्तका काम केवल बाह्य पदार्थके स्वरूपको अपने स्वामी द्रष्टा पुरुषके सामने रख देना है; फिर उसे जाननेका काम तो पुरुषका है ॥२०॥
सम्बन्ध—चित्तसे विषयका साक्षात्कार होता है और वह चित्त उस विषयसहित दूसरे चित्तसे देखा जाता है। इस प्रकार चित्तका और विषयका एक साथ ज्ञान हो जाता है, यह मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं—